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EXCLUSIVE: यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर विवाद, कोर्ट की रोक के बाद अब RTI से भी जानकारी छिपा रहा आयोग

August 5, 2026

उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए यूजीसी (UGC) की ओर से लाए गए नए नियम आते ही भारी विवादों में घिर गए. विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक हंगामे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी, जिसके बाद पुराने नियम फिर से लागू हो गए हैं. अब इस पूरे मामले पर RTI के जरिए जानकारी मांगी गई, तो यूजीसी ने अजीबोगरीब बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया.

दरअसल, इसी साल जनवरी 2026 में यूजीसी ने कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज के लिए कड़े 'इक्विटी नियम' यानी बराबरी के नियम लागू किए थे. इन्हें साल 2012 के पुराने और नरम दिशा-निर्देशों की जगह लाया गया था.

इनको लाने के पीछे सालों का दबाव था. देश में रोहित वेमूला और पायल तड़वी जैसे छात्रों की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौतों के बाद से लगातार यह मांग उठ रही थी. लोगों की मांग थी कि परिसरों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ सख्त कानून होने चाहिए. इसी मांग को देखते हुए यूजीसी ने ये नए नियम बनाए थे.

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हालांकि, नियमों के आते ही चारों तरफ से विरोध शुरू हो गया. हालात इतने बिगड़ गए कि बरेली में एक सिटी मजिस्ट्रेट ने इन नियमों के विरोध में इस्तीफा दे दिया. उत्तर प्रदेश में बीजेपी के कई स्थानीय नेताओं ने भी इसके खिलाफ अपने पद छोड़ दिए., बढ़ते दबाव को देखकर तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को खुद सामने आकर सफाई देनी पड़ी. उन्होंने उस वक्त कहा था कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा.

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सबसे ज्यादा दो बातों पर हुआ विवाद

गौरतलब है, इन नियमों में दायरा सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी तक ही सीमित था. इन नियमों के फाइनल ड्राफ्ट में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में केवल एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों को ही शामिल किया गया. इसमें जनरल वर्ग के छात्रों को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई.

वहीं शुरुआती ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने वालों पर सजा का नियम था, जिसे फाइनल नियमों से हटा दिया गया. इससे लोगों के बीच डर बैठ गया कि इन नियमों का गलत इस्तेमाल हो सकता है.

इन तमाम विवादों के बीच छात्र संगठन भी बंट गए. छात्र संगठन एबीवीपी ने स्पष्टता मांगी, वहीं एनएसयूआई ने नियमों का स्वागत करते हुए प्रतिनिधित्व की मांग की. साथ ही एआईएसए ने इनका खुला समर्थन किया. बढ़ते विरोध के चलते कुछ ही हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट ने इन नए नियमों पर रोक लगा दी. साल 2012 का पुराना ढांचा फिर से बहाल कर दिया.

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RTI में यूजीसी से पूछे गए 6 सवाल
जब यह सब चल रहा था, तब एक शख्स ने आरटीआई दाखिल करके यूजीसी से कुछ सीधे सवाल पूछे. RTI में पूछा गया कि नियमों का दायरा छोटा क्यों किया गया? क्या इसके लिए कोई कानूनी सलाह ली गई थी? नए नियम पुराने नियमों से कमजोर क्यों लगते हैं? क्या इन्हें बनाने से पहले छात्रों और शिक्षकों से सलाह ली गई थी? अब सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद यूजीसी क्या करेगा?

यूजीसी ने इस आरटीआई का जवाब देने में चार महीने लगा दिए. और अब जब जवाब आया है तो वह सिर्फ एक लाइन का है. यूजीसी का कहना है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, इसलिए कोई जानकारी नहीं दी जा सकती. जब इसके खिलाफ अपील की गई, तो उसे भी यह कहकर खारिज कर दिया गया कि RTI के तहत जो बताना था, वह बता दिया गया है. मतलब साफ है कि कोई दस्तावेज, कोई फाइल नोटिंग या कोई कानूनी राय शेयर नहीं की गई.

क्यों गलत है यूजीसी का यह बहाना?
कानूनी जानकारों और पुरानी सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (CIC) के फैसलों के मुताबिक, यूजीसी का यह 'सब्ज्यूडिस' (विचाराधीन) वाला बहाना पूरी तरह गलत और कमजोर है.

आरटीआई कानून के सेक्शन 8(1) में साफ लिखा है कि किन मामलों में जानकारी रोकी जा सकती है, और उसमें 'अदालत में मामला होना' कोई वैध कारण नहीं है. दिल्ली हाईकोर्ट और सीआईसी के कई पुराने फैसलों में यह तय हो चुका है कि जब तक अदालत खुद जानकारी देने से मना न करे, तब तक केवल यह कहकर आरटीआई खारिज नहीं की जा सकती कि केस कोर्ट में है. इसके बावजूद यूजीसी के अधिकारियों ने पुराने नियमों को नजरअंदाज करते हुए जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया.

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