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देवी महालक्ष्मी का क्षीरसागर से प्राकट्य: जानिए समुद्र मंथन के दौरान कैसे हुआ माता लक्ष्मी का जन्म - Haribhoomi

August 5, 2026

देवी महालक्ष्मी का क्षीरसागर से प्राकट्य: जानिए समुद्र मंथन के दौरान कैसे हुआ माता लक्ष्मी का जन्म

समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्राकट्य कैसे हुआ था? जानिए क्षीरसागर से जुड़ी देवी लक्ष्मी के जन्म की पौराणिक कथा।

Goddess Lakshmi origin Samudra Manthan story

समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का प्राकट्य कैसे हुआ था? (Ai Image)

  • Published: 05 Aug 2026, 04:11 PM IST
  • Last Updated: 05 Aug 2026, 04:11 PM IST

Samudra Manthan story: जब देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए मंदराचल पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से क्षीरसागर का महा-मंथन शुरू किया, तो सागर के भीतर से एक के बाद एक कई अद्भुत और शक्तिशाली वस्तुएं प्रकट होने लगीं। कालकूट विष और कामधेनु गाय जैसे रत्नों के निकलने के बाद, मंथन से वह अलौकिक शक्ति बाहर आई जिसके लिए पूरा ब्रह्मांड लालायित था- संपदा, सौंदर्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी।

कमल के आसन पर विराजमान होकर प्रकट हुईं माता लक्ष्मी
जैसे ही क्षीरसागर अधिक मथा गया, जल राशि के मध्य से एक अत्यंत तेजोमय और पावन प्रकाश प्रकट हुआ। उस दिव्य प्रकाश के बीचों-बीच गुलाबी रंग के एक विशाल और खिलते हुए कमल के पुष्प पर माता महालक्ष्मी विराजमान थीं। उनके एक हाथ में स्वर्ण मुद्राएं थीं और दूसरे हाथ से वे अभय मुद्रा में पूरे संसार को आशीर्वाद दे रही थीं। उनके सौंदर्य, शांति और दिव्य कांति से तीनों लोक जगमगा उठे।

माता लक्ष्मी के प्रकट होते ही अप्सराओं, गंधर्वों और समस्त देवी-देवताओं ने उनका स्वागत किया। जल की देवियों और नदियों ने पवित्र जल से उनका अभिषेक किया तथा दिग्गजों ने स्वर्ण कलशों से उनके ऊपर जल छिड़का।

भगवान विष्णु का वरण और जगत में समृद्धि का विस्तार
देवी लक्ष्मी के प्रकट होने पर सभी देवता और असुर उनके सम्मोहन और ऐश्वर्य को देखकर चकित रह गए और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करना चाहते थे। किंतु माता लक्ष्मी ने अपनी दृष्टि पूरे ब्रह्मांड में डाली और जगत के पालनहार भगवान श्री विष्णु को अपने पति के रूप में चुन लिया। उन्होंने भगवान विष्णु के वक्षस्थल को अपना स्थायी निवास बनाया।

समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी के प्राकट्य की यह कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची समृद्धि, शांति और वैभव केवल तभी स्थायी होते हैं जब उनका मिलन धर्म, पालन और न्याय (विष्णु स्वरूप) के साथ होता है। इसी प्रसंग के बाद से माता लक्ष्मी को 'क्षीराब्धि-तनया' (समुद्र की पुत्री) भी कहा जाने लगा।

डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा पुराणों और सनातन धर्म की मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक भारतीय पौराणिक इतिहास और संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रसंगों की जानकारी पहुंचाना है।