श्रीनगर गढ़वाल में धरातलीय ओजोन ने देश के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विवि की रिपोर्ट में 880 माइक्रोग्राम का स्तर सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है।
दून हॉराइज़न, श्रीनगर गढ़वाल (17 सितंबर): चारधाम यात्रा मार्ग के प्रमुख पड़ाव और अलकनंदा की शांत घाटी में बसे श्रीनगर के ऊपर अब जहरीली हवा का गंभीर साया मंडराने लगा है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग द्वारा पूरे एक साल की निगरानी के बाद जारी रिपोर्ट ने हर किसी को चौंका दिया है। 19 दिसंबर 2025 को यहां धरातलीय ओजोन (Ground-Level Ozone) का स्तर 880 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के पार निकल गया। यह स्तर देश के किसी भी हिस्से में दर्ज अब तक के उच्चतम आंकड़े से करीब दोगुना है।
साफ आबोहवा के मुगालते में जी रहे इस पर्वतीय शहर की हकीकत बेहद चिंताजनक निकली।
दिल्ली-कानपुर से आगे निकला शांत पहाड़ी कस्बा
आमतौर पर जब भी खतरनाक वायु प्रदूषण की बात छिड़ती है, तो जेहन में दिल्ली, गाजियाबाद या कानपुर की धुंध भरी सड़कें उभरती हैं। श्रीनगर गढ़वाल से आए आंकड़ों ने इस धारणा को पूरी तरह उलट दिया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि देश में 8 घंटे के औसत का सबसे अधिक स्तर 472 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो 19 मई 2025 को दिल्ली के मथुरा रोड स्टेशन पर मापा गया था।
इसके उलट, श्रीनगर में आठ घंटे का रोलिंग औसत 634.13 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया। राष्ट्रीय मानक 100 माइक्रोग्राम का है — यानी श्रीनगर की हवा में ओजोन की मात्रा सामान्य सीमा से छह गुना से भी ज्यादा रही।
विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग ने 15 सितंबर 2025 से 16 सितंबर 2026 के बीच कुल 339 दिनों के वायु गुणवत्ता आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन किया। नतीजे बताते हैं कि 26 दिन (लगभग 7.7 फीसदी) हवा सीपीसीबी के सुरक्षा मानकों से कहीं अधिक खराब स्थिति में थी।
घाटी की भौगोलिक बनावट और विंटर इनवर्जन का फंदा
पहाड़ों में इतना घातक प्रदूषण पनपा कैसे? निगरानी दल के प्रमुख डॉ. आलोक गौतम और वैज्ञानिक डॉ. त्रिलोक चंद उपाध्याय के अनुसार इसके पीछे दो प्रमुख ट्रिगर हैं: जंगलों की आग और श्रीनगर की खास भौगोलिक स्थिति।
वनाग्नि की वजह से भारी मात्रा में वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स और बायोमास धुआं वायुमंडल में घुलता है। साथ ही चारधाम रूट पर चलने वाले डीजल-पेट्रोल वाहनों से निकलने वाला नाइट्रोजन ऑक्साइड धूप की मौजूदगी में रासायनिक क्रिया करके सतही ओजोन तैयार करता है।
लेकिन असल खेल श्रीनगर की कटोरीनुमा घाटी और ‘विंटर इनवर्जन’ (Winter Inversion) ने किया। सर्दियों के दौरान जमीन के ठीक ऊपर ठंडी हवा की एक भारी परत बैठ जाती है और उसके ऊपर गर्म हवा की चादर तन जाती है। नतीजतन, घाटी में पैदा हुआ धुआं और हानिकारक गैसें ऊपर उठकर बिखर नहीं पातीं। वे नीचे ही बंद डिब्बे की तरह कैद होकर रह जाती हैं।
सर्दियों की शुरुआत के साथ अगर बायोमास बर्निंग और निर्माण कार्यों पर निगरानी नहीं रखी गई, तो घाटी में दमा और फेफड़ों के मरीजों के लिए हालात बेहद विकट हो सकते हैं।