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भारत को क्यों चाहिए रूसी स्टील्थ जेट Su-57E, ये कैसे वायु सेना की ताकत बढ़ाएगा?

September 12, 2026

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सरकार भारत को Su-57E स्टील्थ फाइटर जेट बेचने के लिए लगातार प्रयास कर रही है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन-मोदी मुलाकात में यह मुद्दा प्रमुखता से चर्चा में रहा. रूस इसे सिर्फ बेचने की बात नहीं कर रहा बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, संयुक्त उत्पादन और सोर्स कोड तक पहुंच देने का प्रस्ताव रख रहा है. 

यह जेट पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है जिसे भारत के स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के आने तक अंतरिम समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है. AMCA के 2035 के आसपास सेवा में आने की उम्मीद है. ऐसे में भारतीय वायुसेना के स्क्वाड्रन संकट और क्षेत्रीय चुनौतियों को देखते हुए यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण बन गया है.

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भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में करीब 29 स्क्वाड्रन हैं जबकि स्वीकृत संख्या 42 है. पुराने विमान रिटायर हो रहे हैं. नए विमानों की आपूर्ति धीमी है. चीन के पास सैकड़ों जे-20 स्टील्थ फाइटर हैं. पाकिस्तान चीनी जे-35ए हासिल करने की दिशा में बढ़ रहा है. दो मोर्चों पर संभावित खतरे के बीच भारत के पास अभी कोई 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ जेट नहीं है. Su-57E इस खाई को भरने का विकल्प बन सकता है.

पाकिस्तान और चीन की ताकत के बीच क्यों जरूरी?

चीन तिब्बत के पास जे-20 तैनात कर रहा है. पाकिस्तान भी स्टील्थ क्षमता हासिल करने की कोशिश में है. स्टील्थ जेट रडार से बचकर दुश्मन के क्षेत्र में घुस सकते हैं, लंबी दूरी के मिसाइल दाग सकते हैं. नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर में बेहतर प्रदर्शन करते हैं. भारतीय वायुसेना के मौजूदा बेड़े में राफेल फाइटर जेट, सु-30एमकेआई, तेजस जैसे विमान हैं जो चौथी या 4.5 पीढ़ी के हैं. ये सक्षम हैं लेकिन स्टील्थ के खिलाफ पूरा फायदा नहीं देते. 

Su-57E फ्रंटल स्टील्थ, सुपर मैन्युवरेबिलिटी, थ्रस्ट वेक्टरिंग और एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन जैसी खूबियां रखता है. यह हवा से हवा और हवा से जमीन दोनों मिशनों के लिए उपयुक्त है. रूस इसे युद्ध में इस्तेमाल का अनुभव भी बताता है. ऐसे में क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ स्क्वाड्रन स्टील्थ जेट तुरंत शामिल करना रणनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है.

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कितने स्टील्थ फाइटर जेट्स की जरूरत?

विशेषज्ञों के अनुसार दो से चार स्क्वाड्रन यानी करीब 36 से 80 विमान पर्याप्त हो सकते हैं. कुछ रिपोर्ट्स में 36 से 60 विमानों की तुरंत डिलीवरी और बाद में भारत में तीन से पांच स्क्वाड्रन के संयुक्त उत्पादन की बात कही गई है. दो स्क्वाड्रन से पायलटों को पांचवीं पीढ़ी की रणनीति, स्टील्थ मेंटेनेंस और सेंसर फ्यूजन का अनुभव मिलेगा. 

Su-57E stealth fighter

चार स्क्वाड्रन से फ्रंटलाइन पर मजबूत प्रतिरोधक क्षमता बनेगी. इससे AMCA आने तक का समय कवर हो जाएगा. लेकिन ज्यादा संख्या स्वदेशी कार्यक्रम पर बजट और ध्यान का दबाव बढ़ा सकती है. भारतीय वायुसेना छोटी संख्या में तुरंत खरीद और सीमित उत्पादन को प्राथमिकता दे सकती है ताकि संसाधन AMCA पर भी केंद्रित रहें.

तात्कालिक फायदे क्या होंगे?

सबसे बड़ा फायदा तुरंत स्टील्थ क्षमता हासिल होना है. चीन और पाकिस्तान के स्टील्थ बेड़े के मुकाबले भारत को बराबरी का मौका मिलेगा. तकनीक हस्तांतरण से भारतीय उद्योग को स्टील्थ कोटिंग, एवियोनिक्स, इंजन और हथियार एकीकरण का अनुभव मिलेगा जो AMCA विकास में मदद करेगा. 

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रूस इंजन तकनीक और सोर्स कोड देने को तैयार बताया जा रहा है. भारतीय हथियार जैसे अस्त्र मिसाइल को एकीकृत करने का विकल्प भी हो सकता है. इससे निर्भरता कम होगी और मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा. परिचालन रूप से लंबी दूरी के मिशन, दुश्मन की एयर डिफेंस को भेदने और वायु श्रेष्ठता हासिल करने में मदद मिलेगी. रूस के साथ मौजूदा सु-30एमकेआई अनुभव के कारण प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक्स आसान हो सकते हैं.

Su-57E stealth fighter

हालांकि चुनौतियां भी हैं. रूस की उत्पादन क्षमता और प्रतिबंधों का जोखिम है. AMCA पर ध्यान कम होने का डर है. कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि विदेशी स्टील्थ जेट खरीदना स्वदेशी कार्यक्रम की देरी को स्वीकार करना है. लागत भी अरबों डॉलर में होगी. इसलिए निर्णय सावधानी से लेना होगा. Su-57E को पुल की तरह इस्तेमाल करके AMCA पर तेजी लानी होगी.

संतुलित दृष्टिकोण जरूरी

Su-57E प्रस्ताव भारतीय वायुसेना की तात्कालिक जरूरत को पूरा कर सकता है. चीन-पाकिस्तान की बढ़ती स्टील्थ क्षमता के बीच यह जरूरी लगता है. 36-60 विमानों से शुरू करके अनुभव हासिल किया जा सकता है. लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा स्वदेशी क्षमता में है. रूस के साथ साझेदारी से तकनीक सीखकर AMCA को मजबूत बनाना सही रास्ता होगा. भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए फैसला करना चाहिए. यह सिर्फ जेट खरीद नहीं बल्कि भविष्य की हवाई शक्ति का सवाल है.

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