मंदिर में भगवान की मूर्ति की परिक्रमा क्यों की जाती है? जानें इसके पीछे की धार्मिक मान्यता
मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद परिक्रमा क्यों की जाती है? जानिए हिंदू धर्म में परिक्रमा की परंपरा, दिशा और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।
मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद परिक्रमा क्यों की जाती है? (Ai Image)
- Published: 12 Sep 2026, 04:12 PM IST
- Last Updated: 12 Sep 2026, 04:12 PM IST
Mandir Parikrama significance: हिंदू धर्म में मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने के बाद उनकी परिक्रमा करने की परंपरा भी प्रचलित है। श्रद्धालु भगवान की प्रतिमा या मंदिर के गर्भगृह के चारों ओर घूमकर परिक्रमा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसे ईश्वर के प्रति श्रद्धा और समर्पण व्यक्त करने का माध्यम माना जाता है।
परिक्रमा का धार्मिक अर्थ क्या है?
‘परिक्रमा’ या ‘प्रदक्षिणा’ का भाव भगवान को अपने जीवन का केंद्र मानने से जोड़ा जाता है। भक्त भगवान के चारों ओर घूमते हुए यह भावना रखते हैं कि उनके जीवन में ईश्वर सर्वोच्च स्थान पर हैं।
इसी वजह से मंदिरों में परिक्रमा को पूजा की महत्वपूर्ण परंपराओं में शामिल किया गया है।
परिक्रमा किस दिशा में की जाती है?
हिंदू धार्मिक परंपरा में सामान्य तौर पर दक्षिणावर्त परिक्रमा यानी भगवान को अपनी दाईं ओर रखते हुए परिक्रमा करने की परंपरा बताई जाती है। इसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है।
हालांकि, सभी देवी-देवताओं और सभी धार्मिक स्थलों के नियम एक जैसे नहीं होते। कुछ विशेष पूजा परंपराओं में अलग विधियां भी देखने को मिलती हैं।
कितनी बार परिक्रमा करनी चाहिए?
परिक्रमा की संख्या को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं। कई मंदिरों में श्रद्धालु एक, तीन, पांच या अधिक बार परिक्रमा करते हैं।
इसलिए परिक्रमा की कोई एक संख्या सभी मंदिरों पर लागू नहीं होती। जिस मंदिर में दर्शन के लिए जाएं, वहां की प्रचलित परंपरा का पालन करना उचित माना जाता है।
परिक्रमा करते समय क्या भावना रखनी चाहिए?
धार्मिक दृष्टि से परिक्रमा केवल मंदिर के चारों ओर घूमना नहीं है। इसे भगवान के प्रति भक्ति, विनम्रता और समर्पण के भाव से जोड़ा जाता है।
श्रद्धालु परिक्रमा के दौरान भगवान का नाम लेते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति तथा मंगल की प्रार्थना करते हैं।
कुछ मंदिरों में पूरी परिक्रमा क्यों नहीं की जाती?
कुछ विशेष देवी-देवताओं की पूजा पद्धतियों में परिक्रमा के अलग नियम बताए जाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ परंपराओं में शिवलिंग की परिक्रमा करते समय जलधारी या अन्य विशेष स्थान को पार न करने की मान्यता मिलती है।
इसलिए किसी भी मंदिर में परिक्रमा करने से पहले वहां की स्थानीय धार्मिक परंपरा और नियमों को जानना बेहतर होता है।
परिक्रमा आज भी आस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा
मंदिर में घंटी बजाने, भगवान के दर्शन और पूजा के बाद परिक्रमा करने की परंपरा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी हुई है। भक्त इसे भगवान के प्रति सम्मान और अपनी श्रद्धा प्रकट करने का माध्यम मानते हैं।
परिक्रमा का धार्मिक महत्व मुख्य रूप से आस्था और परंपराओं पर आधारित है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित परंपराओं पर आधारित है। अलग-अलग मंदिरों, क्षेत्रों और संप्रदायों में परिक्रमा के नियम और विधि अलग हो सकती है। इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।