R Madhavan Shocking Revelation: आर माधवन आज बॉलीवुड के उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल हैं जिन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग से न सिर्फ हिंदी बल्कि तमिल और अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई है. जी हां, शांत स्वभाव, शानदार स्क्रीन प्रेजेंस और अपने किरदारों में पूरी तरह ढल जाने के लिए मशहूर माधवन की जिंदगी आज भले ही बेहद सफल नजर आती हो, लेकिन फिल्मों में आने से पहले उनकी जिंदगी में एक ऐसा दौर भी आया था जिसने उन्हें अंदर तक प्रभावित किया.
कनाडा पहुंचते ही मिला बिल्कुल अलग कल्चर
फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने से पहले माधवन को एक्सचेंज स्टूडेंट प्रोग्राम के तहत कनाडा जाने का मौका मिला था. ये सफर उनके लिए सिर्फ पढ़ाई या एक नए देश को देखने का अनुभव नहीं था, बल्कि यहां उन्हें ऐसी संस्कृति और परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जो उनके लिए बिल्कुल नई थीं.
एक तरफ माधवन खुद को उस वक्त एक ‘हार्डकोर वेजिटेरियन’ बताते थे, वहीं दूसरी तरफ उन्हें ऐसे परिवारों के साथ रहना पड़ा, जिनका काम ही गायों के वध से जुड़ा हुआ था. इसके अलावा एक ऐसी घटना भी हुई, जब स्कूल की बास्केटबॉल टीम के साथ सात दिनों के टूर्नामेंट पर गए माधवन को कम्युनल शॉवर की ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा जिससे वो बेहद असहज हो गए. माधवन ने साल 2023 में इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के यूट्यूब चैनल पर बातचीत के दौरान कनाडा में बिताए अपने दिनों के कई दिलचस्प किस्से सुनाए थे.
‘वो गाय काटकर कमाते थे...’
माधवन के मुताबिक, एक्सचेंज प्रोग्राम के दौरान वो कनाडा के स्टेटलर नाम की जगह पहुंचे थे. उन्होंने इस जगह को ‘वाइल्ड वाइल्ड वेस्ट’ और काउबॉय कंट्री के तौर पर याद किया. वहां उनका सामना एक ऐसे माहौल से हुआ, जो उनके लिए पूरी तरह नया था. माधवन एक दक्षिण भारतीय परिवार से आते थे और उस समय खुद को सख्त शाकाहारी बताते थे. लेकिन जिस परिवार के बीच उन्हें रहने का मौका मिला, उनका जीवन और कामकाज उनके अनुभवों से बिल्कुल अलग था.
माधवन ने बताया था कि वो ऐसे काउबॉय परिवारों के बीच रहे, जो गायों का वध करके अपना जीवन जीते थे. उनके लिए ये एक बड़ा कल्चरल शॉक था. उनके अपने संस्कारों और सोच के लिहाज से ये अनुभव बेहद अलग था. माधवन ने बताया कि उस समय उन्हें कई चीजें ‘अधर्म’ जैसी महसूस होती थीं. हालांकि, कनाडा में उनका असली इम्तिहान अभी बाकी था.
बास्केटबॉल टीम में सिलेक्शन से शुरू हुई नई परेशानी
कनाडा में माधवन स्कूल की बास्केटबॉल टीम का हिस्सा बन गए. उनके लिए ये उपलब्धि काफी खास थी, क्योंकि वो वहां के बाकी लड़कों की तुलना में बहुत लंबे नहीं थे. इसके बावजूद उन्होंने अपनी जगह टीम में बना ली. इसके बाद टीम को दूसरे शहर में सात दिनों के टूर्नामेंट के लिए जाना पड़ा. माधवन के लिए टूर्नामेंट का अनुभव खेल से ज्यादा एक दूसरी वजह से यादगार बन गया. दरअसल, मैच के बाद खिलाड़ियों के लिए जो शॉवर एरिया था, उसका सेटअप उनके लिए बेहद असहज करने वाला था.
छह शॉवर हेड और सभी लड़के एक साथ
माधवन ने बताया कि लड़कों के लॉकर रूम में एक खंभे के आसपास करीब छह शॉवर हेड लगे हुए थे. वहां सभी लड़के एक साथ शॉवर लेते थे. उन लड़कों के लिए ये बिल्कुल नार्मल था. उनके बीच किसी तरह की झिझक नहीं थी. लेकिन माधवन के लिए ये स्थिति बेहद अजीब थी. दक्षिण भारतीय परिवार से आने वाले माधवन के लिए ये बिल्कुल अलग अनुभव था. उन्होंने बताया कि उनके घर के माहौल में लोग एक-दूसरे के सामने इस तरह सहज नहीं होते थे. ऐसे में कई लड़कों के साथ एक ही जगह पर शॉवर लेना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया.
माधवन ने निकाला अपना रास्ता
माधवन ने आखिरकार फैसला किया कि ‘जो होगा देखा जाएगा.’ उन्होंने बिना कपड़े उतारे अंडरवियर पहनकर ही शॉवर लेने का फैसला किया. उन्हें लगा कि इससे वो अपनी झिझक और असहजता दोनों से बच पाएंगे. लेकिन उनकी ये तरकीब वहां मौजूद बाकी लड़कों के लिए और भी ज्यादा हैरान करने वाली थी. जब बाकी लड़के नॉमल तरीके से शॉवर ले रहे थे और माधवन अंडरवियर पहनकर वहां पहुंचे, तो उनकी नजरें माधवन पर टिक गईं. उनके मन में सवाल था कि आखिर माधवन ऐसा क्यों कर रहे हैं और वो क्या छिपाने की कोशिश कर रहे हैं? माधवन के लिए स्थिति थोड़ी और मजेदार होने के साथ-साथ असहज भी हो गई.
‘मैं खुद को सबसे ज्यादा नंगा महसूस कर रहा था’
माधवन ने इस अनुभव को याद करते हुए बताया कि अजीब बात ये थी कि उस समय उन्हें खुद को सबसे ज्यादा ‘नंगा’ महसूस हो रहा था. दरअसल, बाकी लड़के एक-दूसरे के सामने पूरी तरह सहज थे. उनके लिए इसमें कुछ भी असामान्य नहीं था. लेकिन माधवन के अलग व्यवहार ने उल्टा सभी का ध्यान उनकी तरफ खींच दिया. वहां मौजूद लड़कों को लग रहा था कि माधवन आखिर ऐसा क्यों कर रहे हैं. ये स्थिति सिर्फ एक दिन नहीं रही. माधवन के मुताबिक, पूरे सात दिन तक उन्हें इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा.
तीसरे दिन माधवन को समझ आया- ‘ये मैं नहीं हूं’
शुरुआत में माधवन ने खुद को समझाने की कोशिश की. उन्हें लगा कि शायद उन्हें भी वहां के माहौल के मुताबिक ढल जाना चाहिए. आखिर बाकी सभी लोगों के लिए यह सामान्य था. लेकिन कुछ समय बाद उन्हें एहसास हुआ कि सिर्फ इसलिए किसी चीज को अपनाना जरूरी नहीं है क्योंकि बाकी लोग उसे सामान्य मानते हैं. माधवन ने बताया कि करीब तीसरे दिन उन्हें एहसास हुआ कि ‘ये मैं नहीं हूं.’ इसके बाद उन्होंने अपनी असहजता को स्वीकार किया और उसी के मुताबिक व्यवहार करना जारी रखा.
कनाडा के इस अनुभव ने सिखाया जिंदगी का बड़ा सबक
आज जब माधवन उस घटना को याद करते हैं तो ये किस्सा सुनने में भले ही मजेदार लगता है, लेकिन उनके लिए उस वक्त ये एक गंभीर अनुभव था. इस घटना ने उन्हें एक महत्वपूर्ण बात सिखाई दुनिया में हर किसी के लिए ‘नॉर्मल’ एक जैसा नहीं होता. अगर कोई चीज आपको अंदर से असहज करती है, तो केवल इसलिए उसे करने की जरूरत नहीं है क्योंकि आसपास के लोग उसे बिल्कुल सामान्य मानते हैं. अपनी पहचान और अपनी सहजता को समझना भी उतना ही जरूरी है. माधवन के मुताबिक, इस अनुभव ने उन्हें अपने फैसलों पर भरोसा करना सिखाया. उन्होंने महसूस किया कि किसी नए माहौल में ढलने का मतलब यह नहीं कि आपको अपनी पूरी पहचान ही बदलनी पड़े.
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