world-news

एक्सक्लूसिव: पीयूष गोयल बोले- निवेश नहीं, व्यापार घाटे के आंकड़ों से होगी जापान-भारत संबंधों की अगली परीक्षा

August 26, 2026

भारत और जापान के रिश्ते की अगली परीक्षा निवेश की घोषणाओं से नहीं, व्यापार घाटे के आंकड़े से होगी। टोक्यो पीछे छूट चुका था, शिंकानसेन रफ्तार पकड़ चुकी थी और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के सामने यही सवाल था। तीन दिन की इस यात्रा में उनके साथ भारत का अब तक का सबसे बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल था। दो सौ से ज्यादा उद्योगपति और अलग अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधि। मकसद जापान से निवेश मांगना भर नहीं था। मकसद उन गांठों को खोलना था जो बाजार पहुंच, प्रमाणन और पुराने नियमों से बंधी हैं। टोक्यो से ओसाका जाती शिंकानसेन में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से राजकिशोर की विशेष बातचीत।



15 साल पुराना समझौता, बदल चुका बाजार


दोनों देशों का मौजूदा कारोबार करीब साढ़े 27 अरब डॉलर का है। लेकिन तराजू एक तरफ झुका है। भारत जापान से मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और ऊंची तकनीक वाले उत्पाद बड़े पैमाने पर मंगाता है। जापान के बाजार में भारतीय सामान की पहुंच उतनी नहीं है। यही वजह है कि 2011 के व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते की समीक्षा अब बातचीत के केंद्र में आ गई है। गोयल के मुताबिक इसे नए दौर के हिसाब से ढालना होगा। अब यह रिश्ता कार और मशीनरी तक सीमित नहीं है। सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स, स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा और आपूर्ति शृंखला तक सहयोग फैल चुका है। डेढ़ दशक पुराने ढांचे में यह सब नहीं समाता।

विज्ञापन



गुणवत्ता जापान की, पैमाना भारत का


हाईटेक क्षेत्रों में जापानी कंपनियां गुणवत्ता को लेकर बेहद सख्त हैं। गोयल इसे अड़चन नहीं, मौका मानते हैं। उनका तर्क है कि ये कंपनियां भारत में उत्पादन करेंगी तो गुणवत्ता का स्तर पूरे उद्योग में ऊपर उठेगा। इसका फायदा भारतीय उपभोक्ता को भी मिलेगा।

विज्ञापन



बाजार मत समझिए, कारखाना बनाइए


गोयल का जोर एक ही बात पर है। जापानी कंपनियां भारत को खरीदार देश न मानें। यहां बनाएं और यहीं से दुनिया को भेजें। भारत के मुक्त व्यापार समझौतों के रास्ते जापानी सामान दूसरे बाजारों तक पहुंच सकता है। उनका कहना है कि भारत की ताकत अब सस्ता श्रम नहीं है। बड़ा घरेलू बाजार है, युवा इंजीनियरिंग प्रतिभा है और तेजी से बढ़ती मांग है। बातचीत में उन्होंने दोहराया कि युवाओं की ऊर्जा और मध्यवर्ग का आकार ही जापानी उद्योग को सबसे ज्यादा खींच रहा है। कीमत पर बात बनी तो जापानी तकनीक भारत के रास्ते वैश्विक बाजार तक जाएगी।



थाईलैंड और चीन का सवाल


बातचीत में यह सवाल भी आया कि भारत में काम कर रहीं कुछ कंपनियां थाईलैंड और चीन की तरफ क्यों देखती हैं। जवाब में गोयल ने कहा कि परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब भारत वह पुराना भारत नहीं रहा जहां से कंपनियां दूसरी जगह जाना पसंद करें।



आंकड़ा नहीं, माहौल


आखिरी सवाल सबसे सीधा था। इस दौरे से कितने हजार करोड़ या कितने अरब डॉलर का निवेश गिना जाए। गोयल ने जवाब को किसी एक आंकड़े में नहीं बांधा। उनका कहना था कि अवसर अपने आप नहीं बनते, उन्हें बनाना पड़ता है। जिन कंपनियों की रुचि बुनियादी ढांचे में है, उन्हें उस तरफ लाना पड़ता है। ऐसे दौरे में सबसे बड़ी बात यह देखना है कि सामने वाले का मूड क्या है और रुचि कितनी गंभीर है। और उनका संकेत साफ था। माहौल बेहद सकारात्मक है। असली परीक्षा अब आगे है। यह सकारात्मक माहौल कितने कारखानों, कितनी तकनीक और सबसे बढ़कर जापान को होने वाले कितने निर्यात में बदलता है, हिसाब उसी से होगा।