बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती एक बार से अपने अनुशासन के चलते चर्चा में हैं. उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को यह करते हुए उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया कि अभी उन्हें और मेच्योर होने की जरूरत नहीं है. यह पहली बार नहीं है जब मायावती ने आकाश को उनकी जिम्मेदारियों से हटाया है इससे पहले भी वह ऐसा कर चुकी हैं. आकाश ही नहीं पार्टी के कई सारे नेताओं के बीते 10 सालों में बाहर का रास्ता दिखाया गया है. दिसंबर 2023 में मायावती ने आकाश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था, लेकिन कुछ ही महीनों बाद मई 2024 में उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटा दिया और उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी भी वापस ले ली. मार्च 2025 में आकाश को पार्टी से निकाल दिया गया और माफी के बाद उनकी वापसी हुई. 2026 में भी उन्हें संगठन में पीछे किए जाने के संकेत मिले. यानी पार्टी में रिश्ते और कद से ऊपर मायावती के लिए अनुशासन और नेतृत्व की लाइन अहम है.
BSP के संविधान के अनुच्छेद 8 में पार्टी अनुशासन को लेकर कई सख्त नियम हैं. पार्टी की नीतियों के खिलाफ काम करना, सार्वजनिक तौर पर पार्टी की आलोचना करना, गुटबाजी करना, अधिकृत पदाधिकारी के अधिकार को चुनौती देना, बदनामी का कैंपेन चलाना, पार्टी के काम में रुकावट डालना या फंड का गलत इस्तेमाल करना अनुशासनहीनता माना गया है. इसी नियम के तहत पिछले करीब 10 साल में 50 से ज्यादा नेताओं पर अलग-अलग तरह की कार्रवाई हुई है. इनमें पार्टी से निकालने के साथ निलंबन और पद से हटाने की कार्रवाई भी शामिल है. आइए आपको पार्टी के अनुशासन और नेताओं पर हुई कार्रवाइयों के बारे में विस्तार से बताते हैं.
आकाश आनंद पर कब-कब हुई कार्रवाई
दिसंबर 2023- आकाश आनंद को पार्टी का राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया.
मई 2024- मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाया और उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी भी वापस ले ली.
2025 (पहला दौर)- एक बार फिर राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटाने के बाद आकाश को BSP से निकाल दिया गया. मायावती ने उनके फैसलों और सोशल मीडिया पर दी गई प्रतिक्रियाओं पर आपत्ति जताई थी. बाद में आकाश के खेद जताने पर उन्हें पार्टी में वापस ले लिया गया.
सितंबर 2026- मायावती ने संकेत दिया कि आकाश को फिलहाल बड़ी जिम्मेदारी देना सही नहीं होगा. उन्होंने कहा कि आकाश को और मेच्योर होने की जरूरत है.
क्या है पार्टी का कानून?
BSP का यह सख्त रवैया किसी बिना लिखे नियम पर नहीं, बल्कि पार्टी के अपने संविधान के अनुच्छेद 8 ‘Rules of Discipline’ पर टिका है. इस अनुच्छेद में साफ तौर पर नौ पॉइंट्स में बताया गया है कि किन कामों को अनुशासनहीनता माना जाएगा. पार्टी की घोषित नीतियों के खिलाफ काम करना, नीतियों की सार्वजनिक आलोचना, पार्टी के अंदर गुटबाजी करना या किसी संवैधानिक पदाधिकारी के अधिकार को चुनौती देने वाले सदस्य का समर्थन करना, सदस्यों के बीच गलत भावना फैलाना या बदनामी का कैंपेन चलाना, पार्टी के कामकाज में रुकावट डालना, पार्टी फंड का गलत इस्तेमाल करना, ऐसे संगठन से जुड़ना जिसे केंद्रीय कार्यकारी समिति ने मान्यता नहीं दी हो, पद का गलत इस्तेमाल करना या उसका इस्तेमाल न करना, और पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का विरोध करना इसमें शामिल है.
सजा के मामले में भी संविधान में कई तरह के प्रावधान हैं. दोषी पाए जाने पर सदस्य को पार्टी से हमेशा के लिए निकाला जा सकता है, एक तय समय के लिए सदस्यता से निलंबित किया जा सकता है, पद से हटाया जा सकता है या पद लेने पर कुछ समय या हमेशा के लिए रोक लगाई जा सकती है. इनमें से एक या एक से ज्यादा सजा दी जा सकती है. अनुशासनहीनता के मामलों की सुनवाई आम तौर पर राज्य कार्यकारी समिति या केंद्रीय कार्यकारी समिति करती है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष को किसी भी मामले को सीधे देखने का अधिकार दिया गया है. सजा से असंतुष्ट सदस्य राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास अपील कर सकता है. राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहें तो खुद सुनवाई करें या मामला केंद्रीय कार्यकारी समिति को भेज दें, लेकिन अंतिम फैसला हर हाल में राष्ट्रीय अध्यक्ष की मंजूरी से ही होता है. यानी अनुशासन से जुड़ी पूरी प्रक्रिया में आखिरी अधिकार राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास रहता है.
10 साल में कई नेताओं पर कार्रवाई
इसी अनुशासन व्यवस्था को मायावती ने पिछले करीब एक दशक में कई बार सख्ती से लागू किया है. बड़े नेता हों, सांसद-विधायक हों या संगठन के राष्ट्रीय पदाधिकारी, कार्रवाई से कोई अछूता नहीं रहा. नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे कभी मायावती के बेहद करीबी नेता को 2017 में पार्टी से निकाल दिया गया. ब्रजेश पाठक 2016 में बाहर हुए, 2018 में मुकुल उपाध्याय पर कार्रवाई हुई और 2019 में राम प्रसाद चौधरी समेत आगरा के सात नेताओं पर अनुशासनहीनता के आरोप में कार्रवाई हुई. 2020 में राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी लाइन के खिलाफ जाने वाले सात BSP विधायकों को निलंबित किया गया, तो 2021 में लालजी वर्मा और राम अचल राजभर जैसे प्रमुख OBC चेहरों को भी पार्टी से निकाल दिया गया.
हाल के वर्षों में यह सख्ती राष्ट्रीय स्तर के नेताओं तक भी पहुंची है. 2025 में मायावती के करीबी रहे अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर किया गया, जिन्हें माफी के बाद वापस लिया गया, लेकिन अगस्त 2026 में फिर निकाल दिया गया. इसी कार्रवाई में राष्ट्रीय समन्वयक रणधीर सिंह बेनीवाल और बाद में पूर्व मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा पर भी पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कार्रवाई हुई.

देवेश कुमार पांडेय
देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है. साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.
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