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वो फैक्ट्री जहां भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन बनी, 71 सालों में यहां क्या-क्या बना?

July 17, 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन की शुरुआत की. यह ट्रेन जींद से सोनीपत के बीच चलेगी. इसी के साथ जर्मनी, जापान, चीन, अमेरिका के साथ भारत दुनिया का पांचवां देश बन गया है, जहां हाइड्रोजन से ट्रेन का संचालन किया जा रहा है. इस ट्रेन का निर्माण आत्मनिर्भर भारत के क्रम में देश में ही हुआ है. भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का निर्माण जिस बड़ी रेल फैक्ट्री में हुआ है, उसका नाम है इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF), यानी आईसीएफ. यह फैक्ट्री चेन्नई में है.

ICF भारतीय रेलवे की सबसे अहम उत्पादन इकाइयों में गिनी जाती है. यहां दशकों से रेल के डिब्बे, ट्रेन सेट और आधुनिक कोच तैयार किए जा रहे हैं. हाइड्रोजन ट्रेन के बाद एक बार फिर लोगों की नजर चेन्नई की इस फैक्ट्री पर गई है. जानिए, अब तक के 71 वर्षों के अपने सफर में इस फैक्ट्री ने भारतीय रेल के विकास में किस तरह से योगदान दिया है?

यहां ट्रेन, मेट्रो कोच और इलेक्ट्रिक ट्रेन सेट का निर्माण

इंटीग्रल कोच फैक्ट्री तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में स्थित है. इसका परिसर चेन्नई के पेरम्बूर इलाके में है. पेरम्बूर लंबे समय से रेलवे गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा है. आईसीएफ भारतीय रेलवे के स्वामित्व वाली फैक्ट्री है. इसे देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी रेल कोच निर्माण इकाइयों में गिना जाता है. यहां उत्पादन साल 1955 में शुरू हुआ. इस फैक्ट्री में केवल सामान्य रेल डिब्बे नहीं बनते. आधुनिक ट्रेन, मेट्रो कोच और इलेक्ट्रिक ट्रेन सेट भी तैयार किए जाते हैं. आईसीएफ में तैयार कोच देश के अलग-अलग रेलवे जोन में भेजे जाते हैं. कई कोच विदेशों को भी भेजे जा चुके हैं. इस वजह से चेन्नई की यह फैक्ट्री भारत की रेल निर्माण क्षमता का बड़ा प्रतीक बन गई है.

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इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF).

आजादी के बाद क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत को रेल डिब्बों के लिए दूसरे देशों पर काफी निर्भर रहना पड़ता था. रेलवे का नेटवर्क बढ़ रहा था. यात्रियों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही थी. ऐसे में बड़ी संख्या में नए डिब्बों की जरूरत थी. भारत सरकार चाहती थी कि रेल कोच देश में ही बनें. वर्ष 1949-50 के रेल बजट में भारत में रेल कोच फैक्ट्री बनाने की बात सामने आई. बाद में चेन्नई के पेरम्बूर को इसके लिए चुना गया. फैक्ट्री का निर्माण शुरू हुआ और कुछ वर्षों बाद उत्पादन भी शुरू हो गया.

Namo Green Rail In Icf

ICF में बनी नमो ग्रीन रेल.

साल 1955 में निकला पहला कोच

इंटीग्रल कोच फैक्ट्री की शुरुआत वर्ष 1955 में हुई. दो अक्तूबर 1955 को यहां से पहला रेल कोच बाहर आया था. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस फैक्ट्री का उद्घाटन किया था. वर्ष 2026 में यह फैक्ट्री अपने 71वें वर्ष में है यानी करीब 71 वर्षों से यह इकाई भारतीय रेलवे के लिए काम कर रही है. शुरुआत में इसकी उत्पादन क्षमता सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे यह दुनिया की बड़ी रेल कोच फैक्ट्रियों में शामिल हो गई. यहां फर्निशिंग डिवीजन की शुरुआत वर्ष 1962 में हुई. इस डिवीजन में कोच के अंदर का काम होता है. जैसे सीटें, लाइट, पंखे, खिड़कियां, वायरिंग, पेंट और अन्य यात्री सुविधाएं.

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आईसीएफ कोच.

पहले बने पारंपरिक ICF कोच

आईसीएफ का नाम ही एक खास तरह के रेल कोच से जुड़ गया. इन्हें आईसीएफ कोच कहा गया. ये कोच लंबे समय तक भारतीय ट्रेनों की पहचान रहे. नीले रंग की कई एक्सप्रेस और मेल ट्रेनों में ऐसे ही डिब्बे दिखाई देते थे. इन कोचों में बीच में जुड़ने वाले हिस्से और गोलाई लिए हुए डिजाइन प्रमुख थे. वर्षों तक भारत की अधिकतर यात्री ट्रेनें इन्हीं डिब्बों के साथ चलीं. इनसे रेलवे को बड़ी संख्या में कोच उपलब्ध हुए. आईसीएफ कोचों ने भारतीय रेल के विस्तार में अहम भूमिका निभाई. सामान्य श्रेणी, स्लीपर, एसी और अन्य कई प्रकार के कोच इसी व्यवस्था में बनाए गए.

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एलएचबी कोच पुराने आईसीएफ कोचों की तुलना में अधिक सुरक्षित माने जाते हैं.

फिर आया एलएचबी कोच का दौर

समय के साथ रेलवे ने अधिक सुरक्षित और आधुनिक कोच निर्माण की तरफ कदम बढ़ाया. एलएचबी का अर्थ है लिंक-हॉफमैन-बुश डिजाइन. यह तकनीक जर्मनी से जुड़ी रही है. एलएचबी कोच पुराने आईसीएफ कोचों की तुलना में अधिक सुरक्षित माने जाते हैं. इनकी रफ्तार क्षमता बेहतर होती है. इनमें झटके कम लगते हैं. दुर्घटना की स्थिति में इनके डिजाइन को भी बेहतर माना जाता है. आईसीएफ ने पुराने कोचों के साथ-साथ एलएचबी कोचों का भी निर्माण शुरू किया. इससे भारतीय रेलवे का आधुनिकीकरण तेज हुआ. आज कई प्रमुख ट्रेनों में एलएचबी कोच लगाए जा चुके हैं.

लोकल ट्रेनों से लेकर मेट्रो तक बनाई

आईसीएफ का काम सिर्फ लंबी दूरी की ट्रेनों तक सीमित नहीं रहा. यहां उपनगरीय और कम दूरी की सेवाओं के लिए भी ट्रेनें बनाई गईं. इनमें ईएमयू, डीएमयू और मेमू जैसे ट्रेन सेट शामिल हैं. ईएमयू यानी इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट. ये ट्रेनें बिजली से चलती हैं. मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों के आसपास इनका उपयोग होता है. ये रोजाना लाखों यात्रियों को काम, स्कूल और बाजार तक पहुंचाती हैं.

डीएमयू यानी डीजल मल्टीपल यूनिट. इनका उपयोग उन मार्गों पर होता है, जहां बिजलीकरण नहीं हुआ था या सीमित था. मेमू ट्रेनें भी छोटी और मध्यम दूरी के यात्रियों के लिए उपयोगी हैं. आईसीएफ ने मेट्रो रेल के कोच भी बनाए हैं. यह दिखाता है कि फैक्ट्री ने समय के साथ अपनी तकनीक और उत्पादन क्षमता को लगातार बदला है.

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वंदे भारत कोच.

वंदे भारत ने दी आईसीएफ को नई पहचान

आईसीएफ की आधुनिक पहचान वंदे भारत ट्रेन से भी जुड़ी है. भारत की सेमी हाई-स्पीड वंदे भारत ट्रेन का शुरुआती निर्माण इसी फैक्ट्री में हुआ. पहले इसे ट्रेन-18 नाम दिया गया था. बाद में इसका नाम वंदे भारत एक्सप्रेस रखा गया. वंदे भारत पारंपरिक इंजन-कोच वाली ट्रेन से अलग है. इसमें अलग से आगे इंजन नहीं होता.

पूरा ट्रेन सेट एक इकाई की तरह काम करता है. इसमें आधुनिक सीटें, स्वचालित दरवाजे, बेहतर रोशनी, एयर कंडीशनिंग और यात्री सुविधाएं दी गई हैं. वंदे भारत के निर्माण ने आईसीएफ को नई तकनीक वाली ट्रेन फैक्ट्री के रूप में स्थापित किया. इससे यह संदेश गया कि भारत अब केवल सामान्य रेल डिब्बे नहीं, बल्कि आधुनिक ट्रेन सेट भी बना सकता है.

अब हाइड्रोजन ट्रेन का निर्माण

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन भी आईसीएफ, चेन्नई में तैयार की गई है. इस ट्रेन का डिजाइन रेलवे के रिसर्च डिजाइन्स एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइजेशन ने तैयार किया. इसका निर्माण आईसीएफ में हुआ. हाइड्रोजन ट्रेन को पर्यावरण के अनुकूल परिवहन का एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की मदद से बिजली बनाई जाती है. इस प्रक्रिया में सामान्य तौर पर कार्बन वाला धुआं नहीं निकलता. मुख्य रूप से जलवाष्प और गर्मी उत्पन्न होती है. इस ट्रेन में फ्यूल सेल, बैटरी, हाइड्रोजन भंडारण और कई सुरक्षा प्रणालियां लगाई गई हैं. हाइड्रोजन रिसाव, आग, धुआं और तापमान पर नजर रखने के लिए सेंसर भी लगाए गए हैं. यह परियोजना भारतीय रेलवे को हरित परिवहन की दिशा में आगे ले जाती है.

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ICF ने कई देशों को रेल कोच और बोगियां एक्सपोर्ट की हैं.

फैक्ट्री में कैसे बनता है एक कोच?

आईसीएफ में काम कई चरणों में होता है. यहां दो प्रमुख डिवीजन हैं. पहला है शेल डिवीजन. दूसरा है फर्निशिंग डिवीजन. शेल डिवीजन में कोच का बाहरी ढांचा बनता है. फर्निशिंग डिवीजन में भीतर का काम पूरा होता है. सीटें लगती हैं. दरवाजे लगाए जाते हैं. वायरिंग की जाती है. लाइट, पंखे, एसी, शौचालय और अन्य सुविधाएं जोड़ी जाती हैं. फिर कोच की जांच होती है. ब्रेक, बिजली, दरवाजे और सुरक्षा उपकरणों को परखा जाता है. सभी जरूरी परीक्षण पूरे होने पर कोच रेलवे को सौंपा जाता है.

विदेशों तक पहुंची आईसीएफ की पहचान

आईसीएफ में बने कोच केवल भारत में ही नहीं चल रहे हैं. यहां से कई देशों को रेल कोच और बोगियां भेजी गई हैं. थाईलैंड को वर्ष 1967 में शुरुआती निर्यात किया गया था. इसके बाद एशिया और अफ्रीका के कई देशों तक आईसीएफ के उत्पाद पहुंचे. इस सूची में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, तंजानिया, युगांडा और जाम्बिया जैसे देश शामिल रहे हैं. यह निर्यात भारत की निर्माण क्षमता का प्रमाण है. इससे यह भी पता चलता है कि चेन्नई की यह फैक्ट्री अंतरराष्ट्रीय जरूरतों के अनुसार भी काम कर सकती है.

चेन्नई के पेरम्बूर में स्थित यह फैक्ट्री करीब 71 वर्षों की मेहनत, तकनीक और आत्मनिर्भरता की कहानी है. पहले यहां सामान्य कोच बने. फिर लोकल ट्रेनें बनीं. मेट्रो कोच बने. वंदे भारत बनी. अब हाइड्रोजन ट्रेन भी बन चुकी है. यही आईसीएफ की सबसे बड़ी उपलब्धि है.

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दिनेश पाठक

दिनेश पाठक

मूलतः पाठक. पेशे से लेखक. कबीर की धरती पर जन्म. मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धरती अयोध्या में लालन-पालन, पढ़ाई-लिखाई. करियर की शुरुआत आदि गंगा के तट लखनऊ से. संगम तीरे प्रयागराज, मोहब्बत की निशानी ताजमहल के साये से लेकर देवभूमि उत्तराखंड, उद्योगनगरी के रूप में मशहूर रहे कानपुर और बाबा गोरखनाथ की धरती पर काम करते हुए विद्वतजन से कुछ न कुछ सीखा, करंट अफ़ेयर्स, यूथ, पैरेंटिंग, राजनीति, प्रशासन, गाँव, खेत-किसान पसंदीदा टॉपिक. स्कूल, कॉलेज युनिवर्सिटी में यूथ से गपशप करना एनर्जी का अतिरिक्त स्रोत. साल 1992 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुई इस पाठक की लेखन यात्रा कलम, डेस्कटॉप, लैपटॉप के की-बोर्ड से होते हुए स्मार्ट फोन तक पहुंच गयी. ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ रही है, सीखने, पढ़ने, लिखने की भूख भी बढ़ रही है. हिंदुस्तान अखबार में पांच केंद्रों पर एडिटर रहे. यूथ, पैरेंटिंग पर पाँच किताबें. एक किताब 'बस थोड़ा सा' पर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया.

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