world-news

कैंसर से लड़ें या दवा की कीमत से: सरकार को 333 रुपए में, मरीज के सामने एमआरपी 12,500; सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- मुनाफा इतना क्यों? - Bhopal News

October 6, 2026

कैंसर की दवाओं की एमआरपी और सरकारी खरीद दर के बीच का अंतर चौंकाने वाला है। 10 प्रमुख दवाओं की पड़ताल में यह अंतर 3 से 38 गुना तक मिला। सबसे ज्यादा अंतर पैक्लिटैक्सेल 260 एमजी में है। सरकार इसे ₹333 में खरीद रही है, जबकि अलग-अलग ब्रांड की एमआरपी ₹10 ह

.

सरकारी खरीद दर मरीज को मिलने वाली कीमत नहीं है। सरकार बड़ी मात्रा में खरीद करती है, इसलिए उसे कम दर मिलती है। लेकिन सवाल इस बड़े फासले का है- जब कंपनियां संस्थागत खरीद में दवाएं इतनी कम कीमत पर दे सकती हैं तो कुछ ब्रांड की एमआरपी कई गुना ज्यादा क्यों है? नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने 42 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं का ट्रेड मार्जिन अधिकतम 30% किया। इससे 500 से ज्यादा ब्रांड की कीमतें घटीं। लेकिन सभी कैंसर दवाएं इसके दायरे में नहीं हैं।

10 में से 8 दवाओं की एमआरपी 10 गुना ज्यादा

10 कैंसर दवाओं के विश्लेषण में 8 की अधिकतम एमआरपी सरकारी खरीद दर से 10 गुना या उससे ज्यादा है। इनमें 4 दवाओं में यह अंतर 20 गुना या उससे अधिक है। सबसे ज्यादा अंतर पैक्लिटैक्सेल में करीब 38 गुना और डोसेटैक्सेल में 37 गुना है।

दवासरकारी खरीदअधिकतम एमआरपीअंतर (कितने गुना)
पैक्लिटैक्सेल 260 एमजी₹333₹10,000 - 12,500करीब 38 गुना
डोसेटैक्सेल 120 एमजी₹369₹4,000 - 13,500करीब 37 गुना
बेवाकिज़ुमैब 100 एमजी₹1,309₹25,000 - 32,000करीब 24 गुना
जेमसिटाबीन 1 ग्राम₹352₹6,000 - 7,000करीब 20 गुना
रिटुक्सिमैब 100 एमजी₹990₹16,000 - 19,000करीब 19 गुना
रिटुक्सिमैब 500 एमजी₹4,495₹40,000 - 70,000करीब 16 गुना
ट्रास्टुज़ुमैब 440 एमजी₹5,613₹45,000 - 61,000करीब 11 गुना
पेगफिलग्रास्टिम 6 एमजी₹880₹4,000 - 9,000करीब 10 गुना
ऑक्सालिप्लैटिन 100 एमजी₹750₹4,000 - 5,200करीब 7 गुना
ईमाटिनिब 100 एमजी₹700₹1,500 - 2,000करीब 3 गुना

नोट: सरकारी खरीद कीमत के लिए मध्यप्रदेश हेल्थ कॉरपोरेशन की निर्धारित दरों को आधार बनाया गया है। अलग-अलग कंपनियों और ब्रांड की एमआरपी अलग-अलग है।

चालाकी : एक ही दवा के कई ब्रांड, हर ब्रांड की कीमत अलग

एक ही दवा अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग ब्रांड नाम से बेचती हैं और उनकी कीमतें भी अलग होती हैं। इसलिए मरीज का खर्च इस पर भी निर्भर करता है कि डॉक्टर ने कौन-सा ब्रांड लिखा है। डॉक्टर ब्रांड के बजाय जेनेरिक नाम लिखें तो सस्ता ब्रांड चुनने का विकल्प रहता है।

मरीज की मुश्किल... एमआरपी पता है, पर खरीद कीमत नहीं

मरीज को दवा की एमआरपी व चुकाई कीमत पता होती है, पर अस्पताल या मेडिकल स्टोर ने उसे कितने में खरीदा, यह नहीं। मसलन, ₹20 हजार एमआरपी की दवा ₹12 हजार में मिलने पर ₹8 हजार की छूट दिखेगी। अस्पताल ने वही दवा 10 हजार में खरीदी या ₹2 हजार में- मरीज नहीं जानता।

उपाय क्या? 23 अस्पताल साथ आए, उन्हें 82% तक सस्ती मिलीं

टाटा मेमोरियल ट्रस्ट की अगुवाई वाले नेशनल कैंसर ग्रिड ने शुरुआत में 23 अस्पतालों के लिए कैंसर की 40 प्रमुख दवाएं सामूहिक रूप से खरीदीं। कंपनियों ने एमआरपी पर औसतन 82% छूट दी। इससे ₹1320 करोड़ से ज्यादा की बचत हुई। अब ग्रिड में करीब 400 अस्पताल हैं।

भास्कर एक्सपर्ट

-डॉ. रमेश आर्य, कैंसर विशेषज्ञ

अस्पताल के मेडिकल स्टोर से दवा लेने की बाध्यता खत्म हो

कैंसर की बीमारी पहले ही परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ देती है। उस पर महंगा इलाज परिवार के लिए दूसरा संकट बन जाता है। मुनाफाखोरी रोकने के लिए अस्पताल के मेडिकल स्टोर से ही मरीज को दवा खरीदने की बाध्यता खत्म करनी होगी। वास्तविक कीमत और एमआरपी के बीच भारी अंतर कम करना होगा। फार्मास्यूटिकल कंपनियों और कॉर्पोरेट अस्पतालों के गठजोड़ पर नियंत्रण के लिए सरकारी सुविधाएं बढ़ाने और नियम मजबूत करने की जरूरत है।'

कैंसर दवाओं की खरीद और एमआरपी में कई गुना अंतर... 7 दिन में दो बार सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

22 सितंबर

2,700 की दवा ₹27 हजार में क्यों?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने ₹2,700 में रिटेलर को मिलने वाली कैंसर दवा की एमआरपी ₹27 हजार होने पर इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ कहा। जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल उठाया।

29 सितंबर

मार्जिन की यह खुली लूट नहीं, कत्लेआम है’

सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर दवाओं पर अस्पतालों के 10 गुना तक मार्जिन पर सवाल उठाते हुए इसे ‘कत्लेआम’ बताया। कहा- इलाज सेवा के बजाय कमाई का कारोबार बन रहा है। केंद्र से जवाब मांगा और अगली सुनवाई 12 अक्टूबर तय की।