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हाईकोर्ट...सरकारी जमीन का मालिकाना हक नहीं दे सकती न्याय पंचायत: 27 वर्ष से लंबित अपील खारिज,1959 में पाकिस्तान से आए व्यक्ति का था जमीन मिलने का दावा - Jabalpur News

August 28, 2026

जबलपुर हाईकोर्ट ने सरकारी जमीन के स्वामित्व को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि न्याय पंचायत को सरकारी जमीन का मालिकाना हक किसी निजी व्यक्ति को देने का अधिकार नहीं है। राज्य सरकार की जमीन का हस्तांतरण केवल राजस्व विभाग के सक्षम प्राधिकारी

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मामला सतना जिले के रघुराज नगर में सर्किट हाउस के पास स्थित करीब 40 डिसमिल जमीन से जुड़ा है। कमलेश कुमार पटेल ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका दावा था कि पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से 1947 में विस्थापित होकर भारत आए मूलचंद पोहानी को वर्ष 1959 में यह जमीन आवंटित की गई थी।

500 रुपए प्रीमियम जमा करने का था दावा

अपीलकर्ता के मुताबिक उस समय रीवा भूमि राजस्व और काश्तकारी संहिता 1935 के तहत गठित न्याय पंचायत ने जमीन देने की अनुमति दी थी और इसके लिए 500 रुपए प्रीमियम भी जमा किया गया था। मूलचंद पोहानी ने जमीन पर मकान बनाकर रहना शुरू किया था।

रिकॉर्ड के अनुसार 14 जून 1985 को मूलचंद पोहानी ने जमीन लाजपत राय को बेच दी। इसके बाद 16 जनवरी 1987 को लाजपत राय ने जमीन कमलेश कुमार पटेल को बेच दी। 14 अगस्त 1987 को कमलेश कुमार को जमीन पर अतिक्रमणकारी मानते हुए नोटिस जारी किया गया। विवाद निचली अदालत से होते हुए हाईकोर्ट पहुंचा और अपील लंबे समय तक लंबित रही।

मकान बनाने की अनुमति से मालिकाना हक नहीं

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच के बाद कहा कि केवल न्याय पंचायत की ओर से मकान बनाने की अनुमति दिए जाने से जमीन का मालिकाना हक हासिल नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जिससे यह साबित हो कि संबंधित व्यक्ति या उसके पूर्वज निर्धारित अवधि से पहले से जमीन पर वैध कब्जे में थे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि जमीन राज्य सरकार की है और कोई निजी व्यक्ति सरकार से मालिकाना हक मिलने का दावा करता है, तो उसका वैध हस्तांतरण राजस्व विभाग के सक्षम प्राधिकारी द्वारा ही होना चाहिए। न्याय पंचायत के पास सरकारी जमीन का स्वामित्व निजी व्यक्ति को देने का अधिकार नहीं था।

ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार

अदालत ने कहा कि न्याय पंचायत की मकान निर्माण संबंधी अनुमति भी अपीलकर्ता के पक्ष में स्वामित्व स्थापित नहीं करती। ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नहीं मिली। इसलिए कोर्ट ने निचली अदालत के निर्णय और डिक्री को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। राज्य सरकार की ओर से पैनल अधिवक्ता केके गौतम ने पैरवी की।