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चीन का गोल्ड रिजर्व 2,410 टन पहुंचा, 23 महीने से लगातार खरीदारी; आखिर क्यों खरीद रहा इतना सोना?

October 17, 2026

चीन का गोल्ड रिजर्व 2,410 टन पहुंचा, 23 महीने से लगातार खरीदारी; आखिर क्यों खरीद रहा इतना सोना?

चीन क्यों इतना गोल्ड खरीद रहा है?

चीन का सोने के प्रति आकर्षण कम होता नहीं दिख रहा है. देश का गोल्ड रिजर्व सितंबर 2026 में बढ़कर 2,410 टन पर पहुंच गया है. चीन के सेंट्रल बैंक पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने सितंबर में 23 टन सोना खरीदा, जो अक्टूबर 2023 के बाद किसी एक महीने में की गई सबसे बड़ी खरीद है. वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, चीन लगातार 23 महीने से अपने गोल्ड रिजर्व में इजाफा कर रहा है. इस साल जनवरी से सितंबर तक वह कुल 103 टन सोना जोड़ चुका है. सवाल उठता है कि आखिर चीन इतना सोना क्यों खरीद रहा है?

WGC के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई से सितंबर की तिमाही में PBoC ने कुल 63 टन सोना खरीदा. यह 2023 की तीसरी तिमाही के बाद सबसे बड़ी तिमाही खरीद रही. चीन के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 8.5 फीसदी है. खास बात यह है कि सितंबर में चीन का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 2 फीसदी घटकर करीब 3.8 ट्रिलियन डॉलर रह गया. इसकी मुख्य वजह विदेशी मुद्रा में रखी संपत्तियों की वैल्यू में गिरावट रही.

China Ke Pass Kitna Gold

चीन के पास कितना सोना?

चीन ने यह खरीदारी ऐसे समय में की, जब सितंबर में सोने की कीमतों में गिरावट आई थी. डॉलर में LBMA गोल्ड प्राइस 8.5 फीसदी और युआन में शंघाई बेंचमार्क कीमत 5.5 फीसदी फिसल गई. WGC के एनालिसिस के मुताबिक, इसकी वजह अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर मिलने वाले रिटर्न में बढ़ोतरी, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त पॉलिसी और मजबूत होता डॉलर था. इसके बावजूद पूरी तिमाही में सोने की कीमत में मामूली बढ़त दर्ज की गई. अक्टूबर की शुरुआत में कीमतें स्थिर रहीं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव 4,100 डॉलर प्रति औंस के ऊपर बना रहा.

डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश

एनालिस्ट के मुताबिक, चीन का मकसद अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना और अपने विदेशी मुद्रा भंडार को ज्यादा सुरक्षित बनाना है. मनी मेटल्स एक्सचेंज के एनालिस्ट माइक माहरे का कहना है कि सोना ऐसी संपत्ति है, जो किसी दूसरे देश की सरकार की देनदारी नहीं होती. डॉलर में रखी संपत्तियों की वैल्यू उस देश और उसके फाइनेंशियल सिस्टम के प्रदर्शन पर निर्भर करती है, जबकि सोने के साथ इस तरह का जोखिम नहीं जुड़ा होता.

इस स्ट्रैटेजी के पीछे दो बड़ी चिंताएं बताई जा रही हैं. पहली, अमेरिका पर लगातार बढ़ता कर्ज. अमेरिका अपने खर्च का बड़ा हिस्सा उधार लेकर चलाता है और डॉलर की ग्लोबल करेंसी वाली भूमिका से उसे अपने बजट घाटे की भरपाई करने में मदद मिलती है, लेकिन अगर दुनिया भर की सरकारें और इन्वेस्टर्स डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड रखने में दिलचस्पी कम कर दें, तो अमेरिका के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है और डॉलर पर दबाव बढ़ सकता है.

हांगकांग को बनाना चाहता है गोल्ड हब

चीन की स्ट्रैटेजी सिर्फ सेंट्रल बैंक की खरीद तक सीमित नहीं है. वह हांगकांग को फिजिकल गोल्ड की ट्रेडिंग और पेमेंट सेटलमेंट का बड़ा ग्लोबल सेंटर बनाने की कोशिश कर रहा है. इसके तहत सोना रखने की क्षमता बढ़ाई जा रही है और युआन में कारोबार होने वाले फ्यूचर्स और ट्रेडिंग सिस्टम को डेवलप किया जा रहा है.

सोने की कीमत किस करेंसी में तय होती है और उसका पेमेंट किस करेंसी में होता है, यह काफी मायने रखता है. अगर इंटरनेशनल गोल्ड ट्रेडिंग का बड़ा हिस्सा डॉलर की जगह युआन में होने लगे, तो ग्लोबल ट्रेड में चीनी करेंसी की भूमिका बढ़ सकती है. इससे देशों और कारोबारियों को डॉलर सिस्टम से बाहर लेन-देन करने का एक और रास्ता मिल सकता है.

Why China Buy Gold

घरेलू बाजार में भी बढ़ी मांग

चीन में सोने की मांग सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं बढ़ी है. WGC के मुताबिक, सितंबर में चीनी गोल्ड ETF में 11 टन सोना जुड़ा. यह लगातार तीसरा महीना था, जब इनकी होल्डिंग बढ़ी. गोल्ड ETF में कुल होल्डिंग 304 टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. तीसरी तिमाही में इनमें करीब 3.9 अरब डॉलर का निवेश आया.

इसकी वजह स्थानीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच निवेश को अलग-अलग जगह बांटने की जरूरत और सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले रिटर्न में कमी बताई गई है. सेंट्रल बैंक की तरफ से लगातार सोना खरीदने की जानकारी ने भी इन्वेस्टर्स का भरोसा बढ़ाया.

हालांकि, तस्वीर पूरी तरह अच्छी नहीं है. सोने के गहनों की कमजोर मांग के चलते तीसरी तिमाही में चीन की थोक सोना मांग 234 टन रही. यह पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 21 फीसदी कम और पिछले 10 साल के औसत से 44 फीसदी नीचे है.

डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म नहीं होगा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन सबके बावजूद डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म होने की संभावना नहीं है. डॉलर आज भी ग्लोबल ट्रेड और फाइनेंस का एक अहम हिस्सा है. हालांकि, अगर विदेशी मुद्रा भंडार में निवेश को अलग-अलग संपत्तियों में बांटने का यह ट्रेंड जारी रहता है, तो लंबे समय में डॉलर पर आधारित संपत्तियों की विदेशी मांग घट सकती है.

फिलहाल, चीन की लगातार सोना खरीदने की स्ट्रैटेजी ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि आने वाले समय में दुनिया का फाइनेंशियल सिस्टम कैसा होगा और क्या सोना डॉलर पर निर्भरता कम करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है.

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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