.
प्रदेश का आदिवासी बहुल जिला शिक्षा के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश कर रहा है। पिछले वर्ष की तुलना में 105% से अधिक नामांकन हासिल कर बड़वानी प्रदेश के अग्रणी जिलों में शामिल हो चुका है। अब कलेक्टर जयति सिंह के निर्देशानुसार जिले को शीर्ष स्थान पर बनाए रखने के लिए मिशन 110% का लक्ष्य तय किया गया है, लेकिन कागजी आंकड़ों से इतर, धरातल पर शत-प्रतिशत नामांकन और बच्चों के ठहराव की राह में मौसमी पलायन, ड्राफ्ट बॉक्स की पेंडेंसी और सामाजिक परिस्थितियां सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं।
जिले में कक्षा 1 से 12 तक कुल 2,71,030 बच्चों का नामांकन दर्ज हो चुका है, जो पिछले वर्ष (2,66,408) की तुलना में 101.73% है। वहीं प्राथमिक स्तर (कक्षा 1) में जिले ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 105.05% का आंकड़ा छुआ है। पाटी ब्लॉक में सर्वाधिक 108.00% तथा सेंधवा में 107.07% नामांकन दर्ज किया गया है। हालांकि कक्षा 1 से 8 के कुल नामांकन में पानसेमल (99.69%), पाटी (99.81%), राजपुर (99.97%) और ठीकरी (98.98%) में अभी भी कुछ बच्चे शेष हैं, जिन्हें कवर करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। वर्तमान में लगभग 24,000 बच्चे ड्राफ्ट बॉक्स में हैं (जो पोर्टल पर तकनीकी कारणों से दिख नहीं रहे हैं)। इसके अलावा, लगभग 35,000 बच्चों का आंकड़ा पेंडिंग सूचियों में दर्ज है। सभी प्रधान पाठकों और जन शिक्षकों को निर्देशित किया गया है कि वे हमारा शिक्षा ऐप के जरिए डोर-टू-डोर सर्वे कर इन बच्चों को चिह्नांकित करें। इन बच्चों को शाला में दर्ज कर एजुकेशन पोर्टल 3.0 और यू-डाइस पर मैप करने का काम 6 तारीख तक पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। 30 सितंबर 2026 तक जिन बच्चों की आयु 6 वर्ष पूर्ण हो रही है। पलायन और सामाजिक अड़चनें: ग्राउंड टीम का मानवीय संघर्ष
{ सहायक परियोजना समन्वयक (नामांकन एवं ठहराव) अशरफ खान के अनुसार, फील्ड में ग्राउंड टीम को रोजाना बेहद जटिल और संवेदनशील परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। { जिले में बड़े पैमाने पर मौसमी पलायन होता है। जब माता-पिता पिकअप वाहनों में मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं, तो वे घर के बड़े बच्चों (कक्षा 5वीं से 8वीं) को छोटे बच्चों की देखभाल के लिए साथ ले जाते हैं या रोक लेते हैं। { शिक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे छोटे बच्चों को भी स्कूल की कक्षा में साथ बैठने दें, ताकि बड़े भाई-बहन अपनी पढ़ाई जारी रख सकें और ड्रॉप-आउट न हों। { दुर्गम क्षेत्रों में एक मामले में पिता ने बच्चे को स्कूल भेजने के बजाय बकरियां चराने में लगा दिया था। अधिकारी ने पिता को समझाया कि चंद बकरियों के पीछे बच्चे का भविष्य बर्बाद न करें, जिसके बाद बच्चे का दाखिला संभव हो सका। { पाटी ब्लॉक की एक छात्रा 5वीं के बाद अस्वस्थ रहने के कारण स्कूल छोड़ने वाली थी। अधिकारियों ने परिजनों को समझाया कि नामांकन होने पर छात्रा को शासकीय योजनाओं (निशुल्क पुस्तकें, गणवेश, मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति) का लाभ मिलेगा और ठीक होने तक शिक्षक उपस्थिति में लचीलापन रखेंगे ताकि उसका साल बर्बाद न हो।
फील्ड में मौसमी पलायन और पारिवारिक परिस्थितियां बच्चों की निरंतरता में सबसे बड़ी बाधा बनती हैं। हमारा उद्देश्य केवल कागजी नामांकन पूरा करना नहीं, बल्कि बच्चे को वास्तव में स्कूल से जोड़े रखना है। पलायन से प्रभावित बच्चों को भी यदि हम साल में कम से कम 100 दिन शाला ला पाते हैं, तो उनकी बुनियादी दक्षता में सुधार किया जा सकता है। इसके लिए हमारी टीमें गांव-गांव जाकर पालकों की काउंसलिंग कर रही हैं। - अशरफ खान, एपीसी (नामांकन व ठहराव), बड़वानी