राजस्थान के कोटा की रहने वाली तन्वी को दिल्ली के AIIMS में गंभीर दिल की बीमारी का पता तब चला, जब तन्वी 2 साल की थी. तब डॉक्टरों ने सर्जरी कराने को कहा था. लेकिन वह सर्जरी कभी नहीं हो पाई. 13 साल तक तारीखें मिलीं, इंतजार बढ़ा और 1 सितंबर 2026 को 15 साल की उम्र में तन्वी ने AIIMS परिसर में ही दम तोड़ दिया. यह सिर्फ एक परिवार का किस्सा नहीं है. यह उस व्यवस्था की कहानी है जिसमें देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सालों-साल सर्जरी का इंतजार करना पड़ता है. आखिर AIIMS दिल्ली समेत देश भर के बड़े अस्पतालों में वेटिंग पीरियड कितना है और वजहें क्या हैं...
तन्वी की कहानी: जब 13 साल बेकार गुजरे
तन्वी पारियानी को 2012 में पहली बार AIIMS दिल्ली ले जाया गया. 31 जनवरी 2014 के AIIMS के एक मेडिकल दस्तावेज में उसे 'दिल में छेद और फेफड़ों तक खून पहुंचाने वाली धमनी का न होना' डायग्नोस किया गया. डॉक्टरों ने सर्जरी की सिफारिश की, जिसका खर्चा करीब 1.2 लाख रुपए आंका गया.
परिवार का आरोप है कि 2015 में सर्जरी की तारीखें तय भी हुईं, लेकिन बार-बार बदलती रहीं और ऑपरेशन कभी हो ही नहीं पाया. 2018 में AIIMS ने सर्जरी से इनकार कर दिया. डॉक्टरों ने बताया कि तन्वी की फेफड़ों की धमनियां लगभग खत्म हो चुकी थीं. तन्वी के दिल की बनावट इतनी जटिल थी कि सर्जरी जानलेवा साबित हो सकती थी.
24 अगस्त 2026 को तन्वी को हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट की संभावना जांचने के लिए AIIMS में भर्ती कराया गया. 31 अगस्त की शाम करीब 7 बजे उसका एंडोस्कोपी टेस्ट हुआ. 1 सितंबर को सुबह 2:50 बजे उसे थकान और कमजोरी महसूस हुई, ऑक्सीजन लेवल गिरकर 48% पर आ गया. सुबह 3:30 बजे ऑक्सीजन दी गई, लेकिन तब तक कार्डियक अरेस्ट हो चुका था. सुबह 5:06 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया.
तन्वी के पिता मुकेश पारियानी का कहना है कि अगर समय पर सर्जरी हो जाती तो उनकी बेटी आज जिंदा होती. यह सवाल हर उस परिवार के मन में है जो सरकारी अस्पतालों में सर्जरी के लिए महीनों और सालों कतार में खड़ा है.
AIIMS दिल्ली में वेटिंग पीरियड कितना?
AIIMS दिल्ली में अलग-अलग बीमारियों के लिए 6 महीने से 5 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है...
कार्डियो-थोरेसिक-वैस्कुलर सर्जरी (दिल की सर्जरी)
यह वही विभाग है जहां तन्वी का इलाज होना था. 2025 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया कि कार्डियो-थोरेसिक-वैस्कुलर सर्जरी में प्लान्ड (यानी नॉन-इमरजेंसी) सर्जरी का इंतजार दो साल तक हो सकता है.
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस विभाग में 690 मरीज सर्जरी का इंतजार कर रहे हैं. ये सिर्फ AIIMS दिल्ली के आंकड़े हैं. हालांकि सरकार ने यह भी कहा कि किसी भी दिल के मरीज को एक साल से ज्यादा की तारीख नहीं दी गई है. 'एक साल से कम' का मतलब यह नहीं कि इंतजार कम है. एक साल भी बहुत लंबा समय है, खासकर जब जान दांव पर लगी हो.
न्यूरोसर्जरी (दिमाग और नसों की सर्जरी)
यहां हालात और भी बदतर हैं. न्यूरोसर्जरी में 1,324 मरीज इंतजार की कतार में हैं. वेटिंग पीरियड दो साल तक का हो सकता है. संसदीय रिपोर्ट के मुताबिक, न्यूरोसर्जरी में इंतजार 5 साल तक भी पहुंच जाता है.

आंख, बच्चे, बर्न्स एंड प्लास्टिक, यूरोलॉजी और डेंटल जैसे कुछ विभागों में बिल्कुल भी वेटिंग नहीं है. बशर्ते मरीज क्रिटिकल ट्रीटमेंट ले रहा हो.
देश भर में बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए कितना इंतजार?
लोक नायक जयप्रकाश नारायण (LNJP) अस्पताल
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, LNJP अस्पताल में जनरल सर्जरी के लिए 2 से 3 महीने और बर्न्स एंड प्लास्टिक सर्जरी के लिए 6 से 8 महीने का इंतजार करना पड़ता है. CAG रिपोर्ट में यह भी पता चला कि LNJP के सर्जरी विभाग का एक बड़ा ऑपरेशन थिएटर 2016-17 से लेकर अगस्त 2022 तक बंद पड़ा था.
LNJP के निदेशक डॉ. राकेश चौधरी ने खुद माना कि मरीजों के अनुपात में ऑपरेशन थिएटर कम हैं और 24 घंटे ऑपरेशन थियेटर (OT) चालू नहीं रहता. बच्चों की सर्जरी (पीडियाट्रिक) के लिए 12 महीने तक की वेटिंग है.
सफदरजंग अस्पताल में भी हालत कुछ अलग नहीं
दिल की बीमारियों के मामले में 37,000 मरीज सर्जरी की कतार में हैं और 30,000 मरीज एंजियोप्लास्टी का इंतजार कर रहे हैं. यानी करीब 67,000 मरीज सिर्फ दिल के इलाज के लिए कतार में खड़े हैं.
हार्ट सर्जरी का औसत इंतजार 1.5 साल है, जबकि कुछ मरीजों को 2 साल तक इंतजार करना पड़ता है. AIIMS की तरह सफदरजंग और RML अस्पताल भी इसी भीड़-भाड़ की समस्या से जूझ रहे हैं. सफदरजंग में रोजाना 2,000 दिल के मरीज OPD में आते हैं.
RML अस्पताल में भी मरीजों की भारी भीड़
राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में इंतजार कम करने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं. यूरोलॉजी विभाग में अपग्रेडेड ऑपरेशन थिएटर लगाए गए हैं, जिससे रोजाना 18 से 20 सर्जरी हो पा रही हैं. लेकिन पूरे अस्पताल में बेड की कमी और इमरजेंसी में भी मरीजों को जमीन पर लेटना पड़ता है. संसद में भी यह माना गया कि RML में मरीजों की संख्या संसाधनों से कहीं ज्यादा है.
चंडीगढ़: पीजीआईएमईआर (PGI)
PGIMER चंडीगढ़ देश के टॉप मेडिकल संस्थानों में गिना जाता है, लेकिन यहां भी वेटिंग की समस्या गंभीर है. प्लांड सर्जरी के लिए 4 से 6 महीने का इंतजार था. इसे कम करने के लिए PGI ने ऑपरेशन थिएटर का समय सुबह 8 बजे से रात 8 बजे (12 घंटे) कर दिया.
सर्जरी की संख्या में 10.46% की बढ़ोतरी हुई और वेटिंग पीरियड में 30-40% की कमी आई. पहले जहां 2 से 6 महीने की वेटिंग थी, अब मरीजों को तय तारीख से पहले ही ऑपरेशन का मौका मिल रहा है. किडनी ट्रांसप्लांट के लिए 3 महीने का इंतजार होता था, जो बढ़कर 4 महीने हो गया.
हैदराबाद: तेलंगाना के बड़े अस्पताल
हैदराबाद के तीन बड़े सरकारी अस्पतालों उस्मानिया जनरल हॉस्पिटल (OGH), गांधी हॉस्पिटल और NIMS में कुछ इलाज और सर्जरी के लिए 3 से 5 महीने का इंतजार करना पड़ता है. तेलंगाना के डायरेक्टर ऑफ मेडिकल एजुकेशन डॉ. ए. नरेंद्र कुमार ने खुद यह माना है.
इन अस्पतालों में महीनों से वेटिंग पर पड़े मामलों को अब नए TIMS सनथनगर अस्पताल में भेजा जा रहा है. गांधी हॉस्पिटल में रोजाना 1,500 से ज्यादा OPD मरीज आते हैं. NIMS में रोबोटिक सर्जरी की मदद से वेटिंग पीरियड महीनों से घटकर कुछ दिनों पर आ गया है.
पटना (बिहार): AIIMS पटना, IGIMS और PMCH
- AIIMS पटना में न्यूरोसर्जरी (दिमाग की सर्जरी) के लिए 2 साल से ज्यादा का इंतजार है. कैंसर के मरीजों को भी डेढ़ साल बाद का समय मिलता है. ऑर्थोपेडिक सर्जरी के लिए एक साल का इंतजार है. AIIMS पटना में न्यूरोसर्जरी निजी अस्पतालों के मुकाबले 5 गुना सस्ती है, लेकिन इतना लंबा इंतजार मरीजों के काम का नहीं रहता.
- IGIMS में सामान्य और सुपर स्पेशियलिटी सर्जरी के लिए 3 से 4 महीने का इंतजार करना पड़ता है. न्यूरोसर्जरी के लिए 2 से 3 महीने, कॉर्निया ट्रांसप्लांट के लिए 1 से 3 साल, विट्रोरेटिनल सर्जरी के लिए 1 से 3 महीने, अल्ट्रासाउंड जांच के लिए 3 महीने तक की वेटिंग, ऑर्थोपेडिक फ्रैक्चर और कूल्हा प्रत्यारोपण के लिए 15 दिन से 1 महीने का इंतजार करना पड़ता है.
- PMCH में सर्जरी के लिए डेढ़ से दो महीने और न्यूरोसर्जरी के लिए 2 से 3 महीने रुकना पड़ता है.
बिहार के सरकारी अस्पतालों में हर 200 बेड पर सिर्फ एक ऑपरेशन थिएटर है. यानी संसाधन बेहद सीमित हैं, जबकि मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है. बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने इस समस्या को कम करने के लिए AIIMS पटना, मेदांता और IGIMS के सहयोग से योजना बनाई है.
AIIMS भोपाल (मध्य प्रदेश)
यहां मरीजों को CT स्कैन और MRI जैसी जांचों के लिए ही 3-4 महीने से लेकर 1 साल तक का इंतजार करना पड़ता है. एक मामले में तो एक महिला को MRI के लिए 16 महीने बाद की तारीख दी गई. गर्भवती महिलाओं को सोनोग्राफी के लिए 3 महीने का इंतजार है.
इसके अलावा:
- केरल: कोझीकोड मेडिकल कॉलेज में अकेले 196 मरीज हार्ट सर्जरी का इंतजार कर रहे हैं. यहां सिर्फ इमरजेंसी सर्जरी होती है, बाकी मरीजों को दो महीने से ज्यादा इंतजार करना पड़ता है.
- तमिलनाडु: कार्डियो-थोरेसिक सर्जरी के लिए करीब 300 मरीज कतार में हैं, वेटिंग 1.5 से 3 महीने तक.
- जम्मू: सरकारी अस्पतालों में आयुष्मान भारत योजना के तहत गॉल ब्लैडर, बवासीर, हर्निया या अपेंडिक्स की सर्जरी के लिए 2-3 महीने का इंतजार.
आखिर इतने लंबे इंतजार की वजहें क्या हैं?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, देश भर के अस्पतालों में मरीजों के इंतजार की एक जैसी 4 बड़ी वजहें हैं:
1. डॉक्टरों और स्टाफ की भारी कमी
AIIMS दिल्ली में ही फैकल्टी के 1,306 पदों में से 508 (39%) पद खाली हैं. नॉन-फैकल्टी स्टाफ के 13,911 पदों में से 3,056 (22%) पद भी खाली पड़े हैं. तमिलनाडु में कार्डियोथोरेसिक सर्जनों की 50-60% पद खाली हैं.
केरल में भी सरकारी अस्पतालों में मानव संसाधनों की भारी कमी है. स्टाफ न होने से मौजूदा डॉक्टरों पर काम का बोझ बढ़ जाता है. रेजिडेंट डॉक्टरों को अक्सर लगातार 36 घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है.
2. OT और ICU बेड जैसे संसाधन बेकार
स्टाफ की कमी के कारण मौजूदा सुविधाओं का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता. AIIMS दिल्ली में 112 में से 26 (लगभग 23%) ऑपरेशन थिएटर और 433 में से 81 (18.7%) ICU बेड बंद पड़े हैं. कुल 4,178 बेड में से 843 (20%) बेड भी इस्तेमाल नहीं हो पा रहे.
दिल्ली के राजीव गांधी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में 12 में से 6 और जनकपुरी अस्पताल के सभी 7 मॉड्यूलर OT स्टाफ की कमी के कारण बेकार पड़े हैं. लोक नायक अस्पताल का एक बड़ा OT 2016-17 से अगस्त 2022 तक बंद पड़ा रहा.
3. मरीजों का अत्यधिक बोझ
सरकारी अस्पताल और सुपर-स्पेशियलिटी संस्थानों में पूरे देश से मरीज आते हैं. AIIMS दिल्ली के अकेले चार विभागों में 2,347 मरीज सर्जरी की कतार में हैं. 1,324 न्यूरोसर्जरी में, 690 कार्डियो-थोरेसिक-वैस्कुलर में, 305 सर्जिकल ऑन्कोलॉजी में और 28 कोक्लियर इम्प्लांट के लिए.
दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, हर डॉक्टर औसतन 87 मरीजों को देखता है. इससे प्रति मरीज पांच मिनट से भी कम समय मिल पाता है. बिहार के IGIMS और AIIMS पटना में भी मरीजों को 3-4 महीने का इंतजार करना पड़ रहा है.
4. प्रशासनिक देरी, फंड का गलत इस्तेमाल और धीमी भर्ती
खाली पदों को भरने की प्रक्रिया बेहद धीमी है. सीनियर रेजिडेंट के 887 विज्ञापित पदों में से सिर्फ 440 ही भरे जा सके.
CAG रिपोर्ट के मुताबिक, नए अस्पताल बनाने की बात कही गई, लेकिन ऑडिट अवधि के दौरान आठ में से सिर्फ तीन ही पूरे हो पाए. कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली सरकार को मिले 787 करोड़ रुपए में से सिर्फ 582 करोड़ ही खर्च हुए. स्वास्थ्यकर्मियों के लिए आवंटित 52 करोड़ में से महज 30 करोड़ का इस्तेमाल हुआ.
वहीं, प्राइवेट अस्पतालों की तुलना में कम वेतन और सुविधाओं के कारण अनुभवी डॉक्टर सरकारी सेवा में आने से कतराते हैं. इससे अट्रिशन (नौकरी छोड़ने) की दर भी बढ़ जाती है.