
'उत्तर दा पुत्तर' में अनु कपूर
इस हफ्ते थिएटर में रिलीज अनु कपूर की फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ दिलचस्प कहानी लेकर आई है. अंधविश्वास बनाम कर्म की कहानी, स्ट्रोलॉजी के नाम पर बिजनेस की कहानी, डर के मार्केटिंग की कहानी और डर की दवाई बेचने के साथ-साथ सरकारी दफ्तर में घूसखोरी की कहानी. लेकिन दिलचस्प सवाल है कि क्या दिल्ली जैसे महानगर में वास्तु दोष से पूरी तरह मुक्त आवास हासिल किया जा सकता है? यह सवाल भले ही थोड़ा अटपटा लगे लेकिन फिल्म की बानगी बताती है कि ये कहानी भी घर-घर की है. इंसान चाहे कितना भी पढ़ा-लिखा हो, मॉडर्न हो या कि संपन्न वर्ग का हो- अंधविश्वास और टोने-टोटके से शायद ही बचा रहता है. फिल्म में अनु कपूर ऐसे ही फिजिक्स के प्रोफसर हैं जो दिल्ली में वास्तु दोष से मुक्त मकान खरीदना चाहते हैं.
इन दिनों हर शहर में लोग अंधविश्वास के डर और विभागीय भ्रष्टाचार के शिकार हैं. रविंद्र सिवाच के निर्देशन में आई यह कॉमेडी ड्रामा जॉनर की मूवी है. फिल्म हंसाते-गुदगुदाते हुए कई मोर्चे पर यही कटाक्ष करती है. और चुपके से बड़ा मैसेज भी छोड़ जाती है. फिल्म में एक जगह अंग्रेजी के नाटककार शेक्सपीयर की एक लाइन का इस्तेमाल किया गया है- The fault is not in our stars but ourselves मतलब गलती हमारे सितारों में नहीं, बल्कि हममें है. यह लाइन ही फिल्म की कहानी का सार है.
क्या है कहानी?
‘उत्तर दा पुत्तर’ की कहानी की धुरी में किराए के घर में रहने वाले साईं राम टुटेजा है, जिस रोल को अनु कपूर ने बड़े ही सलीके से निभाया है. टुटेजा फिजिक्स के प्रोफेसर हैं. क्लास में फिजिक्स के बड़े-बड़े जटिल सिद्धांतों की व्याख्या करते हैं. छात्रों को टॉपर बनाते हैं. लेकिन निजी जिंदगी में घोर अंधविश्वासी हैं. शनिवार को पूरी तरह से काली पोशाक धारण करते हैं और वास्तु के सारे नियम कायदे का पूरा पालन करने के कट्टर हिमायती हैं.
दूसरी तरफ उनकी पत्नी गिन्नी (रुखसार रहमान) को टुटेजा की टोटकेबाजी बिल्कुल पसंद नहीं. मतभेद बढ़ता है तो गिन्नी घर छोड़ देती है. कहानी में सबसे अनोखा मोड़ तब आता है जब टुटेजा को उसकी पत्नी बताती है कि वह गर्भवती है और उसकी ख्वाहिश है कि वह बच्चे के साथ किराए के घर में नहीं बल्कि अपने घर में रहे. यानी बच्चे के जन्म से पहले मकान अपना हो.
इसके बाद साईं राम टुटेजा का ऐसा घर खरीदने का अभियान शुरू होता है जो वास्तु दोष से पूरी तरह से मुक्त हो. उसके इस अभियान में उसका दोस्त मन्नू यानी बृजेंद्र काला मदद करता है. लेकिन क्या टुटेजा को पत्नी और बच्चे के साथ रहने के लिए दिल्ली जैसे शहर में वास्तु दोष से मुक्त मकान मिल पाता है, अगर मिलता है तो उसे किन मुश्किलों से होकर गुजरना पड़ता है, ये जानने के लिए इस फिल्म को देखें.
कलाकारों का अभिनय
‘उत्तर दा पुत्तर’ में वैसे तो मुख्य कलाकार अनु कपूर हैं लेकिन उनके अलावा पत्नी गिन्नी के रोल में रुखसार रहमान, दोस्त की भूमिका में बृजेंद्र काला, चड्ढा के रोल में पवन मलहोत्रा, चोपड़ा के रोल में नितिन अरोड़ा, सिद्धू के रोल में जिवेशु अहलुवालिया आदि ने भी बेहतरीन अदाकारी दिखाई है. अनु कपूर एक बार फिर सधे हुए अभिनेता के रूप में सामने आए हैं. पूरी फिल्म उनके कंधे पर ही है, शुरू से अंत तक दर्शकों का भरपूर मनोरंजन कराने में कामयाब हुए हैं.
फिल्म के कई सीन में अनु कपूर की एक्टिंग प्रभावित करती है. मसलन चारों तरफ से जब वो मुश्किलों से घिर जाते हैं तब वो एक सीन में रात के वक्त शराब पीते हुए जो बोलते हैं, वह दिल को छूने वाला है. उनका संवाद है- “ओ तारों, क्यों तुम मेरी किस्मत पर ताला मारकर बैठे हो, दुश्मनी मैं तुमसे कर नहीं सकता, दोस्ती का हाथ बढ़ाता हूं तो मुंह फेर लेते हो… क्या-क्या नहीं किया मैंने तुम्हारी चाल से चाल मिलाने के लिए… फिर भी तुम्हारा जब मन आया, जैसे मन आया सब कुछ छीन लिया, तुम्हीं सब कुछ हो, मैं कुछ नहीं.”
गीत-संगीत और संवाद
फिल्म के संवाद ह्यूमरस हैं लेकिन कहीं-कहीं बड़े हल्के हैं तो बोझिल भी. दर्शक कहीं कहीं खूब हंसते हैं तो उन्हें बोरियत भी होती है. ऐसे प्वाइंट्स पर अच्छे सब्जेक्ट के बावजूद फिल्म कमजोर हो जाती है. जैसे कि गिन्नी का एक संवाद है- “जंतर मंतर टोना टोटका/ इससे ही कुछ बदलना होता/ तो फिजिक्स छोड़ क्लास में यही पढ़ाओ/ बिना पढ़ाए ही सबको आईआईटी पहुंचा दो”. या फिर टुटेजा का संवाद- “मैंने सदा भगवान को माना…सब कुछ तुम्हारा है, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा… अब मेरे कर्म किसी डर से निर्धारित नहीं होंगे, मेरे कर्म निर्धारित होंगे मेरी बुद्धि और विवेक से.”
कुछ गाने मसलन ‘दाव पेंच कर खेल खाल दो- किस्मत को तू लंगड़ी डाल दो’ सुनने में अच्छे लगते हैं और गुदगुदाते हैं.
फिल्म का कमजोर पक्ष
इसमें कोई दो राय नहीं कि अनु कपूर की ‘उत्तर दा पुत्तर’ एक अनोखी कहानी लेकर आई है. इसे प्रोड्यूसर संदीप कपूर और डायरेक्टर रविंदर सिवाच ने मिलकर लिखा है. कॉमेडी जॉनर की यह फिल्म अंधविश्वास मुक्त समाज की वकालत करती है और इंसान को कर्मवादी बनने की सीख देती है. लेकिन इसकी कमजोरी इसके कुछ ज्यादा ही प्रिडिक्टेबल होने में है. फिल्म में आगे क्या-क्या होने वाला है- ये सबकुछ क्लियर होता जाता है. अनप्रिडिक्टेबलिटी बनी रहती तो यह अधिक से अधिक दर्शकों को बांध पाने में कामयाब होती.
रेटिंग- 3.5*
फिल्म- उत्तर का पुत्तर (थिएटर) निर्देशक- रविंद्र सिवाच सितारे- अनु कपूर, रुखसार रहमान, बृजेंद्र काला, पवन मलहोत्रा आदि.
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संजीव श्रीवास्तव
संजीव श्रीवास्तव का पैतृक गांव-घर बिहार के सीतामढ़ी में है लेकिन पिछले करीब ढाई दशक से दिल्ली से लेकर मुंबई तक मीडिया की मुख्यधारा में सक्रिय हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ से लेकर क्रिएटिव राइटिंग तक का हुनर रखते हैं, देश-विदेश की राजनीति, फिल्म, लिटरेचर, क्राइम जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखते हैं. आसानी से समझ आने वाली और सोचने-विचारने वाली भाषा लिखना पसंद है. सिनेमा प्रिय विषय है- लिहाजा फिल्मों पर अब तक तीन किताबें, दो उपन्यास और कुछ पटकथा-संवाद भी लिख चुके हैं. कुछेक प्रिंट मीडिया में सब एडिटरी के बाद साल 2000 से टीवी न्यूज़ की दुनिया में प्रवेश. सबसे पहले जैन टीवी फिर सहारा समय में करीब 14 साल गुजारा, जहां प्राइम टाइम स्पेशल शोज/प्रोग्राम बनाने से लेकर मुंबई की एंटरटेंमेंट फील्ड में रिपोर्टिंग तक की. उसके बाद सूर्या समाचार, एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ इंडिया के आउटपुट होते हुए अब डिजिटल मीडिया में TV9 से सम्बद्ध.
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