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UP MLA Fund Report 2024-25: 75 जिलों में 44,726 कार्य प्रस्तावित, 27,629 पूरे; 7,615 प्रस्ताव निरस्त

July 13, 2026

UP MLA Fund Report 2024-25: उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान विधानमंडल क्षेत्र विकास निधि योजना के अंतर्गत कुल 44,726 विकास कार्यों की अनुशंसा की गई। इनमें से 36,561 कार्य स्वीकृत हुए, जबकि 7,615 कार्य निरस्त अथवा अस्वीकृत दर्ज हैं। स्वीकृत परियोजनाओं में 33,415 कार्य प्रारम्भ हुए और 27,629 कार्य पूरे किए जा चुके हैं।

UP MLA Fund Report 2023-24: उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में विधायक निधि से कितने काम हुए,

उत्तर प्रदेश ग्राम्य विकास विभाग के MLA LADS UP पोर्टल पर उपलब्ध जनपदवार रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 के स्वीकृत कार्यों में अभी 5,786 परियोजनाएं अपूर्ण हैं। इसके अलावा 3,146 स्वीकृत कार्य शुरू नहीं हो सके। प्रदेश स्तर पर 550 कार्य स्वीकृति के लिए लंबित दर्ज किए गए हैं।

उत्तर प्रदेश विधायक निधि 2024-25 के प्रमुख आंकड़े

श्रेणीकार्यों की संख्या
कुल अनुशंसित कार्य44,726
स्वीकृति के लिए कुल लंबित550
कुल स्वीकृत कार्य36,561
निरस्त अथवा अस्वीकृत कार्य7,615
निविदा के लिए लंबित3,214
निविदा प्रक्रिया में56
निविदा प्रक्रिया पूर्ण33,291
कार्य प्रारम्भ33,415
अनारम्भ कार्य3,146
पूर्ण कार्य27,629
अपूर्ण कार्य5,786

वर्ष 2024-25 में अनुशंसित कार्यों के मुकाबले लगभग 81.74 प्रतिशत परियोजनाओं को स्वीकृति मिली। कुल अनुशंसित प्रस्तावों में करीब 17.03 प्रतिशत कार्य निरस्त रहे। स्वीकृत कार्यों में लगभग 91.40 प्रतिशत परियोजनाएं शुरू हो चुकी हैं, जबकि स्वीकृत कार्यों के मुकाबले पूर्णता दर करीब 75.57 प्रतिशत है।

44,726 प्रस्तावों से सामने आई स्थानीय विकास की मांग

विधायक निधि के अंतर्गत प्रस्तावित 44,726 कार्य बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में स्थानीय स्तर की बुनियादी सुविधाओं की मांग अभी भी बहुत अधिक है। विधायकों की संस्तुतियां सामान्यतः सीसी रोड, इंटरलॉकिंग, खड़ंजा, नाली, पुलिया, विद्यालय भवन, सामुदायिक केंद्र, यात्री शेड, पेयजल और सार्वजनिक स्थलों के विकास से संबंधित होती हैं।

प्रदेश में 403 विधानसभा क्षेत्रों के आधार पर देखें तो औसतन प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से करीब 111 कार्यों की अनुशंसा हुई। हालांकि यह केवल गणितीय औसत है। वास्तविक संख्या जिलों और विधानसभा क्षेत्रों के बीच काफी अलग हो सकती है।

किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में कम लागत वाले सड़क और नाली निर्माण प्रस्ताव हो सकते हैं, जबकि दूसरे क्षेत्र में कम संख्या में अपेक्षाकृत बड़ी लागत वाली परियोजनाएं स्वीकृत हो सकती हैं। इसलिए कार्यों की संख्या को सीधे खर्च की गई धनराशि नहीं माना जाना चाहिए।

UP MLA Fund Report 2024-25 : 36,561 कार्यों को मिली स्वीकृति

प्रदेश में कुल 36,561 कार्य स्वीकृत हुए। यह कुल अनुशंसित कार्यों का लगभग 81.74 प्रतिशत है। योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार पात्र कार्य प्रस्ताव को सामान्यतः 45 दिन के भीतर स्वीकृत किया जाना चाहिए। वर्ष 2024-25 में 13,785 कार्यों को 45 दिन के भीतर, 3,022 कार्यों को 45 से 60 दिन के बीच और 19,754 कार्यों को 60 दिन के बाद स्वीकृति मिली।

इस आंकड़े का सबसे चिंताजनक हिस्सा यह है कि कुल स्वीकृत कार्यों में आधे से अधिक परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में 60 दिन से अधिक समय लगा।

कुल 36,561 स्वीकृत कार्यों में 19,754 कार्य ऐसे रहे जिन्हें निर्धारित शुरुआती समयसीमा के बाद स्वीकृति मिली। यह स्वीकृत परियोजनाओं का करीब 54 प्रतिशत है।

इससे जिला स्तर पर प्रस्तावों की तकनीकी जांच, भूमि सत्यापन, लागत निर्धारण और प्रशासनिक अनुमति की प्रक्रिया में देरी का संकेत मिलता है।

केवल 550 प्रस्ताव लंबित, लेकिन समयसीमा पर सवाल

रिपोर्ट में स्वीकृति के लिए कुल 550 कार्य लंबित बताए गए हैं। इनमें सात कार्य 45 दिन के भीतर, सात कार्य 45 से 60 दिन की अवधि में और 536 कार्य 60 दिन से अधिक समय से लंबित हैं।

कुल लंबित प्रस्तावों की संख्या अनुशंसित कार्यों के मुकाबले केवल 1.23 प्रतिशत है। इसके बावजूद 550 में से 536 प्रस्तावों का 60 दिन से अधिक समय तक लंबित रहना प्रशासनिक दक्षता पर सवाल उठाता है।

यह लगभग 97.45 प्रतिशत लंबित प्रस्ताव हैं जो दो महीने से अधिक पुराने हैं। इनके मामले में जिला प्रशासन को प्रस्ताववार कारण सार्वजनिक करना चाहिए।

लंबित कार्यों के संभावित कारणों में शामिल हो सकते हैं—

  • प्रस्तावित भूमि पर विवाद
  • जमीन का संबंधित विभाग के नाम दर्ज न होना
  • तकनीकी अनुमान में कमी
  • किसी दूसरी योजना में वही कार्य पहले से स्वीकृत होना
  • विधायक निधि की अनुपलब्धता
  • कार्यदायी संस्था का चयन न होना
  • प्रस्ताव का योजना के नियमों के अनुरूप न पाया जाना

7,615 प्रस्ताव क्यों हुए निरस्त?

वर्ष 2024-25 में 7,615 अनुशंसित कार्य निरस्त अथवा अस्वीकृत दर्ज हैं। यह कुल प्रस्तावों का करीब 17 प्रतिशत है।

इतनी बड़ी संख्या में प्रस्तावों का निरस्त होना बताता है कि विधायक स्तर पर भेजी गई सभी संस्तुतियां तकनीकी या प्रशासनिक मानकों पर खरी नहीं उतरीं।

किसी प्रस्ताव को निरस्त किए जाने के पीछे निजी भूमि पर निर्माण, विवादित जमीन, पहले से स्वीकृत कार्य, अपात्र निर्माण, अपर्याप्त विवरण या उपलब्ध विधायक निधि से अधिक लागत जैसे कारण हो सकते हैं।

रिपोर्ट में जिला-वार केवल निरस्त कार्यों की संख्या दी गई है। प्रत्येक निरस्त प्रस्ताव के कारणों की अलग सार्वजनिक सूची उपलब्ध होने से यह समझना आसान होगा कि कमी विधायक की संस्तुति में थी या जिला प्रशासन की प्रक्रिया में।

3,146 स्वीकृत कार्य अभी तक शुरू नहीं

प्रदेश में 36,561 स्वीकृत कार्यों में से 33,415 कार्य शुरू हुए, जबकि 3,146 कार्य रिपोर्ट तैयार होने तक अनारम्भ थे। यानी करीब 8.60 प्रतिशत स्वीकृत परियोजनाएं जमीन पर शुरू नहीं हो सकीं

स्वीकृति मिलने के बाद भी काम शुरू न होना अधिक गंभीर स्थिति मानी जा सकती है, क्योंकि इस स्तर तक संबंधित कार्य के लिए प्रशासनिक अनुमति मिल चुकी होती है।

अनारम्भ कार्यों के पीछे निविदा प्रक्रिया में देरी, कार्यदायी संस्था की निष्क्रियता, निर्माण स्थल उपलब्ध न होना, पहली किस्त जारी न होना या लागत बढ़ जाना प्रमुख कारण हो सकते हैं।

योजना से जुड़े आधिकारिक दिशा-निर्देशों में स्वीकृत पात्र कार्य को तीन महीने के भीतर शुरू करने का प्रावधान बताया गया है। ऐसे में 3,146 अनारम्भ परियोजनाओं की जिला स्तर पर समीक्षा आवश्यक है।

27,629 कार्य पूरे, 5,786 अभी अधूरे

वर्ष 2024-25 में शुरू किए गए 33,415 कार्यों में से 27,629 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इस आधार पर शुरू किए गए कार्यों की पूर्णता दर लगभग 82.68 प्रतिशत है।

वहीं 5,786 कार्य निर्माण शुरू होने के बावजूद अधूरे हैं। यह कुल स्वीकृत कार्यों का लगभग 15.83 प्रतिशत और शुरू किए गए कार्यों का करीब 17.32 प्रतिशत है।

अपूर्ण कार्यों के मामले में केवल संख्या पर्याप्त नहीं है। यह भी सामने आना चाहिए कि—

  • काम कब स्वीकृत हुआ था
  • निर्माण कब शुरू किया गया
  • निर्धारित पूर्णता तिथि क्या थी
  • कार्यदायी संस्था कौन है
  • पहली और दूसरी किस्त कब जारी हुई
  • भौतिक प्रगति कितनी है
  • निर्माण में देरी का कारण क्या है

निविदा प्रक्रिया में भी 3,214 कार्य लंबित

रिपोर्ट में 3,214 कार्य निविदा के लिए लंबित और 56 कार्य निविदा प्रक्रिया में दर्ज हैं। कुल 33,291 कार्यों की निविदा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

इसका अर्थ है कि स्वीकृत परियोजनाओं के एक हिस्से में प्रशासनिक मंजूरी के बाद भी ठेके अथवा कार्यदायी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।

निविदा में देरी होने से निर्माण अवधि प्रभावित होती है और अगले वित्तीय वर्ष तक परियोजना लंबित रह सकती है। लागत बढ़ने की स्थिति में पुराने तकनीकी अनुमान में संशोधन की जरूरत भी पड़ सकती है।

बिजनौर में सबसे अधिक कार्यों में से एक

उपलब्ध जिला-वार रिपोर्ट में बिजनौर में वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान 1,674 विकास कार्य अनुशंसित दिखाई देते हैं। इनमें 1,537 कार्य स्वीकृत हुए और 137 प्रस्ताव निरस्त रहे। रिपोर्ट में 1,528 कार्य प्रारम्भ और 1,518 कार्य पूर्ण दर्ज हैं। 19 कार्य अपूर्ण बताए गए हैं।

इन आंकड़ों के आधार पर बिजनौर में स्वीकृत कार्यों की पूर्णता दर बहुत अधिक दिखाई देती है। लेकिन कार्यों की संख्या अधिक होने का अर्थ यह नहीं है कि जिले ने सबसे अधिक धनराशि खर्च की। वास्तविक व्यय की तुलना के लिए रुपये में उपलब्ध वित्तीय रिपोर्ट अलग से देखनी होगी।

मुरादाबाद में 1,312 कार्यों की संस्तुति

मुरादाबाद जिले में 2024-25 के दौरान 1,312 कार्य अनुशंसित किए गए। उपलब्ध पोर्टल विवरण में 1,196 कार्य स्वीकृत और 116 प्रस्ताव निरस्त दिखाए गए हैं। इनमें 1,185 कार्य प्रारम्भ और 1,175 कार्य पूर्ण दर्ज हैं।

मुरादाबाद और बिजनौर जैसे जिलों में कार्यों की संख्या अधिक रहने का एक कारण विधानसभा क्षेत्रों और स्थानीय निकायों की संख्या भी हो सकती है। इसलिए जिला-वार प्रदर्शन की निष्पक्ष तुलना के लिए प्रति विधानसभा क्षेत्र कार्यों की संख्या निकालना जरूरी है।

75 जिलों को एक ही पैमाने पर नहीं मापा जा सकता

उत्तर प्रदेश के सभी जिलों की तुलना केवल कुल कार्यों के आधार पर करना उचित नहीं है। लखनऊ, प्रयागराज और कानपुर नगर जैसे बड़े जिलों में विधानसभा क्षेत्रों की संख्या अधिक है। वहीं महोबा, चित्रकूट, श्रावस्ती और बागपत जैसे जिलों में सीटों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।

उदाहरण के लिए दस विधानसभा क्षेत्रों वाले जिले में कुल उपलब्ध विधायक निधि दो सीट वाले जिले के मुकाबले स्वाभाविक रूप से अधिक होगी।

सटीक जिला तुलना के लिए निम्न संकेतक अपनाए जाने चाहिए—

  1. प्रति विधानसभा क्षेत्र अनुशंसित कार्य
  2. प्रति विधायक स्वीकृत कार्य
  3. अनुशंसित कार्यों का स्वीकृति प्रतिशत
  4. स्वीकृत कार्यों का प्रारम्भ प्रतिशत
  5. प्रारम्भ कार्यों की पूर्णता दर
  6. निरस्त प्रस्तावों का प्रतिशत
  7. 60 दिन से अधिक लंबित कार्य
  8. प्रति कार्य औसत स्वीकृत लागत
  9. कुल उपलब्ध धनराशि के मुकाबले वास्तविक व्यय
  10. उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा होने की स्थिति

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों की तस्वीर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, बुलंदशहर, बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर और संभल शामिल हैं।

इन जिलों में विधायक निधि के अधिकांश स्थानीय प्रस्ताव ग्रामीण संपर्क मार्ग, इंटरलॉकिंग, नाली, विद्यालय, सामुदायिक भवन और पेयजल सुविधाओं से जुड़े रहते हैं।

गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और मेरठ जैसे तेजी से शहरीकरण वाले जिलों में शहरी सड़क, नाली, पार्क, सार्वजनिक शेड और विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं की मांग अधिक रहती है।

बिजनौर, सहारनपुर, शामली और मुजफ्फरनगर में ग्रामीण आबादी तथा गांवों की संख्या अधिक होने के कारण कम लागत वाली छोटी परियोजनाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है।

रुहेलखंड में जिला-वार कार्यों का महत्व

बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर में विधायक निधि ग्रामीण तथा शहरी दोनों तरह की आधारभूत जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है।

इन जिलों में गांवों के संपर्क मार्ग, इंटरलॉकिंग, नाली, विद्यालय की चहारदीवारी, सार्वजनिक भवन और पेयजल से जुड़े काम प्रमुख श्रेणियों में आते हैं।

लेकिन किसी जिले में कार्यों की संख्या कम या अधिक होने से अकेले प्रदर्शन तय नहीं किया जा सकता। बड़ी लागत वाली सड़क और छोटी नाली को रिपोर्ट में एक-एक कार्य के रूप में गिना जाता है।

अवध के जिलों में विधायक निधि

लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई, लखीमपुर खीरी, अयोध्या, बाराबंकी, अमेठी, सुल्तानपुर, गोंडा, बहराइच, श्रावस्ती और बलरामपुर में ग्रामीण विकास और शहरी आधारभूत संरचना दोनों से जुड़े कार्य शामिल हैं।

लखनऊ में शहरी सुविधाओं से जुड़े कामों की लागत अधिक हो सकती है, जबकि श्रावस्ती, बहराइच और बलरामपुर में छोटे ग्रामीण संपर्क मार्ग तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों की संख्या अधिक हो सकती है।

अवध के जिलों में बाढ़, जलभराव और खराब ग्रामीण रास्तों की समस्या को देखते हुए नाली, पुलिया और संपर्क मार्ग विधायक निधि की प्रमुख प्राथमिकता बने रहते हैं।

कानपुर और आसपास के जिलों की स्थिति

कानपुर नगर, कानपुर देहात, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद और कन्नौज में शहरी तथा ग्रामीण विकास कार्यों का मिश्रण दिखाई देता है।

कानपुर नगर में सड़क, जल निकासी, विद्यालय और सार्वजनिक उपयोग की शहरी परियोजनाएं प्रमुख हो सकती हैं। वहीं कानपुर देहात, औरैया और फर्रुखाबाद में गांवों के संपर्क मार्ग, इंटरलॉकिंग और सामुदायिक भवनों की मांग अधिक रहती है।

इटावा और कन्नौज में ग्रामीण क्षेत्रों के साथ नगर निकायों में भी विधायक निधि का उपयोग किया जाता है।

ब्रज और अलीगढ़ क्षेत्र

आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, कासगंज, अलीगढ़ और हाथरस में पर्यटन, शहरी आबादी और ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों का मिश्रण है।

आगरा तथा मथुरा जैसे पर्यटन प्रधान जिलों में विधायक निधि से बड़े पर्यटन प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सार्वजनिक मार्ग, शेड, पेयजल और छोटे निर्माण कार्य कराए जा सकते हैं।

फिरोजाबाद, एटा, कासगंज, अलीगढ़ और हाथरस में ग्रामीण सड़कों, नालियों, विद्यालयों और सामुदायिक सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं की उपयोगिता अधिक है।

बुंदेलखंड में अलग हैं विकास की जरूरतें

झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट में विधायक निधि की प्राथमिकताएं दूसरे क्षेत्रों से अलग हो सकती हैं।

बुंदेलखंड में पेयजल, जल संरक्षण, सार्वजनिक हैंडपंप, संपर्क मार्ग, विद्यालय भवन और सामुदायिक केंद्रों की जरूरत अधिक है।

हालांकि बड़े बांध या व्यापक पेयजल परियोजना विधायक निधि की सीमित राशि से पूरी नहीं हो सकती। इसलिए यहां निधि का उपयोग स्थानीय स्तर की छोटी लेकिन जरूरी परियोजनाओं में अधिक प्रभावी हो सकता है।

प्रयागराज और विंध्य क्षेत्र

प्रयागराज, कौशाम्बी, प्रतापगढ़, फतेहपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र और भदोही में विधायक निधि से ग्रामीण सड़क, नाली, विद्यालय और सार्वजनिक भवनों के काम प्रमुख रहते हैं।

सोनभद्र में भौगोलिक दूरी और आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंच की समस्या है। मिर्जापुर में पहाड़ी तथा ग्रामीण इलाकों की अलग जरूरतें हैं। प्रयागराज में शहरी और ग्रामीण दोनों प्रकार की विधानसभा सीटें होने से परियोजनाओं का स्वरूप विविध रहता है।

पूर्वांचल में अधिक संख्या में छोटे कार्य

वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, बस्ती, संतकबीर नगर और सिद्धार्थनगर में घनी ग्रामीण आबादी है।

इन जिलों में कम दूरी के संपर्क मार्ग, इंटरलॉकिंग, नाली, विद्यालय कक्ष और सार्वजनिक भवन जैसे छोटे कार्यों की मांग अधिक रहती है।

घनी आबादी वाले पूर्वांचल में एक ही विधानसभा क्षेत्र से बड़ी संख्या में छोटी परियोजनाओं की संस्तुति हो सकती है। इसलिए यहां कार्यों की संख्या अधिक होना स्वाभाविक है, लेकिन वास्तविक खर्च का पता लागत और भुगतान रिपोर्ट से ही चलेगा।

क्या यह व्यय रिपोर्ट है?

अपलोड की गई जनपदवार फाइल और पोर्टल की इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से कार्य की भौतिक प्रगति दी गई है। इसमें प्रत्येक जिले के लिए रुपये में निम्न जानकारी नहीं दी गई—

  • उपलब्ध विधायक निधि
  • स्वीकृत लागत
  • जारी धनराशि
  • वास्तविक भुगतान
  • प्रतिबद्ध धनराशि
  • बची हुई राशि
  • प्रति कार्य लागत

इसलिए 27,629 पूर्ण कार्यों को कुल खर्च नहीं कहा जा सकता। किसी जिले में 500 काम पूरे होने के बावजूद उसका खर्च उस जिले से कम हो सकता है जहां 300 लेकिन अधिक लागत वाले काम पूरे हुए हों।

जिला-वार वास्तविक व्यय के लिए पोर्टल की अलग “जनपद वार व्यय का विवरण” रिपोर्ट देखना आवश्यक है। पोर्टल पर कार्य और व्यय के लिए अलग-अलग रिपोर्ट उपलब्ध कराई गई हैं।

विधायक निधि के कामों में पारदर्शिता कैसे बढ़े?

जिला-वार रिपोर्ट में संख्या के साथ हर कार्य का नाम, लागत, स्थान और वर्तमान स्थिति सार्वजनिक होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त पोर्टल पर निम्न जानकारी आसानी से खोजी जा सके—

  • कार्य का जीपीएस स्थान
  • निर्माण से पहले की तस्वीर
  • वर्तमान प्रगति की तस्वीर
  • स्वीकृति और प्रारम्भ की तारीख
  • निर्धारित पूर्णता तिथि
  • कार्यदायी संस्था
  • स्वीकृत लागत
  • जारी किस्तों का विवरण
  • अब तक का भुगतान
  • गुणवत्ता जांच रिपोर्ट
  • उपयोगिता प्रमाणपत्र

इससे जनता अपने गांव या मोहल्ले में विधायक निधि से स्वीकृत परियोजना की वास्तविक स्थिति देख सकेगी।

प्रशासन के सामने पांच प्रमुख चुनौतियां

वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट जिला प्रशासन और ग्राम्य विकास विभाग के सामने पांच प्रमुख चुनौतियां रखती है।

पहली चुनौती 536 ऐसे प्रस्तावों का निस्तारण है जो 60 दिन से अधिक समय से स्वीकृति के लिए लंबित हैं।

दूसरी चुनौती 7,615 निरस्त प्रस्तावों के कारणों का विश्लेषण है। यदि तकनीकी खामियां लगातार सामने आ रही हैं तो विधायकों और उनके प्रतिनिधियों को प्रस्ताव तैयार करने का स्पष्ट प्रारूप दिया जाना चाहिए।

तीसरी चुनौती 3,146 स्वीकृत लेकिन अनारम्भ कार्यों को जमीन पर उतारना है।

चौथी चुनौती 5,786 अपूर्ण परियोजनाओं को समय पर पूरा करना है।

पांचवीं चुनौती कार्यों की गुणवत्ता और उपयोगिता सुनिश्चित करना है। केवल पोर्टल पर “पूर्ण” दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। निर्माण का मौके पर सत्यापन भी होना चाहिए।

UP MLA Fund 2024-25 से जुड़े प्रमुख सवाल

वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश में कितने विधायक निधि कार्य प्रस्तावित हुए?

प्रदेश के सभी 75 जिलों में कुल 44,726 विकास कार्यों की अनुशंसा की गई।

कितने काम स्वीकृत हुए?

कुल 36,561 कार्यों को स्वीकृति मिली। यह कुल प्रस्तावों का लगभग 81.74 प्रतिशत है।

कितने प्रस्ताव निरस्त हुए?

रिपोर्ट में 7,615 प्रस्ताव निरस्त अथवा अस्वीकृत दर्ज हैं।

कितने विकास कार्य पूरे हुए?

वर्ष 2024-25 के स्वीकृत कार्यों में 27,629 कार्य पूरे हो चुके हैं।

कितने काम अभी अधूरे हैं?

कुल 5,786 कार्य निर्माण शुरू होने के बावजूद अपूर्ण हैं।

कितने स्वीकृत काम शुरू नहीं हुए?

प्रदेश में 3,146 स्वीकृत परियोजनाएं रिपोर्ट तैयार होने तक शुरू नहीं हो सकी थीं।

क्या इस रिपोर्ट में जिलेवार खर्च की राशि दी गई है?

नहीं। उपलब्ध रिपोर्ट कार्यों की भौतिक स्थिति बताती है। रुपये में वास्तविक व्यय जानने के लिए जनपदवार व्यय रिपोर्ट देखनी होगी।

विधायक निधि का पैसा विधायक स्वयं खर्च करते हैं?

नहीं। विधायक विकास कार्यों की संस्तुति करते हैं। प्रस्ताव की जांच, स्वीकृति, धनराशि जारी करने और भुगतान की प्रक्रिया जिला प्रशासन तथा संबंधित कार्यदायी संस्था के माध्यम से होती है।

2024-25 की रिपोर्ट से क्या संकेत मिलता है?

वित्तीय वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश में विधायक निधि के कामों का दायरा बड़ा रहा। 44 हजार से अधिक प्रस्ताव स्थानीय विकास की व्यापक जरूरत को दिखाते हैं। 36 हजार से अधिक कार्यों की स्वीकृति और 27 हजार से अधिक परियोजनाओं का पूरा होना महत्वपूर्ण प्रगति है।

इसके साथ ही 7,615 निरस्त प्रस्ताव, 3,146 अनारम्भ कार्य और 5,786 अपूर्ण परियोजनाएं बताती हैं कि योजना के क्रियान्वयन में अभी सुधार की पर्याप्त गुंजाइश है।

अब जरूरत केवल अधिक कार्य प्रस्तावित करने की नहीं, बल्कि पात्र प्रस्तावों को समय पर स्वीकृत करने, स्वीकृत काम शुरू कराने, अधूरी परियोजनाएं पूरी करने और कार्यवार वित्तीय विवरण सार्वजनिक करने की है।

  • समाचार संपादन, ब्रेकिंग अलर्ट और फैक्ट-चेक पर फ़ोकस। ज़मीनी रिपोर्टों को डेटा के साथ जोड़ना पसंद। कॉफ़ी, डेडलाइन और सत्य , तीनों से समझौता नहीं।

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