world-news

असली TMC किसकी? पश्चिम बंगाल में उपचुनाव से पहले पार्टी के नाम और चुनाव निशान पर बड़ा फैसला आज!

September 17, 2026

TMC Name Symbol Dispute: चुनाव आयोग ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों गुटों से चिह्न पूरी तरह छीनकर उन्हें अलग-अलग नए चुनाव चिह्न आवंटित कर सकता है. नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने वाला है और दोनों गुटों ने एक ही चुनाव चिह्न पर अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं.

Published byAmit Kasana

TMC Name Symbol Dispute: चुनाव आयोग ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों गुटों से चिह्न पूरी तरह छीनकर उन्हें अलग-अलग नए चुनाव चिह्न आवंटित कर सकता है. नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने वाला है और दोनों गुटों ने एक ही चुनाव चिह्न पर अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं.

author-image

New Update

TMC, Mamata Banerjee, Ritabrata Banerjee, TMC Name Symbol Dispute, Election Commission, TMC Crisis, West Bengal Politics, TMC Election Symbol, Bengal Politics, Nandigram, Rejinagar, By Election 2026

Mamata Banerjee and Ritabrata Banerjee

TMC Name Symbol Dispute: पश्चिम बंगाल की सियासत में जो पार्टी कभी ममता बनर्जी की पहचान मानी जाती थी, आज उसी पार्टी के असली मालिकाना हक को लेकर दिल्ली में फैसला आ सकता है. तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी का नाम, "जोड़ा फूल घास पर" वाला चुनाव चिह्न और पार्टी पर संगठनात्मक कब्जा इन तीनों को लेकर ममता बनर्जी गुट और पार्टी के ही बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी गुट बीते विधानसभा चुनाव से ही आमने-सामने खड़े हैं. गुरुवार को चुनाव आयोग दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इस विवाद पर बड़ा फैसला सुना सकता है. आइए समझते हैं कि यह पूरा मामला शुरू कहां से हुआ और अब किस मोड़ पर पहुंचा है.

TMC पार्टी के नाम और चुनाव निशान पर विवाद शुरू कैसे हुआ?

टीएमसी में यह संकट कोई अचानक नहीं आया. उलुबेरिया पूर्व सीट से विधायक ऋतब्रत बनर्जी और उनके साथी नेताओं को ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासन कर दिया था. जिसके बाद ऋतब्रत और अन्य पार्टी नेताओं ने अपना अलग खेमा खड़ा कर लिया. जून 2026 में इस बागी गुट ने चौंकाने वाला ऐलान करते हुए ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी से निलंबित करने की घोषणा कर दी.

15 साल के TMC शासन में जो काम अटके रहे, अब 15 हफ्तों में उन पर तेजी से काम हो रहा है!

जूनपुट, पश्चिम बंगाल में DRDO का नया हथियार और मिसाइल परीक्षण केंद्र—CM सुवेंदु अधिकारी ने परियोजना को मंजूरी दी।

एक सही वोट की ताकत देखिए—बंगाल में विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा, दोनों को नई… pic.twitter.com/tRwZ7sPcwB

— Oc updates (@ocjain4) September 16, 2026

वेस्ट बंगाल विधानसभा में असली नेता प्रतिपक्ष कौन बना?

इस लड़ाई ने तब और गंभीर मोड़ लिया जब पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर रवींद्रनाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दे दी. ममता बनर्जी खेमे ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को यह पद सौंपा था, लेकिन पार्टी के करीब 80 में से 58 से ज्यादा विधायकों ने बगावत कर ऋतब्रत गुट का साथ दिया. 

TMC के नाम और चुनाव निशान विवाद चुनाव आयोग कैसे पहुंचा?

जब पार्टी के भीतर सुलह की हर कोशिश नाकाम हो गई तो दोनों गुट अपने-अपने दावों के साथ भारतीय चुनाव आयोग के पास पहुंचे. जुलाई 2026 में ही आयोग ने ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी दोनों को नोटिस भेजकर संगठनात्मक स्थिति पर जवाब मांगा था. तब से यह मामला आयोग के पास लंबित है और दोनों पक्ष खुद को टीएमसी का असली प्रतिनिधि साबित करने के लिए दस्तावेज और दलीलें पेश करते आ रहे हैं.

आज की सुनवाई इतनी अहम क्यों मानी जा रही है?

दरअसल, पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने वाला है, और इन दोनों ही सीटों पर ममता गुट और ऋतब्रत गुट ने एक ही चुनाव चिह्न पर अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं. नामांकन की आखिरी तारीख 16 सितंबर बीत चुकी है, जिससे आयोग पर जल्द फैसला लेने का दबाव बढ़ गया है. बुधवार को दोनों खेमों से अपने-अपने दावों के समर्थन में जरूरी कागजात जमा कराए हैं और गुरुवार को दिल्ली में आयोग की पूरी बेंच के सामने दोनों गुटों की अलग-अलग सुनवाई तय की गई है.

Mamata Banerjee and Ritabrata Banerjee (1)

आयोग के सामने क्या विकल्प हैं?

चुनाव आयोग के पास इस मामले में कई तरह के रास्ते खुले हैं. वह किसी एक गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न अस्थायी तौर पर सौंप सकता है, या फिर दोनों गुटों से यह चिह्न पूरी तरह छीनकर उन्हें अलग-अलग नए चुनाव चिह्न आवंटित कर सकता है. एक अन्य संभावना यह भी है कि आयोग उपचुनाव तक के लिए कोई अंतरिम व्यवस्था बना दे ताकि 6 अक्टूबर की वोटिंग में असमंजस की स्थिति न बने जबकि नाम और चिह्न पर अंतिम फैसला बाद में हो.

क्या पहले भी किसी पार्टी में ऐसा विवाद देखा गया है?

इससे पहले शिवसेना और एनसीपी में हुई टूट के बाद भी पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर ठीक इसी तरह का विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा था. जहां आयोग ने बहुमत के आधार पर एक गुट को असली पार्टी के तौर पर मान्यता दी थी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के मामले में भी आयोग विधायकों और संगठनात्मक ढांचे में बहुमत को ही मुख्य आधार बना सकता है. हालांकि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं और अंतिम फैसला केस-दर-केस आधार पर ही होता है.

कौन हैं बुशरा बानो, जिनके 'अस्सलामु अलैकुम' बोलने वाले वीडियो पर मचा विवाद?

Explainer: भारत-पाकिस्तान के बीच समंदर में टकराव! पाकिस्तानी 'गुस्ताखी' पर मोदी सरकार ने उठाया ये बड़ा कदम