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बुक रिव्यू: ऑफिस हसल से लेकर Revenge तक, Gen-Z की हर मुश्किल का हल बताती है ये किताब

August 28, 2026

अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा… (अश्वत्थामा मारा गया, वो नर था या हाथी मुझे मालूम नहीं)

मुझे लगता है कि ये एक तरह की अपने आप में पहली फेक न्यूज़ रही होगी. यहां जैसे आजकल नेता कहते हैं कि बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया, बिल्कुल वैसा ही मामला है. 

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सोचिए कि जब इस बात को महाभारत के दिग्गज युद्ध के बीच में सुन रहे थे, तब कोई फैक्ट चेकिंग मशीन नहीं थी. तब कोई ग्राउंड रिपोर्ट नहीं हो रही थी, कि इस बात को चेक किया जाए. इसलिए जिसने सुना, वो सच मान बैठा और महाभारत का खेल ही बदल गया. 

वो तो महाभारत का समय था, लेकिन आज के वक्त में इन्फॉर्मेशन की ऐसी बाढ़ है. तब हम कहां सही और गलत ख़बर को पहचान पाएंगे. लेकिन एक रास्ता ये भी है कि आज के वक्त में सही और गलत को पहचानने या आंकने की सुविधा भी है. यानी हम चाहें तो पहचान सकते हैं. 

अब आप ये सोच सकते हैं इतनी आसान सी बात को समझाने के लिए महाभारत का उदाहरण क्यूं लिया गया. तो जवाब यही है कि सिर्फ महाभारत क्यूं हमारे धर्म, ग्रंथ, वेद, उपनिषद में ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जो हमारी आज की समस्या को चुटकियों में हल कर सकते हैं बस हमें देखने की ज़रूरत है. 

आपके इसी काम को आसान करने के लिए एक नई किताब आई है. किताब का नाम है आप ही हीरो हैं: भारतीय अध्यात्म से आत्मशक्ति की कहानियां. किताब को वरिष्ठ पत्रकार शशि शेखर ने लिखा है, जिसे ब्लूवन इंक पब्लिशर्स ने छापा है. 

मैं सेल्फ मोटिवेशन वाली किताबें नहीं पढ़ता, क्यूंकि मुझे उनमें वो फील नहीं आता. लेकिन जब इस किताब का कवर मैंने देखा, तो मैं थोड़ा ठहरा. क्यूंकि इसमें कमाल की बात ये थी कि मोटिवेशन की बात तो है, लेकिन साथ ही माइथोलॉजी भी इसमें है. और यकीन मानिए कि यहां ठहरना काम कर गया. 

क्यूंकि किताब के पन्नों को जब पलटा तो चीज़ें आसान होती चली गई. महाभारत के श्लोक, किस्सों और पात्रों से आज की समस्याओं का समाधान मिल रहा है. दफ्तर की चैं-चैं से लेकर परिवार, करियर और युवावस्था की समस्याओं का हर तोड़ हमारे ग्रंथों में है. अब जैसे एक टॉपिक आया कि लाइफ में कोई भी बड़ा फैसला कैसे लें, तुरंत ले लें या थोड़ा सोचा-समझा जाए. 

तब वहां युद्धिष्ठिर और भीष्म का संवाद आता है, उसी में चिरकारी की कहानी आती है. कहानी की एक-एक परत आपकी अपनी प्रॉब्लम का सॉल्यूशन देती जाती है 

इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और रील में घुसी हुई नई पीढ़ी को तैयार करना इस समय आसान नहीं है. पहले होता ये था कि हम बाहर खेलने जाते थे, घूमने जाते थे, किसी से लड़ते थे, कहीं गिरते थे, तो वहीं से ज़िंदगी की भागदौड़ समझ आती है. नई पीढ़ी फ्लैट, कमरों, एसी में फंस गई है, उनकी दुनिया मोबाइल गेम में बसती है. 

ज़िंदगी के अनुभवों को उन्हें सिखाने और साथ ही साथ अपने अध्यात्म, संस्कृति या धर्मशास्त्र से मिलवाने के लिए उन्हें रियल लाइफ इंसीडेट बताने होंगे. ऐसे इंसीडेंट जो वो खुद जीते हैं, किसी से हार जाना, किसी से ब्रेकअप हो जाना, किसी मुश्किल में पड़ जाना. और इन्हीं बातों के ज़रिए जब आप अपने ग्रंथों को भी जान लेते हैं, तो फिर मज़ा ही अलग है. 

इसलिए जिस Gen Z की आज के वक्त में चर्चा है, उसके लिए ये किताब रामबाण है. जैसे मुझे इस किताब में एक मज़ेदार चैप्टर मिला कि अपना सही सलाहकार कैसे पहचानें, उसमें राजा शल्य और कर्ण की सुनाई गई कहानी, कई तरह के पर्दे और रास्ते खोल देती है. 

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