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क्या खत्म हो जाएगी पानी की ऑक्सीजन? नई रिसर्च में बड़ा खुलासा; जानिए इंसान और धरती पर क्या होगा असर
महासागरों, नदियों और झीलों से तेजी से ऑक्सीजन गायब हो रही है। UC सैन डिएगो के वैज्ञानिकों की एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह संकट पृथ्वी को 'असुरक्षित क्षेत्र' में धकेल सकता है। जानिए इसके कारण और विनाशकारी प्रभाव।
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पानी में कम हो रहा ऑक्सीजन का लेवल
Science News: जब भी हम पर्यावरण की बात करते हैं, खास तौर पर क्लाइमेट चेंज पर तो हमारा ध्यान हवा के प्रदूषण या बढ़ते तापमान पर जाता है। लेकिन पृथ्वी का तीन-चौथाई हिस्सा कवर करने वाले जलस्रोतों के भीतर एक ऐसा संकट धीरे-धीरे बढ़ रहा है, इंसानी सभ्यता के अस्तित्व को चुनौती दे सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो (UC San Diego) के स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशनोग्राफी के रिसर्चर्स के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक आशंका जताई है कि महासागरों, कोस्टल वॉटर्स, नदियों और झीलों से घुला हुआ ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) बहुत तेज गति से खत्म हो रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, 'एक्वेटिक डीऑक्सीजनेशन' (Aquatic Deoxygenation) का यह संकट पृथ्वी को एक ऐसे 'असुरक्षित इलाके' में धकेल रहा है, जहां से वापसी में कई सदियां लग सकती हैं।
क्या है 'एक्वेटिक डीऑक्सीजनेशन' और ये नई स्टडी
आसान भाषा में, जल में घुली हुई ऑक्सीजन का स्तर लगातार कम होना ही 'एक्वेटिक डीऑक्सीजनेशन' कहलाता है। जिस तरह इंसान को जिंदा रहने के लिए हवा की जरूरत होती है, ठीक वैसे ही पानी के भीतर लाइफ साइकिल को बनाए रखने के लिए यह ऑक्सीजन बेहद जरूरी है। 30 जून, 2026 को नामी वैज्ञानिक रिसर्च मैगजीन 'लिम्नोलॉजी एंड ओशनोग्राफी' (Limnology and Oceanography) में छपी एक व्यापक समीक्षा रिपोर्ट में बताया गया है कि यह संकट किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है।
नेशनल सेंटर फॉर इकोलॉजिकल एनालिसिस एंड सिंथेसिस, UC सांता बारबरा की मुख्य शोधकर्ता डॉ. एरिका फेरर इस समस्या की गंभीरता बताते हुए कहती हैं कि हमारी पृथ्वी का स्वास्थ्य और स्थिरता हमारे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। यह अध्ययन एक्वेटिक डीऑक्सीजनेशन को एक वैश्विक खतरे के रूप में पहचान दिलाने और यह दिखाने के लिए है कि यह कोई अलग-थलग समस्या नहीं है।
'प्लैनेटरी बाउंड्रीज' में 10वें खतरे के रूप में शामिल करने की मांग
साल 2009 में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की स्थिरता को बनाए रखने के लिए 9 प्रमुख पर्यावरणीय सीमाओं को तय किया था, जिन्हें 'प्लैनेटरी बाउंड्रीज' (Planetary Boundaries) कहा जाता है। इनमें जलवायु परिवर्तन, महासागरीय अम्लीकरण (Ocean Acidification), जैव विविधता का नुकसान और रसायनों का प्रदूषण जैसी चीजें शामिल हैं।
स्क्रिप्स ओशनोग्राफी की वरिष्ठ वैज्ञानिक लिसा लेविन और डॉ. फेरर ने 2019 में मैड्रिड में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP25) के दौरान इस विषय पर काम शुरू किया था। शोधकर्ताओं का तर्क है कि जलीय ऑक्सीजन की कमी को भी औपचारिक रूप से इस प्लैनेटरी बाउंड्रीज फ्रेमवर्क में 10वें प्रमुख खतरे के रूप में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वैश्विक नीतियां बनाते समय इस पर ध्यान दिया जा सके।

क्यों पानी से गायब हो रही है ऑक्सीजन (AI Image)
क्यों गायब हो रही है पानी से ऑक्सीजन?
अब आते हैं इसके कारण पर शोधकर्ताओं के अनुसार, पानी से ऑक्सीजन छीनने के पीछे मुख्य रूप से इंसानी गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। जिनमें पहला है, ग्लोबल वार्मिंग। गर्म पानी में ठंडे पानी की तुलना में ऑक्सीजन को घोलकर रखने की क्षमता कम होती है। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही है।
दूसरा कारण है न्यूट्रिएंट पॉल्यूशन यानी पोषक तत्वों का प्रदूषण। खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक और सीवेज पानी में जाकर 'शैवाल' (Algae) को जन्म देते हैं। जब ये शैवाल मरते हैं, तो उन्हें सड़ने के लिए पानी की अधिकांश ऑक्सीजन की खपत हो जाती है। तीसरा है, गहरे पानी के संचार में रुकावट। गर्म होते समुद्रों में ऊपरी और निचले पानी का प्राकृतिक चक्र रुक जाता है, जिससे गहरे समुद्रों तक ताजी ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती।
जलीय जीवन और इंसानों पर क्या पड़ेगा असर?
ऑक्सीजन की कमी केवल छोटी मछलियों या पौधों के लिए ही घातक नहीं है, बल्कि यह पूरे फूड चेन को तहस-नहस कर रही है। सूक्ष्म जीवों से लेकर शार्क और बड़ी मछलियों का दम घुटने लगा है। कई क्षेत्रों में 'डेड जोन' (Dead Zones) बन गए हैं जहां कोई जीव जीवित नहीं रह सकता। हालांकि व्हेलबैक्स या डॉल्फ़िन हवा में सांस लेने सतह पर आती हैं, लेकिन उनके शिकार यानी छोटी मछलियों के खत्म होने या जगह बदलने से उनका अस्तित्व भी संकट में पड़ गया है। यही नहीं, इससे जलवायु संतुलन बिगड़ने का भी खतरा है, महासागर पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ऑक्सीजन की कमी से वे रासायनिक और जैविक प्रक्रियाएं बाधित होती हैं जो कार्बन को सोखती हैं।
कुल जमा बात ये है कि यदि हमने तुरंत वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन कम नहीं किया और जल निकायों में प्रदूषण रोकना शुरू नहीं किया, तो पानी से गायब होती यह ऑक्सीजन मानव इतिहास में कभी न पूरी होने वाली तबाही का कारण बन जाएगी।