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"जशोदा"—गृहलक्ष्मी की कहानियां

July 20, 2026

Hindi Kahani: आज सुबह बेटे का फोन आया 'माँ गुड न्यूज़ है आज मुझे मेरी पहली सैलरी मिली है। आपको भिजवा रहा हूं, प्लीज आप सबसे पहले यशोदा आंटी के लिए सोने का हार खरीद देना'
यशोदा का नाम सुनते ही मन प्रसन्न हो गया।
यशोदा के साथ जीवन की बहुत खूबसूरत स्मृतियां जुड़ी हुई है।
पर सुखद आश्चर्य इस बात का था कि बेटे को भी जसोदा से किया इतना पुराना वादा याद था। यशोदा से मैं पहली बार आज से अट्ठाइस साल पहले मिली थी।
शादी के बाद पति के साथ इस नए शहर में आई थी। अपनी गृहस्थी की शुरुआत ही कर रही थी कि यशोदा एक दिन सुबह-सुबह आई और बोली 'दीदी कामवाली की जरूरत हो तो बताना
मैं पहले भी इसी घर में काम करती थी। आप चाहे तो पड़ोस में मेरे बारे में पूछताछ कर सकते हैं,
मैं बहुत ईमानदार हूं।' उसके चेहरे
और उसकी बातें दोनों में मुझे साफ-साफ ईमानदारी दिखाई दे रही थी।
पर फिर भी मैंने मानवीय स्वभाव के चलते उसके बारे में पूछताछ की और संतुष्ट होकर उसे काम पर लगा लिया।
वो अपना काम बहुत अच्छे से करती थी।
उसे यशोदा कहो तो पलट कर कहती।
'नहीं दीदी हमार नाम तो जसोदा है'।
वो मुझसे बहुत अच्छे से घुल मिल गई थी।
फिर मेरी गोद में एक नन्हे से मेहमान के आने कि आहट हुईं ।
में खुश होने के साथ-साथ थोड़ा डर सी भी गई थी। क्योंकि मेरे और मेरे पति दोनों के परिवार में कोई ऐसा नहीं था।
जिसे हम हक से ऐसे समय पर अपने साथ रहने का कह सके।
जब यशोदा को मेरे इस डर का पता चला तो वह बोली 'अरे दीदी आप बिल्कुल नहीं घबराना, मैं हूं ना ।मेंने बहुत जापे किये है ।
मैं आपका और आने वाले बच्चे दोनों का पूरा ख्याल रखूंगी। आप ज्यादा मत सोचो।'

इस नयी जगह और इस नए अहसास में उसके शब्दों ने मुझे बहुत सहारा दिया।
और उसने अपना कहा पूरी तरह निभाया।
नौ महीने उसने मेरा बहुत ध्यान रखा।
और फिर नन्हे से मेहमान के आगमन पर तो वो फूली न समायी ।
उसकी खुशी उसके चेहरे से झलकती थी। मेरे बच्चे का ख्याल वो मुझसे ज्यादा करती ।
मुझे बच्चों की देखभाल से जुड़ी हर छोटी-छोटी चीज समझाती ।
और घंटो उसकी मालिश करती और न जाने उसके साथ क्या-क्या बातें करती।
मुझे जो उसकी एक बात समझ आती वह अक्सर कहती 'बिटवा बड़े होकर अपनी पहली कमाई से हमें सोने का हार दिलात देख लेना दीदी।'
मैं हंस कर कहती 'यशोदा उसे कहां कुछ समझ आ रहा होगा अभी'।
पर वो बिना कहे रहती नहीं।
सच में मेरे बच्चे के साथ उसका रिश्ता यशोदा मैया जैसा ही रहा।
बेटे के बड़े होने के साथ-साथ उसका प्यार भी बढ़ता रहा। मेरा बेटा भी यशोदा को बहुत प्यार करने लगा था ।

यशोदा जब भी कहती बिटवा हार दिलाओगे ना? तो वो कहता 'हां आंटी सबसे पहले'
तब तक तो शायद वो कुछ समझता भी नहीं था।
समय के साथ बेटा बड़ा होता गया ।
पर उसका और यशोदा का प्यार बिल्कुल कम नहीं हुआ ।
अब उसे पढ़ाई के चलते कम समय मिलता था। यशोदा के साथ बिताने को ।
फिर भी वो यशोदा की बातों का पूरा आनंद लेता।
उसे यशोदा की देहाती वाली भाषा बहुत पसंद थी।
फिर उसका चयन बहुत अच्छे कॉलेज में हुआ । हमारे साथ-साथ यशोदा भी बहुत खुश हुई।
जब वो जा रहा था।
तो मैंने कहा बेटा यशोदा आंटी के भी पैर छूकर आशीर्वाद लो।
वो आगे बड़ा और उसने यशोदा को भी उसी तरह गले लगाया जैसे मुझे लगाता था।
यशोदा के आँखे भर आई । उसने बेटे को ढेरों आशीर्वाद दीये ।
उसके जाने के बाद अक्सर में और यशोदा खाली घर को देखकर बेटे की बातें किया करते।
वो कहती 'दीदी बिटवा बहुत बड़ा अफसर बनकर आएगा '।
और मैं कहती 'और तुम्हें सोने का हार दिलाएगा ।'
वो शरमाते हुए कहतीं 'दीदी हम तो यूं ही कहत रहे । बिटवा खुश रहे तरक्की करें हमें और कुछ नहीं चाहिए।'
बेटा वहां जाकर अपनी पढ़ाई लिखाई में बहुत व्यस्त रहा ।
मुझे लगा अब कहां उसे यशोदा याद रही होगी ।
पर आज उसके इस फोन ने मेरा भरम तोड़ दिया।

सच में यशोदा के प्यार को भुलाना नामुमकिन था।
मुझे खुशी हुई कि बेटे को ये प्यार याद रहा।
मैंने जब यशोदा को ये बात बताई तो वो खुशी से झूम उठी।
इतना खुश मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। वो बोली 'हैं दीदी बिटवा ने सबसे पहले हमें हार दिलाने की बात कही। बिटवा ने हमें आपसे भी पहले रखा ।इतना सम्मान तो हमें आज तक किसी ने नहीं दिया। बिटवा के इस प्यार पर तो सौ हार कुरबान ।'
मैंने कहा 'नहीं यशोदा बिटवा को उसका वादा पूरा करने दो हम कल जाकर तुम्हारी पसंद का हार ले आएंगे ।'
और इस तरह यशोदा को उसका हार मिल गया। और यशोदा ने उसे जमाने भर में दिखाकर
हमार बिटवा हमार बिटवा करके
उसकी तारीफों का ढीढोंरा पीट दिया । अब बेटे की शादी का समय आया।
यशोदा पूरी तरह से दिन रात मेरे साथ हर काम में खड़ी रही।
बेटे ने भी सब जगह यशोदा को पूरा सम्मान दिया।
यशोदा कभी उसके लिए कामवाली बाई नहीं रही हमेशा उसकी यशोदा आंटी ही रही ।
शादी की थकान मिटाने के बाद एक दिन मैंने और यशोदा ने सोचा,
अब बहू के लिए घर में एक छोटा सा मुंह दिखाई का कार्यक्रम रख लेते हैं।
बहु का सबसे परिचय हो जाएगा ।
शादी की भीड़भाड़ में वो सबको ठीक से पहचान नहीं पाई होगी।
कार्यक्रम की तैयारी के बाद मैंने यशोदा को सोने के कंगन दिखाये।
और बताया कि 'सुबह बहू को मुँह दिखाई में ये देने वाली हूं। इन्होंने अपनी पहली कमाई से मुझे दिलवाये थे '।
यशोदा ने कहा 'बहुत सुंदर है दीदी'
अगली सुबह बहू का सबसे परिचय करा रही थी सब बहू को आशीर्वाद और तोहफे दे रहे थे।
तभी बेटे ने कहा 'मां यशोदा आंटी से भी तो मिलवाओ'
यशोदा झट आ गई और बोली 'हम बिटवा की जसोदा आंटी'
बहू पैर छूने लगी तो बेटे ने कहा 'अरे नहीं यशोदा आंटी को तो गले लगाओ मैं भी हमेशा इन्हें गले लगाता हूं '।
और बहू बेटा दोनों प्यार से यशोदा के गले लग गए ।मैंने कहा 'पर आज तो दोनों पैर छूकर आशीर्वाद भी लो'
यशोदा ने आशीर्वाद के साथ बहू की तरफ एक तोहफा भी बढ़ाया। मैंने कहाँ 'यशोदा इसकी कोई जरूरत नहीं है'। यशोदा हक से बोली 'हम हमारी बहू को देत रहे'।
मैंने देखा ये तो वही सोने का हार है ,जो मैंने उसे बेटे की पहली तनख्वाह से दिलवाया था।
मैंने कहा यशोदा "ये सब,"
तो वो अपने आंसू पोछते हुए बोली 'दीदी बिटवाा हमारे गले में जो बाहें डालत हैं उसके आगे ये सब हार फीके हैं।
सच में यशोदा के रोम रोम से मातृत्व झलक रहा था।
और मैं भाव विभोर ये दृश्य देख रही थी ।
कलयुग में ये प्रेम यशोदा ही कर सकती हैं ।

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