इजरायल की राजनीतिक हलचल पर भारत की गहरी निगाह क्यों
पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) के तेजी से बदलते भू-राजनीतिक पटल पर जब भी कोई नया राजनीतिक या सामरिक घटनाक्रम घटता है, तो उसका सीधा असर नई दिल्ली के विदेश नीति गलियारों में महसूस किया जाता है। इजरायल में जारी राजनीतिक घमासान, आगामी चुनाव और वहां के नेतृत्व में संभावित बदलाव केवल तेल अवीव या यरूशलेम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह भारत के विशाल आर्थिक और सामरिक हितों को भी सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर (IMEC), द्विपक्षीय रक्षा साझेदारी, अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों के सह-उत्पादन और अरब देशों के साथ भारत का नाजुक कूटनीतिक संतुलन (Diplomatic Balancing) ऐसे प्रमुख बिंदु हैं, जो इजरायल में सत्ता के समीकरण बदलने के साथ नए सिरे से आकार ले सकते हैं। यही वजह है कि भारत सरकार इजरायल के आगामी चुनाव और वहां बनने वाली नई सरकार की विदेश नीति पर पैनी नजर रखे हुए है।
IMEC कॉरिडोर का भविष्य और हाइफा पोर्ट पर भारतीय निवेश का दांव
भारत की इजरायल चुनाव पर कड़ी निगाह होने की सबसे पहली और बड़ी वजह 'भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर' (IMEC) की सफलता है। नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित यह कॉरिडोर भारत को संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, जॉर्डन और इजरायल के रास्ते यूरोप से जोड़ने की एक बेहद महत्वाकांक्षी आर्थिक योजना है। इस अंतरराष्ट्रीय कॉरिडोर में इजरायल की रणनीतिक स्थिति और उसका ऐतिहासिक हाइफा बंदरगाह (Haifa Port) सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। गौरतलब है कि भारतीय कॉरपोरेट समूह अडानी ग्रुप ने इजरायल के हाइफा पोर्ट में अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष निवेश करके उसका संचालन अपने हाथ में लिया है। अगर इजरायल के चुनाव के बाद वहां ऐसी सरकार आती है जो क्षेत्रीय अरब देशों के साथ तनाव कम करने और 'अब्राहम अकॉर्ड्स' (Abraham Accords) को आगे बढ़ाने में धीमी साबित होती है, तो IMEC प्रोजेक्ट की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है। भारत के लिए यह कॉरिडोर स्वेज नहर पर निर्भरता घटाने और यूरोप तक सामान तेजी से पहुंचाने का प्रमुख जरिया है, इसलिए इजरायल में राजनीतिक स्थिरता भारत के बुनियादी ढांचागत निवेश के लिए बेहद जरूरी है।
रक्षा तकनीक का आदान-प्रदान और 'मेक इन इंडिया' के तहत संयुक्त विनिर्माण
भारत और इजरायल के रिश्ते सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि समय की कसौटी पर परखे गए रक्षा साझेदार के रूप में स्थापित हो चुके हैं। दशकों से इजरायल भारत को बराक-8 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, हेरॉन ड्रोन, स्पाइक एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें और उन्नत रडार सिस्टम जैसे हाई-टेक रक्षा उपकरण मुहैया कराता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में यह संबंध केवल 'क्रेता-विक्रेता' (Buyer-Seller) का नहीं रहा, बल्कि 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत भारत में हथियारों और रक्षा तकनीकों के सह-उत्पादन (Joint Manufacturing) में बदल चुका है। भारत में कई इजरायली कंपनियां भारतीय निजी व सरकारी रक्षा उपक्रमों के साथ मिलकर ड्रोन, छोटे हथियार और मिसाइल कंपोनेंट्स तैयार कर रही हैं। इजरायल की राजनीति में नेतृत्व का कोई भी फेरबदल यह तय करेगा कि भावी इजरायली सरकार भारत के साथ संवेदनशील सैन्य तकनीकों और एआई-आधारित साइबर सुरक्षा समाधानों को साझा करने की गति को बनाए रखती है या नहीं। भारतीय रक्षा बल अपनी परिचालन तैयारियों को बनाए रखने के लिए इजरायल से निरंतर तकनीकी आपूर्ति पर निर्भर हैं, जिससे यह चुनाव भारत की सुरक्षा दृष्टि से भी संवेदनशील बन जाता है।
पश्चिम एशिया में भारत का कूटनीतिक संतुलन और आई2यू2 (I2U2) का खाका
भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता पश्चिम एशिया में उसका 'डिप्लोमैटिक बैलेंसिंग' (Diplomatic Balancing Act) माना जाता है। भारत ने एक तरफ इजरायल के साथ प्रगाढ़ सामरिक संबंध बनाए रखे हैं, तो दूसरी तरफ सऊदी अरब, यूएई, कतर, मिस्र और ईरान के साथ अपने रणनीतिक व ऊर्जा संबंधों को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। भारत 'I2U2' (भारत, इजरायल, अमेरिका और यूएई) जैसे आधुनिक चार-स्तरीय मंच का भी सक्रिय सदस्य है। हालांकि, इजरायल और फिलिस्तीन/गाजा के बीच चल रहे लंबे संघर्ष तथा ईरान के साथ इजरायल की बढ़ती तनातनी ने भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौती बढ़ा दी है। भारत चाहता है कि इजरायल में एक ऐसी व्यावहारिक और स्थिर सरकार बने जो मध्य पूर्व में बहुपक्षीय क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा दे सके। यदि इजरायल का भावी नेतृत्व अरब देशों के साथ संवाद का रास्ता खुला रखता है, तो इससे भारत को अपनी 'लुक्स वेस्ट' (Look West) नीति को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने में आसानी होगी।
उभरती तकनीक, खाद्य सुरक्षा और पश्चिम एशिया में नया शक्ति संतुलन
इजरायल चुनाव के नतीजे केवल युद्ध या शांति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एआई (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और जल प्रबंधन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में भारत-इजरायल सहयोग का भविष्य भी निर्धारित करेंगे। भारत में जल संकट से निपटने के लिए इजरायल की ड्रिप इरिगेशन और डिसेलिनेशन (समुद्री पानी को मीठा बनाने) तकनीक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की जा रही है। इसके अलावा, भारत की एक बड़ी प्रवासी आबादी (लगभग 90 लाख भारतीय) पूरे खाड़ी क्षेत्र में काम करती है, जिनकी सुरक्षा और रोजगार मध्य पूर्व की समग्र शांति से सीधे जुड़े हुए हैं। इजरायल में सत्ता की कमान किसके हाथ में जाएगी, इससे यह तय होगा कि मध्य पूर्व में स्थिरता आएगी या संघर्ष का दायरा और विस्तृत होगा। भारत की स्पष्ट रणनीति यह है कि क्षेत्रीय शांति बनी रहे ताकि उसके वाणिज्यिक व्यापारिक रास्ते सुरक्षित रहें, उसके नागरिक सुरक्षित रहें और IMEC जैसी महा-परियोजनाएं बिना किसी रुकावट के पूरी हो सकें। इन्हीं तमाम राष्ट्रीय, आर्थिक और सामरिक वजहों से नई दिल्ली इजरायल की चुनावी बिसात और वहां के हर राजनीतिक उलटफेर पर पैनी निगाह रखे हुए है।