जैवविविधता सम्मेलन: प्रकृति संरक्षण के लिए वैश्विक योजनाएँ कितनी कारगर हैं?
19 अक्टूबर 2026 जलवायु और पर्यावरण
दुनिया ने प्रकृति को बचाने के लिए महत्वाकाँक्षी लक्ष्य तय किए हैं, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने ‘प्रकृति के विरुद्ध युद्ध’ को समाप्त करने का आहवान किया है. लेकिन क्या ज़मीनी स्तर पर भी उतनी ही तेज़ी से काम हो पा रहा है? आर्मिनिया की राजधानी येरेवान में सोमवार को शुरू हो रहे संयुक्त राष्ट्र जैवविविधता सम्मेलन (कॉप17) में यही विषय चर्चा के केन्द्र में होगा.
19 से 30 अक्टूबर तक चलने वाले इस सम्मेलन में देश समीक्षा करेंगे कि प्रकृति के विनाश को रोकने और उसे बहाल करने के वैश्विक वादे किस हद तक पूरे हुए हैं और वर्ष 2030 की समयसीमा से पहले प्रयासों को कैसे तेज़ किया जाए.
जानिए, कॉप17 से जुड़े कुछ अहम तथ्य:
वैश्विक जैवविविधता फ़्रेमवर्क क्या है?व्यापक तस्वीर: वर्ष 2022 में अपनाया गया कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैवविविधता फ़्रेमवर्क प्रकृति के विनाश को रोकने और उसे बहाल करने की वैश्विक कार्ययोजना है. इसमें 2030 तक के लिए 23 और 2050 तक के लिए चार दीर्घकालिक लक्ष्य तय किए गए हैं.
इसका सबसे चर्चित लक्ष्य ‘30 by 30’ है, जिसके तहत वर्ष 2030 तक पृथ्वी के कम से कम 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण किया जाना है. यही संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को हासिल करने की समयसीमा भी है.
कार्ययोजना में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और आक्रामक प्रजातियों (invasive species) जैसी चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ संरक्षण के लिए धन जुटाने तथा पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने वाली आर्थिक नीतियों में सुधार पर भी ज़ोर दिया गया है.
अब तक कितनी प्रगति हुई है?ज़मीनी हक़ीकत: कुछ प्रगति हुई है, लेकिन रफ़्तार अब भी लक्ष्य से पीछे है.
जैवविविधता सन्धि के 196 पक्षकारों में से लगभग 90 प्रतिशत ने राष्ट्रीय लक्ष्य तय किए हैं. क़रीब 60 प्रतिशत ने राष्ट्रीय रणनीतियाँ और कार्ययोजनाएँ तैयार की हैं, जबकि 70 प्रतिशत से अधिक ने अपनी राष्ट्रीय रिपोर्ट सौंप दी हैं.
मगर, समीक्षा किए गए राष्ट्रीय लक्ष्यों में आधे से भी कम पर तय समयसीमा के अनुसार प्रगति हो रही है. पृथ्वी के 30 प्रतिशत भूमि और समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण के लिए देशों के मौजूदा संकल्प भी अपर्याप्त हैं. धन, तकनीकी क्षमता, विश्वसनीय आँकड़ों और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग की कमी बड़ी बाधाएँ बनी हुई हैं.
यूएन महासचिव ने शुक्रवार को येरेवान में विश्व नेताओं से कहा, “2030 तक का आधा सफ़र तय हो चुका है. येरेवान अब हमारे लिए जवाबदेही तय करने का अवसर है.”
यह क्यों अहम है: सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य वादों को ठोस कार्रवाई में बदलना है.
सम्मेलन में मुख्य रूप से इन छह मुद्दों पर चर्चा होगी:
- प्रगति की समीक्षा: वर्ष 2022 से अब तक वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों पर हुई प्रगति और कमियों का पहला सामूहिक आकलन.
- ज़मीनी कार्रवाई: राष्ट्रीय लक्ष्यों और योजनाओं को ठोस, मापने योग्य नतीजों में बदलना.
- वित्तीय संसाधन: वर्ष 2030 तक संरक्षण के लिए हर साल कम से कम 200 अरब डॉलर जुटाना, जिसमें 30 अरब डॉलर की अन्तरराष्ट्रीय सहायता शामिल है.
- 'कैली' कोष: आनुवंशिक संसाधनों से जुड़ी डिजिटल जानकारी के व्यावसायिक उपयोग से होने वाले लाभों का न्यायसंगत बँटवारा सुनिश्चित करना. इसे कोलम्बिया के कैली शहर में हुए 2024 सम्मेलन के दौरान स्थापित किया गया था.
- बेहतर निगरानी: विश्वसनीय आँकड़ों, तकनीकी क्षमता और सहयोग के ज़रिए प्रगति पर नज़र रखना.
- आर्थिक सुधार: प्रकृति को नुक़सान पहुँचाने वाली सब्सिडी और नीतियों में बदलाव तथा टिकाऊ उत्पादन व उपभोग को बढ़ावा देना.
मेज़बान देश आर्मिनिया चाहता है कि कॉप17 केवल प्रगति की समीक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि ठोस फ़ैसलों और कार्रवाई का रास्ता भी खोले.
संयुक्त राष्ट्र में आर्मिनिया के राजदूत परुयर होवहानिस्यान ने यूएन न्यूज़ से कहा, “हम यह मानकर नहीं चल सकते कि 2030 की समयसीमा अभी बहुत दूर है. येरेवान में लिए गए फ़ैसलों से वादों और ज़मीनी नतीजों के बीच की दूरी कम होनी चाहिए.”
जैवविविधता का क्षरण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे भोजन, पानी और स्वच्छ हवा से सीधे जुड़ा है. महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने विश्व नेताओं को याद दिलाया है कि जीवन की ये बुनियादी ज़रूरतें प्रकृति पर निर्भर हैं.
गुरुवार को जारी संयुक्त राष्ट्र की एक अहम रिपोर्ट ने वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों पर अब तक की प्रगति और कमियों को उजागर किया. येरेवान सम्मेलन की सबसे बड़ी कसौटी यही है: क्या दुनिया प्रकृति को बचाने के वादों को समय रहते वास्तविक नतीजों में बदल पाएगी?
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