इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पत्रकार सत्यम वर्मा की NSA के तहत हिरासत के आधारों में आंदोलनजीवी शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाए. जस्टिस अतुल श्रीधरन ने उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल से पूछा— यह आंदोलनजीवी शब्द कहां से आया? यह किसी आधिकारिक दस्तावेज में कैसे पहुंच गया? जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने 7 और 8 अक्टूबर को मामले में सुनवाई की.
कोर्ट ने विशेष रूप से सवाल किया कि किसी व्यक्ति की विचारधारा, उसके पास मौजूद साहित्य और किसी संगठन से उसके जुड़ाव को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत का आधार कैसे बनाया गया. हाईकोर्ट ने सत्यम वर्मा की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद 8 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया.
वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने दलील दी कि पत्रकारिता, लेखन, अनुवाद, साहित्य पढ़ना और किसी विचारधारा में विश्वास रखना अपने आप में NSA के तहत हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता. याचिका में आरोप लगाया गया कि हिरासत के आधारों में शामिल सामग्री का एक हिस्सा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर The Chronology नामक हैंडल द्वारा 14 अप्रैल 2026 को पोस्ट की गई थ्रेड से सीधे कॉपी किया गया था.
कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की
याचिका के मुताबिक, पुलिस की रिपोर्ट में भी इसी थ्रेड से कथित तौर पर सामग्री ली गई थी. यह याचिकाकर्ता का आरोप है, अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं. वर्मा ने दावा किया कि 13 अप्रैल को नोएडा में हिंसा होने के समय वह लखनऊ में थे.
उनकी याचिका के अनुसार, CCTV फुटेज में वह लखनऊ में दोपहर लगभग 2:13 बजे दिखाई देते हैं और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) भी उनकी मौजूदगी के दावे को समर्थन देते हैं. याचिका में यह भी कहा गया कि वर्मा का नाम उन 11 FIR में नहीं था, जिनका संदर्भ हिरासत की कार्रवाई में दिया गया. वर्मा ने अपनी पेशेवर आय को कथित आंदोलन के लिए धन मुहैया कराने से जोड़ने पर भी आपत्ति जताई. इन सभी बिंदुओं के आधार पर उन्होंने हिरासत आदेश को रद्द करने, तत्काल रिहाई और कथित अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की.
जानें क्या है पूरा मामला
मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए श्रमिक आंदोलन और उसके दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है. आंदोलन के दौरान मजदूरों की मांगों, औद्योगिक अशांति और पुलिस कार्रवाई को लेकर कई मामले दर्ज किए गए थे. उत्तर प्रदेश पुलिस ने पत्रकार और लेखक सत्यम वर्मा पर आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम में भूमिका निभाने का आरोप लगाया.
पुलिस के आरोपों में वर्मा का Revolutionary Workers Party of India (RWPI) से कथित जुड़ाव, मजदूरों के बीच साहित्य के जरिए विचारों का प्रसार और आंदोलन को प्रभावित करने की भूमिका शामिल थी.
गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने 12 मई 2026 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 की धारा 3(2) और 3(3) के तहत वर्मा की निवारक हिरासत का आदेश पारित किया. वर्मा ने इस आदेश और उसके बाद जारी सरकारी मंजूरी एवं पुष्टि संबंधी आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी.
कोर्ट ने आंदोलनजीवी शब्द पर उठाई आपत्ति
सत्यम वर्मा के खिलाफ हिरासत के आधारों में उन्हें कथित तौर पर अतार्किक, हठी और हिंसक आंदोलनजीवी बताया गया. दस्तावेज में आरोप लगाया गया कि उनकी कथित विचारधारा और गतिविधियां औद्योगिक क्षेत्र में अशांति पैदा करती हैं तथा निवेशकों और उद्योग संचालकों में भय का माहौल बनाती हैं. आदेश में यह भी कहा गया कि मजदूरों और आम जनता के बीच संचार माध्यमों के जरिए कथित रूप से प्रशासन-विरोधी और राज्य-विरोधी सोच को बढ़ावा दिया गया.
हाईकोर्ट ने इस भाषा के इस्तेमाल पर सवाल उठाया. अदालत की चिंता केवल एक शब्द तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह भी थी कि क्या हिरासत का आदेश ठोस सामग्री और प्रमाणों पर आधारित था या उसमें किसी व्यक्ति की विचारधारा के बारे में राय को आधार बनाया गया.
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मनीष वर्मा
मनीष वर्मा 21 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वो IBN7, न्यूज़ एक्सप्रेस, नेशनल वॉयस, MH-1 न्यूज़ चैनल तथा न्यूज़-ट्रैक , इंडियन ओपिनियन में काम कर चुके हैं. मुख्य रूप से 'बुंदेलखंड की भूख- अवार्डेड स्टोरी ऑफ IBN7', चार महाकुम्भ/अर्धकुंभ (2001, 2007, 2013, 2019), महेश योगी समाधि का अंतराष्ट्रीय कार्यक्रम, कुख्यात डकैत ददुआ एनकाउंटर, कुख्यात डकैत ठोकिया द्वारा 7 जवानों की नृशंस हत्या की स्पेशल कवरेज कर चुके हैं.
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