
बेंगलुरू में ब्रांडेड कंपनियों की पैकिंग में 15 हजार नकली इंजेक्शन बांटे गए थे.
बेंगलुरू में नकली दवाओं के बारे में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. विशेष जांच दल (एसआईटी) के अधिकारियों के मुताबिक, ब्रांडेड कंपनियों की पैकिंग में 15 हजार नकली इंजेक्शन बांटे गए थे. एसआईटी जांच में पता चला है कि आरोपियों ने पिछले डेढ़ साल में दो नकली एंटीबायोटिक दवाओं, जैविसेफ्टा और एम्ब्लेवियो की लगभग 15,000 शीशियां वितरित की थीं, जिनके अधिकार फाइजर के पास हैं. शुरुआती जांच में पता चला है कि आरोपी अप्रैल 2025 से इस नेटवर्क को चला रहे थे. उन्होंने शीशियों में नकली दवा भर दी और उन पर फाइजर कंपनी के लेबल लगा दिए.
आरोपियों ने कथित तौर पर कंपनी के असली लेबल तुर्की से मंगवाए, जहां कंपनी की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है. नकली दवाओं की रासायनिक संरचना का पता लगाने के लिए लैब रिपोर्ट का इंतजार है. अब सवाल है कि नकली दवाओं और इंजेक्शन की जब्ती पर कितने साल की जेल और कितना जुर्माना लगता है.
नकली दवाओं पर कितनी सजा, कितना जुर्माना?
इसको लेकर ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 27 में सख्त प्रावधान है. नकली दवा बनाने या बेचने पर सबसे सख्त प्रावधान इसी कानून में हैं. सजा इस पर निर्भर करती है कि दवा कैसी थी और उसका नतीजा क्या हुआ.
कानून कहता है, अगर नकली दवा से मौत या गंभीर चोट का खतरा है तो धारा 27(a)) लग सकती है.इसमें जुर्माना कम से कम 10 लाख या जब्त दवाओं की कीमत का तीन गुना होता है. इस कानून में न्यूनतम 10 साल की जेल से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान है. 2008 के संशोधन से पहले न्यूनतम सजा 5 साल थी.
नकली दवा के मामले में धारा 27(c) के तहत कम से कम 7 साल की जेल या उम्रकैद हो सकती है. जुर्माना कम से कम 3 लाख रुपए या जब्त दवाओं की कीमत का तीन गुना, जो भी ज्यादा हो, वो लागू किया जा सकता है.

मिलावटी दवा के मामले में क्या है नियम?
अगर दवा में मिलावट की गई है या बिना लाइसेंस की बिक्री जी जा रही है तो धारा 27(b) के तहत 3 से 5 साल की जेल और कम से कम 1 लाख या दवाओं की कीमत का तीन गुना जुर्माना लग सकता है.
अब मुआवजे से जुड़ा कानून भी जान लीजिए. धारा 27(a) के तहत वसूला गया जुर्माना मुआवजे के तौर पर उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसने नकली दवा ली. मरीज की मौत होने पर यह रकम उसके रिश्तेदारों को मिलती है.
दोबारा दोषी पाए जाने पर सजा और बढ़ जाती है. धारा 28A के तहत 27(c) के अपराध में दोबारा दोषी ठहरने पर कम से कम 10 साल से उम्रकैद तक की सजा और कम से कम 3 लाख रुपए जुर्माना है.

दूसरी धाराएं भी लग सकती हैं
ऐसे मामलों में पुलिस अक्सर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं भी जोड़ती है. इनमें धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज का इस्तेमाल और आपराधिक साजिश शामिल हैं. नकली लेबल और ब्रांड नाम के इस्तेमाल पर ट्रेडमार्क कानून के तहत भी कार्रवाई हो सकती है. अगर किसी मरीज की मौत साबित होती है, तो गैर-इरादतन हत्या जैसी गंभीर धाराओं का रास्ता भी खुल सकता है.
नकली दवा से जुड़े गंभीर अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती माने जाते हैं. यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती.
कैसे रहें अलर्ट?
- दवा और इंजेक्शन हमेशा लाइसेंस प्राप्त मेडिकल स्टोर से खरीदें और पक्का बिल ले.
- बैच नंबर, एक्सपायरी डेट और पैकिंग की छपाई जांचें. बहुत ज्यादा डिस्काउंट पर शक करें.
- अस्पताल में महंगे इंजेक्शन लगें तो मरीज के परिजन दवा की कंपनी और बैच का ब्योरा मांग सकते हैं.
- संदिग्ध दवा मिले तो राज्य के ड्रग कंट्रोल विभाग को शिकायत करें.
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अंकित गुप्ता
नवाबों के शहर लखनऊ में जन्मा. लिखने की चाहत और खबरों से आगे की कहानी जानने का जुनून पत्रकारिता में लाया. 2008 में लखनऊ के पहले हिन्दी टेबलॉयड ‘लखनऊ लीड’ से करियर से शुरुआत की. फीचर सेक्शन में हाथ आजमाया. फिर बाबा गोरखनाथ के नगरी गोरखपुर से दैनिक जागरण के आइनेक्स्ट से जुड़ा. शहर की खबरों और हेल्थ मैगजीन में रिपोर्टिंग के लिए 2013 में राजस्थान पत्रिका के जयपुर हेडऑफिस से जुड़ा. यहां करीब 5 साल बिताने के बाद डिजिटल की दुनिया में नई शुरुआत के लिए 2018 में दैनिक भास्कर के भोपाल हेड ऑफिस पहुंचा. रिसर्च, एक्सप्लेनर, डाटा स्टोरी और इंफोग्राफिक पर पकड़ बनाई. हेल्थ और साइंस की जटिल से जटिल खबरों को आसान शब्दों में समझाया. 2021 में दैनिक भास्कर को अलविदा कहकर TV9 ग्रुप के डिजिटल विंग से जुड़ा. फिलहाल TV9 में रहते हुए बतौर असिस्टेंट न्यूज एडिटर ‘नॉलेज’ सेक्शन की कमान संभाल रहा हूं. एक्सप्लेनर, डाटा और रिसर्च स्टोरीज पर फोकस भी है और दिलचस्पी भी.
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