राजस्थान के राज्य वित्त पोषित विश्वविद्यालयों में कुलगुरु पद पर नियुक्ति के लिए सीएएस (कॅरियर उन्नयन योजना) के तहत पदोन्नत प्रोफेसरों के 10 वर्ष के अनुभव की गणना को लेकर उत्पन्न विसंगति के समाधान के लिए राज्यपाल एवं कुलाधिपति के निर्देश पर तीन सदस्यी
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समिति यूजीसी विनियम, 2018 और राज्य वित्त पोषित विश्वविद्यालयों से संबंधित अधिनियमों के प्रावधानों का परीक्षण कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। समिति में राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलगुरु डॉ. प्रमोद येवले को संयोजक बनाया गया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के कुलगुरु डॉ. सुरेश अग्रवाल और राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, कोटा के कुलगुरु डॉ. निमित रंजन चौधरी को सदस्य नियुक्त किया गया है। समिति को 15 दिनों में रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। दरअसल, राजस्थान में प्रमोशन प्रक्रिया में देरी का खामियाजा प्रोफेसरों को कुलगुरु पद की पात्रता में भुगतना पड़ रहा है। पात्रता वर्षों पहले हासिल करने के बावजूद यदि 10 साल का अनुभव आदेश या पदभार की तारीख से गिना जाए तो कई वरिष्ठ प्रोफेसर अनुभव की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं कर पाते हैं। यही वह ‘विसंगति’ है जिसे राज्यपाल द्वारा गठित समिति अब यूजीसी नियमों और विश्वविद्यालय अधिनियमों के आधार पर स्पष्ट करेगी।
विवाद का केंद्र तीन अलग-अलग तारीखें
कुलगुरु नियुक्ति में 10 वर्ष के अनुभव की गणना के तहत विवाद का केंद्र तीन अलग-अलग तारीखें हैं। एक पक्ष में पात्रता की तिथि, यानी जिस तारीख को प्रोफेसर पद के लिए पात्रता हासिल हुई, दूसरी पदभार ग्रहण करने की तिथि, यानी पद पर वास्तविक रूप से कार्यभार ग्रहण करने की तारीख और तीसरी अधिसूचना जारी होने की तिथि, यानी पदोन्नति की अधिसूचना जारी होने की तारीख है। इनमें से किस तारीख से 10 वर्ष का अनुभव गिना जाए, समिति इसी मूल सवाल का परीक्षण करेगी।
यूजीसी के विनियमों और स्पष्टीकरणों के अनुसार प्रोफेसर के अनुभव की गणना पात्रता तिथि से की जानी चाहिए। कई राज्यों में यह व्यवस्था लागू है। राजस्थान में भी इसे लागू करने की मांग सरकार से की गई है। राज्यपाल द्वारा समिति गठित किए जाने के बाद उम्मीद है कि जल्द यूजीसी के अनुरूप निर्णय होगा और विसंगति दूर होगी। दिग्विजय सिंह शेखावत, क्षेत्र प्रमुख, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ