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आज नदियों में ज्यादा पानी, कल बूंद-बूंद को तरस सकता है भारत? हिमालय से आया बड़ा अलर्ट

September 14, 2026

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हिमालय में जो हो रहा है, उसका असर दिल्ली तक क्यों पहुंच सकता है?

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हिमालय में जो हो रहा है, उसका असर दिल्ली तक क्यों पहुंच सकता है?

हिमालय को अक्सर बर्फ से ढके खूबसूरत पहाड़ों और पर्यटन की तस्वीरों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस सोच को बदलने वाली चेतावनी दी है। रिपोर्ट को अक्टूबर में जारी किया जाना था, लेकिन 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई बड़ी तबाही के बाद इसका संक्षिप्त हिस्सा ‘इमरजेंसी इश्यू’ के तौर पर पहले ही सामने आ गया। इसमें बताया गया है कि हिमालय का संकट सिर्फ पहाड़ों का संकट नहीं, बल्कि भारत के पानी, खेती, बिजली और अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल है।

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हिमालय से जुड़ी है भारत की अर्थव्यवस्था

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हिमालय से जुड़ी है भारत की अर्थव्यवस्था

‘Prosperous and Resilient Himalayas’ रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय से मिलने वाला पानी भारत की GDP के 20 प्रतिशत से अधिक हिस्से को सहारा देता है। हिमालय से निकलने वाली नदियां खेती, शहरों, उद्योग और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में पहाड़ी पारिस्थितिकी में बड़ा बदलाव मैदानी भारत की अर्थव्यवस्था तक असर डाल सकता है।

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ग्लेशियर पिघले तो पहले पानी बढ़ेगा, फिर संकट

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ग्लेशियर पिघले तो पहले पानी बढ़ेगा, फिर संकट

हिमालय के कुछ हिस्से दुनिया के औसत तापमान की तुलना में दो से तीन गुना तेजी से गर्म हो रहे हैं। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। शुरुआत में ज्यादा बर्फ पिघलने से नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन ग्लेशियर छोटे होने के बाद यही स्रोत कम पानी देने लगेंगे। इसे ‘पीक वॉटर’ कहा जाता है और रिपोर्ट के मुताबिक इस सदी के मध्य तक हिमालय की कई नदी घाटियां इस स्थिति की ओर बढ़ सकती हैं।

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56 ग्लेशियर झीलें बेहद खतरनाक

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56 ग्लेशियर झीलें बेहद खतरनाक

ग्लेशियरों के पीछे हटने से पहाड़ों में झीलें बन सकती हैं। इनके प्राकृतिक बांध टूटने पर अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे आ सकता है। इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहते हैं। रिपोर्ट में सरकारी आंकड़ों के हवाले से भारत में 189 अधिक खतरे वाली और 56 बेहद ज्यादा खतरे वाली ग्लेशियर झीलों का जिक्र है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर इससे प्रभावित हो सकते हैं।

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सिर्फ ग्लेशियर नहीं, झरने और जमीन भी खतरे में

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सिर्फ ग्लेशियर नहीं, झरने और जमीन भी खतरे में

हिमालयी संकट का एक कम चर्चित पहलू झरनों का सूखना है। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय हिमालय में 30 लाख से अधिक झरने हैं और करीब आधे या तो सूख चुके हैं या सालभर पानी नहीं देते। दूसरी तरफ पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से पहाड़ों की जमीन कमजोर होकर भूस्खलन का खतरा बढ़ा सकती है। ब्लैक कार्बन भी ग्लेशियरों की बर्फ को तेजी से गर्म करने वाली समस्या बन रहा है।

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निर्माण और पर्यटन के बीच संतुलन जरूरी

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निर्माण और पर्यटन के बीच संतुलन जरूरी

सड़क, होटल और भवनों का तेजी से बढ़ता निर्माण भी जोखिम बढ़ा सकता है, खासकर संवेदनशील इलाकों में। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय हिमालयी क्षेत्र में हर साल करीब 40 करोड़ पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे में जरूरत सिर्फ पर्यटन बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसा मॉडल अपनाने की है जिससे स्थानीय लोगों की आय बढ़े और पहाड़ों पर दबाव कम हो। रिपोर्ट ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी, बेहतर चेतावनी प्रणाली, झरनों के संरक्षण, ब्लैक कार्बन में कमी और जोखिम वाले क्षेत्रों में नियंत्रित निर्माण पर जोर देती है।

हिमालय में होने वाला बदलाव पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर आने वाले वर्षों में पानी, खेती, बिजली और मैदानी शहरों की सुरक्षा तक पहुंच सकता है। इसलिए हिमालय की सुरक्षा को पर्यावरण का मुद्दा भर नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की बुनियादी जरूरत के तौर पर देखना होगा।

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