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हापुड़ में किस पार्टी का रहा राज? तीन सीटों का क्या है सियासी इतिहास, जानें किसका रहा दबदबा

September 12, 2026

UP Election 2027: यूपी में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, जिसको लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है. यूपी के प्रमुख जिलों में हापुड़ भी शामिल है. यहां विधानसभा की धौलाना, गढ़मुक्तेश्वर और हापुड़ तीन सीटें है. आपको बता दें कि हापुड़ बड़े कृषि व्यापार, स्टील उत्पादों और धार्मिक स्थलों के साथ-साथ अनाज, गुड़, गन्ने और तिलहन का एक बहुत बड़ा और प्रमुख व्यापारिक केंद्र है.

आइए जानते हैं हापुड़ विधानसभा सीट का इतिहास

हापुड़ विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास स्वतंत्रता के बाद से ही बेहद रोचक और विविधतापूर्ण रहा है. आजादी के शुरुआती दौर में यानी वर्ष 1951 तक यह विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित था, जिन्हें हापुड़ नॉर्थ और हापुड़ साउथ के नाम से पहचाना जाता था. वर्ष 1951 के पहले आम चुनावों में इन दोनों ही सीटों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दबदबा रहा, जहां हापुड़ नॉर्थ से प्रकाशवती और हापुड़ साउथ से लुफ्त अली खान ने विजय प्राप्त की. इस क्षेत्र के चुनावी रुझान को देखें तो लंबे समय तक कांग्रेस यहां की मुख्य राजनीतिक शक्ति बनी रही. हालांकि, समय के साथ राजनीतिक परिदृश्य बदला और जनता ने भारतीय जनता पार्टी को तीन बार, बहुजन समाज पार्टी को दो बार और एक बार निर्दलीय उम्मीदवार को भी अपना प्रतिनिधि चुनकर विधानसभा भेजा.

1962 के चुनावों में हुआ था बड़ा उलटफेर

आजादी के तुरंत बाद वर्ष 1951 तक हापुड़ की दोनों सीटें सामान्य श्रेणी के अंतर्गत आती थीं. इसके बाद वर्ष 1957 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस पार्टी ने अपना वर्चस्व कायम रखा. इस चुनाव में हापुड़ की एक सीट से लुफ्त अली खान ने 59,737 मत प्राप्त कर दोबारा जीत हासिल की, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस के ही वीर सेन 55,309 वोट पाकर विजयी हुए. हालांकि, वर्ष 1962 के चुनावों में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला जब निर्दलीय प्रत्याशी प्रेम सुंदर नारायण सिंह ने कांग्रेस के प्रत्याशी को शिकस्त देकर इस सीट पर कब्जा जमाया.

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जानें किस पार्टी का कितना रहा दबदबा

वर्ष 1967 में हापुड़ विधानसभा सीट के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया, जब इस क्षेत्र को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित घोषित कर दिया गया. आरक्षण लागू होने के बाद हुए पहले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के उम्मीदवार डीडी सेन को जनता ने चुनकर विधानसभा भेजा. इसके बाद के चुनावों में विभिन्न दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखा गया. वर्ष 1969 में भारतीय क्रांति दल के लक्ष्मण स्वरूप ने बाजी मारी, तो वर्ष 1974 में कांग्रेस के टिकट पर भूप सिंह केन विधायक बने. वर्ष 1977 की राजनीतिक लहर में जनता पार्टी के बनारसी दास को विजय मिली, लेकिन वर्ष 1980 में कांग्रेस ने फिर वापसी की और भूप सिंह केन पुनः चुने गए. इसके बाद वर्ष 1985 और 1989 के चुनावों में कांग्रेस नेता गजराज सिंह ने लगातार दो बार जीत दर्ज कर क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई.

2017 से इस सीट पर भाजपा की पकड़ 

90 के दशक की शुरुआत के साथ ही हापुड़ की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का प्रवेश हुआ. वर्ष 1991 के चुनावों में भाजपा के विजेंद्र कुमार नक्शे वाले ने पहली बार इस सीट पर पार्टी का परचम लहराया. हालांकि, वर्ष 1993 में कांग्रेस के गजराज सिंह ने एक बार फिर वापसी की, लेकिन इसके बाद हुए चुनाव में भाजपा प्रत्याशी जयप्रकाश ने उन्हें हराकर सीट पर कब्जा कर लिया. नई सदी की शुरुआत में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा और वर्ष 2002 तथा 2007 के चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के धर्मपाल सिंह ने लगातार दो बार जीत हासिल की. वर्ष 2012 के चुनाव में जनता ने एक बार फिर कांग्रेस के गजराज सिंह पर भरोसा जताया, जबकि वर्ष 2017 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के विजयपाल आढ़ती ने जीत हासिल कर इस सीट पर पुनः कमल खिलाया. वहीं, 2022 के चुनावों में भी विजयपाल आढ़ती चुनावी मैदान में जीत हासिल की. हालांकि आरएलडी के प्रत्याशी गजराज सिंह के साथ उनकी कड़ी टक्कर देखने को मिली, लेकिन वहां हापुड़ की सीट पर चुनाव जितने में कामयाब रहे. उन्होंने गजराज सिंह को 7,034 वोटों से हराया. 2022 के चुनाव में विजयपाल आढ़ती को 97,862 वोट वहीं, आरएलडी प्रत्याशी गजराज को 90,828 और BSP प्रत्याशी मनीष सिंह को 50,751 वोट मिली. 

हापुड़ विधानसभा में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कुल मतदाता: 3,08,409 हैं, जिनमें से पुरुष मतदाता: 1,67,846, महिला मतदाता: 1,40,550 और अन्य (तृतीय लिंग): 12 है.  वहीं, रिपोर्ट्स के मुताबिक हापुड़ विधानसभा में हिंदू - 2,40,000 – 2,50,000सबसे बड़ा समूह (SC, जाट, वैश्य, ब्राह्मण, त्यागी, ठाकुर, सैनी आदि शामिल)यानी कि  (लगभग 78-80%) वोटर्स है. वहीं, मुस्लिम≈ 60,000 – 80,000 (लगभग 19-26%) वोटर्स है. सिख वोटर्स लगभग≈ 4,000 (लगभग 1% से कम) वोटर्स है. 

जानें गढ़मुक्तेश्वर और धौलाना विधानसभा सीट का ऐतिहासिक सफर

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के अंतर्गत आने वाली गढ़मुक्तेश्वर और धौलाना विधानसभा सीटें राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं. इन दोनों क्षेत्रों का अपना एक अनूठा चुनावी इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य रहा है, जहां समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को जनता ने प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया है.

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गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा क्षेत्र का गठन और शुरुआती दौर

गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा सीट का गठन वर्ष 1962 में हुआ था. अपनी शुरुआत में यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित की गई थी, और इस ऐतिहासिक पहले चुनाव में बाबू वीर सेन ने जीत हासिल कर यहां के प्रथम विधायक बने, हालांकि, वर्ष 1967 के अगले चुनावों में राजनीतिक हवा बदली और निर्दलीय प्रत्याशी बलबीर सिंह ने इस सीट पर परचम लहराया. इसके बाद वर्ष 1969 में बलबीर सिंह ने भारतीय क्रांति दल के टिकट पर दोबारा जीत दर्ज की. नब्बे के दशक से पहले तक यहां विभिन्न राजनीतिक धाराओं का प्रभाव देखा गया, जिसमें वर्ष 1974 में कांग्रेस के मंजूर अहमद, 1977 में जनता पार्टी के सखावत हुसैन, 1980 में कांग्रेस के कुंवर वीरेंद्र सिंह ढाना, 1985 में लोकदल के बाबू कनक सिंह और 1989 में कांग्रेस के डॉक्टर अख्तर ने जीत दर्ज कर विधानसभा में क्षेत्र की नुमाइंदगी की.

वर्ष 1991 के चुनाव के साथ ही गढ़मुक्तेश्वर की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का प्रवेश हुआ, जब कृष्णवीर सिरोही ने पहली बार यहां से जीत दर्ज की. वर्ष 1993 के चुनाव में भी कृष्णवीर सिरोही ने अपना दबदबा कायम रखते हुए लगातार दूसरी बार इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा. इसके बाद वर्ष 1996 में भाजपा के रामनरेश रावत यहाँ से विधायक चुने गए. नई सदी की शुरुआत के साथ ही इस क्षेत्र में समाजवादी पार्टी का मजबूत दौर शुरू हुआ, जहां वर्ष 2002, 2007 और 2012 के लगातार तीन विधानसभा चुनावों में मदन चौहान ने सपा प्रत्याशी के रूप में हैट्रिक लगाकर जीत का परचम लहराया. हालांकि, वर्ष 2017 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने वापसी की और डॉक्टर कमल मलिक ने जीत हासिल कर इस सीट पर पुनः कमल खिलाया. वहीं, 2022 में भी भाजपा प्रत्याशी ने हरेंद्र सिंह तेवतिया ने समाज पार्टी प्रत्याशी रविंद्र चौधरी को हराया एक बार फिर से भाजपा का परचम लहराया. 

इस सीट पर भाजपा और सपा का रहा है दबदबा

1990 के दशक की बात करें भाजपा का प्रभाव ज्यादा रहा (1991, 1993, 1996 में जीत). वहीं, 2017 से अब तक: भाजपा लगातार दो बार जीत चुकी है और वर्तमान में सीट पर उसका कब्जा है. 2002 से 2012 तक: समाजवादी पार्टी (SP) का दबदबा रहा. मदन चौहान ने लगातार तीन बार (2002, 2007, 2012) सीट जीती. उससे पहले: कांग्रेस, लोक दल, जनता पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की थी. पिछले 10 सालों (2017 के बाद) में भाजपा का दबदबा है. उससे पहले समाजवादी पार्टी मजबूत थी. सीट पर मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही रहा है.

धौलाना विधानसभा सीट का गठन और चुनावी इतिहास

पिलखुवा और धौलाना के भू-भाग को मिलाकर वर्ष 2012 के परिसीमन में धौलाना विधानसभा सीट का नया गठन किया गया था. नए गठन से पूर्व यह पूरा इलाका गाजियाबाद जिले के मोदीनगर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा हुआ करता था. वर्ष 2012 में धौलाना सीट पर हुए पहले ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी धर्मेश तोमर ने शानदार जीत हासिल की थी, जबकि बहुजन समाज पार्टी के असलम चौधरी दूसरे स्थान पर रहे थे. इसके बाद वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में समीकरण बदले और बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी असलम चौधरी ने भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता डॉक्टर रमेश चंद तोमर को एक कड़े मुकाबले में हराकर इस सीट पर विजय प्राप्त की. वहीं, 2022 में एक बार फिर धर्मेश सिंह तोमर ने जीत हासिल की, लेकिन 2022 में उन्होंने भाजपा की टिकट से चुनाव लड़ा था. धर्मेश सिंह तोमार की इस सीट पर अच्छी पकड़ मानी जाती है. इस सीट पर अभी तक कुल मिलाकर तीन चुनाव हुए है, जिनमें से 2 बार धर्मेश सिंह तोमर को विधायक के रूप में जनता ने चुना.