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यूपी की पिंडरा सीट के सियासी समीकरण, जहां से ताल ठोकेंगे कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय

September 3, 2026

उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनावी रण की बिसात बिछनी शुरू हो गई है. यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय द्वारा वाराणसी की पिंडरा विधानसभा सीट से मैदान में उतरने के ऐलान ने पूर्वांचल के सियासी पारे को चढ़ा दिया है. अजय राय के लिए यह सीट सिर्फ एक चुनावी मैदान नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक पहचान और सियासी सफर की शुरुआत से जुड़ा उनका पुराना गढ़ है. वह पिंडरा, जिसे पहले कोलअसला के नाम से जाना जाता था, से पांच बार विधायक रह चुके हैं.

उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी और 1996, 2002 तथा 2007 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर कोलअसला सीट से जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2009 में भाजपा से अलग होकर उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव जीता और 2012 में परिसीमन के बाद बनी 'पिंडरा' सीट से कांग्रेस के सिंबल पर विधानसभा पहुंचे. हालांकि, 2017 और 2022 के चुनावों में उन्हें भाजपा के डॉ. अवधेश सिंह से लगातार दो बार शिकस्त का सामना करना पड़ा.

2017 और 2022 में क्यों हारे अजय राय?

अजय राय की लगातार जीत का कारण उनका मजबूत स्थानीय जनसंपर्क, जमीनी कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और क्षेत्र में उनकी बोल्ड जननेता की छवि थी. हालांकि, 2017 में भाजपा की लहर, हिंदू मतों का एकतरफा ध्रुवीकरण और बहुजन समाज पार्टी द्वारा मजबूत प्रत्याशी उतारने के कारण वोटों के बिखराव ने उनकी हार का मार्ग प्रशस्त किया. 2022 में भी मोदी-योगी फैक्टर और भाजपा के कैडर वोट बैंक के लामबंद होने के कारण वे इस सीट को दोबारा हासिल नहीं कर सके.

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पिंडरा सीटा का पूरा समीकरण

​पिंडरा विधानसभा क्षेत्र में लगभग 3.73 लाख मतदाता हैं. इनमें पुरुष मतदाताओं की संख्या लगभग 2 लाख और महिला मतदाताओं की संख्या करीब 1.73 लाख है. पिंडरा सीट का राजनीतिक गणित मुख्य रूप से कुर्मी और पटेल मतदाताओं के इर्द-गिर्द घूमता है. यहां लगभग 80,000 से अधिक कुर्मी/पटेल मतदाता हैं, जो किसी भी चुनाव का रुख मोड़ने की क्षमता रखते हैं. ​

दूसरे स्थान पर दलित (अनुसूचित जाति) मतदाता आते हैं, जिनकी संख्या लगभग 65,000 से 70,000 के बीच है. ब्राह्मण और भूमिहार मतदाताओं की कुल संख्या करीब 60,000 है. अजय राय खुद भी भूमिहार समाज से आते हैं. ​इसके अलावा यहां यादव (लगभग 35,000-40,000), मुस्लिम (लगभग 25,000) और मौर्य/कुशवाहा मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

पिंडरा सीट का नाम, परिसीमन और इतिहास

​वाराणसी जिले का यह विधानसभा क्षेत्र अपने अनोखे राजनीतिक इतिहास के लिए जाना जाता है. ​आजादी के बाद 1952 में इस क्षेत्र को वाराणसी पश्चिम के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1957 में इसका पुनर्गठन हुआ और इसे कोलअसला विधानसभा नाम दिया गया. वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद (जो 2012 के चुनाव से लागू हुआ) कोलअसला का अस्तित्व खत्म होकर यह पिंडरा (विधानसभा सीट संख्या 384) के रूप में सामने आया.

भौगोलिक दृष्टि से पिंडरा, वाराणसी जिले के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक प्रमुख ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाका है. वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (बाबतपुर) इसी पिंडरा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जो इसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाता है. ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र बनारस के कृषि और व्यापारिक गलियारे का अहम हिस्सा रहा है.

किस पार्टी का कितना दबदबा रहा? 

​पिंडरा (पूर्व में कोलअसला) का इतिहास भारतीय राजनीति के बड़े बदलावों का गवाह रहा है. ​एक समय यह सीट कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की लाल क्रांति का गढ़ मानी जाती थी. दिग्गज कम्युनिस्ट नेता उदल ने यहां से रिकॉर्ड 9 बार विधायक बनकर इतिहास रचा था.
1996 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर उतरे अजय राय ने उदल को हराकर वामपंथ के किले को ध्वस्त कर दिया. इसके बाद 2012 तक पार्टी बदलने के बावजूद (भाजपा, निर्दलीय, कांग्रेस) सीट अजय राय के पास ही रही. ​2017 और 2022 के चुनावों में भाजपा के डॉ. अवधेश सिंह ने जीत हासिल कर यहां कमल खिलाया.

अजय राय का राजनीतिक सफर

​अजय राय की छात्र राजनीति से लेकर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने तक की यात्रा काफी उथल-पुथल भरी रही है. अजय राय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से की थी. 1996 में पहली बार भाजपा के सिंबल पर चुनाव जीतकर कोलअसला (पिंडरा) से विधानसभा पहुंचे और लगातार तीन बार (1996, 2002, 2007) भाजपा विधायक रहे. 2009 में वाराणसी लोकसभा सीट से मुरली मनोहर जोशी को टिकट मिलने पर उन्होंने भाजपा से बगावत कर दी. वे समाजवादी पार्टी में शामिल हुए, लेकिन लोकसभा चुनाव हार गए. इसके बाद उसी वर्ष कोलअसला उप-चुनाव निर्दलीय लड़कर जीता.

2012 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और पिंडरा से विधायक बने. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने उन्हें वाराणसी सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में उतारा. ​उनके जुझारू तेवर और जमीनी संघर्ष को देखते हुए कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया.

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