world-news

पंजाब में क्यों नहीं हो पा रहा अकाली दल का भाजपा से गठबंधन, कहां फंसा है पेंच?

August 30, 2026

Explainer: पंजाब में क्यों नहीं हो पा रहा अकाली दल का भाजपा से गठबंधन, कहां फंसा है पेंच?

Aug 30, 2026 10:44 am ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली।

Follow us on Google News

share

एनडीए से अलग होने के बाद पंजाब का सियासी परिदृश्य तेजी से बदला है। 2022 के विधानसभा चुनाव और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़े। इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों ही मुख्यधारा के चुनाव में पिछड़ गए।

पंजाब में क्यों नहीं हो पा रहा अकाली दल का भाजपा से गठबंधन, कहां फंसा है पेंच?

पंजाब में भाजपा और अकाली गठबंधन को लेकर स्थितियां पहले से काफी बदल चुकी हैं।

पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले राज्य के राजनीतिक गलियारों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच गठबंधन की अटकलों को हवा दी जा रही है। भाजपा भले ही सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रही है, लेकिन पर्दे के पीछे दो पुराने सहयोगियों के बीच चर्चाएं भी तेज हैं। सूत्र बताते हैं कि सुखबीर सिंह बादल की अगुवाई वाले शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच फिर से गठबंधन को लेकर उच्च स्तरीय बातचीत चल रही है।

कृषि कानूनों के विरोध में सितंबर 2020 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का दामन छोड़ने वाले अकाली दल की तरफ से इस पुनर्मिलन की कोशिशें काफी तेज हैं। अकाली दल की एकमात्र लोकसभा सांसद हरसिमरत कौर बादल, उनके भाई और पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया सहित दल के कई दिग्गज नेता फिर से साथ आने की पुरजोर पैरवी कर रहे हैं। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों दल 2020 के पहले वाले अपने उस राजनीतिक तालमेल को दोबारा बहाल कर पाएंगे जिसके दम पर उन्होंने दशकों तक पंजाब की सत्ता पर राज किया था?

बिगड़ा BJP-अकाली का चुनावी गणित

एनडीए से अलग होने के बाद पंजाब का सियासी परिदृश्य तेजी से बदला है। 2022 के विधानसभा चुनाव और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़े। इसका नतीजा यह हुआ कि दोनों ही मुख्यधारा के चुनाव में पिछड़ गए। 2022 में जहां आम आदमी पार्टी (आप) ने प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता संभाली, वहीं 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर अपनी बढ़त बनाई। विश्लेषकों का मानना है कि पारंपरिक अकाली-भाजपा गठबंधन एक प्राकृतिक सामाजिक समीकरण पर आधारित था। पंजाब के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले हिंदू मतदातओं को भाजपा का जनाधार माना जाता था। वहीं, अकाली दल के पास ग्रामीण इलाकों और सिखों का बड़ा वोट बैंक था। यह दोनों दल एक-दूसरे के वोट बैंक में सेंध लगाए बिना एक-दूसरे के पूरक बनकर चुनाव जीतते थे। लेकिन पिछले चार वर्षों में स्थितियां काफी बदल चुकी हैं।

भाजपा की मजबूत स्थिति

यदि 2024 लोकसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा और अकाली दल की सौदेबाजी की ताकत में बड़ा बदलाव आया है। भाजपा का वोट शेयर 9 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत तक जा पहुंचा। वहीं, अकाली दल का वोट शेयर 27 प्रतिशत से घटकर 13 प्रतिशत पर आ गया है। इन आंकड़ों से साफ है कि सीटों के मामले में भले ही भाजपा का खाता न खुला हो, लेकिन उसने अपना वोट बैंक दोगुना कर लिया है। शहरी इलाकों के साथ-साथ भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ दलित और सिख वोटों में भी पैठ बनाई है। दूसरी ओर अकाली दल का वोट बैंक आधा रह गया है। यही वजह है कि इस बार वार्ता की मेज पर भाजपा का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।

कहां फंसा है पेंच?

2020 के बाद से अकाली दल और कांग्रेस के कई दिग्गज नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इनमें अकाली के मजबूत गढ़ माझा क्षेत्र के कई पूर्व विधायक जैसे अमरपाल बोनी, मनजीत सिंह मन्ना और रवि करण सिंह काहलों शामिल हैं। इसके अलावा कांग्रेस से भाजपा में आए केवल ढिल्लों और पूर्व केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे बड़े नाम भी हैं जो कभी अकाली दल के प्रखर आलोचक रहे हैं। इसके अतिरिक्त, 1984 के सिख विरोधी दंगा पीड़ितों को इंसाफ दिलाने वाले वरिष्ठ वकील और आप के पूर्व नेता एचएस फुल्का भी भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं, जो बादल परिवार के कड़े विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में अकाली और भाजपा नेताओं का एक मंच पर साथ आना और कार्यकर्ताओं का निचले स्तर पर वोट ट्रांसफर करा पाना एक बड़ी चुनौती होगी।

राह कितनी आसान?

अकाली दल इस समय चौतरफा राजनीतिक दबाव झेल रहा है। एक तरफ जहां अमृतपाल सिंह के नेतृत्व वाला 'वारिस पंजाब दे' और अन्य अकाली गुट उसके पंथिक वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आप और कांग्रेस भी अपनी पैठ मजबूत कर रही हैं। ऐसे में अकाली दल को भाजपा के रूप में एक मजबूत सहारे की तलाश है। हालांकि, अकाली दल के भीतर ही एक धड़ा यह मानता है कि यह अब अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी के दौर की भाजपा नहीं है। वर्तमान भाजपा पंजाब में बड़े भाई की भूमिका निभाना चाहती है और सिख बहुल सीटों पर भी अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है।