
नेपाल में तबाही का लेवल-4 अलर्टImage Credit source: PTI
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ में अब तक 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 1500 से अधिक लोग लापता हैं. पिछले 50 घंटों से भी ज्यादा वक्त से नेपाल अपने इतिहास का सबसे बड़ा दर्द झेल रहा है. नेपाल की तबाही की तस्वीरें दिल दहला देने वाली हैं. बीते 26 अगस्त को नेपाल की ओर बहुत ही तेज गति से तबाही आई थी. ऐसा माना जा रहा है कि ये आपदा हिमालय में बहुत ऊंचाई पर शुरू हुई, जहां ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर गिरा था, जिससे पानी और मलबे का एक तेज बहाव नीचे की तरफ बहने लगा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैटेलाइट तस्वीरों से भी इसके सबूत मिले कि ग्लेशियर के निचले हिस्से का एक बड़ा टुकड़ा लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई से टूटकर आया और घाटी में लगभग 1,200 मीटर नीचे गिरा और गिरते समय अपने साथ चट्टानें और मलबा भी साथ लाया. लहरों के साथ चट्टान ने बड़े-बड़े मकानों को चूर-चूर कर दिया. इस आपदा में सबसे ज्यादा नुकसान नेपाल के रसुवा जिले में हुआ है, जो चीन की सीमा के ठीक दक्षिण में है. बताया जा रहा है लहरों के ऐसे ही आक्रोश और आक्रमण के बाद त्रिशूली नदी में पानी का स्तर सिर्फ 30 मिनट में 9 मीटर तक बढ़ गया था. उसके बाद ऐसी तबाही आई की सबकुछ बर्बाद हो गया.
नेपाल में फिर तबाही का अलार्म
चिंता की बात ये है कि नेपाल में इसी तरह की तबाही का अलार्म फिर बज रहा है. कहानी सिर्फ एक झील के टूटने की नहीं है, जो नई जानकारी आ रही है, उसके अनुसार नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बनी एक और झील आंशिक रूप से टूट चुकी है. शुओकेन-पोइक त्सांगपो नदी के संगम में बनी झील टूट चुकी है. कहा ये भी जा रहा है कि झील के टूटने से बड़ी तादाद में पानी बहा है.
चीन ने पहले इस झील को लेकर ‘लेवल 4’ का अलर्ट जारी किया था. ये प्रतिक्रिया प्रणाली का सबसे शुरुआती स्तर है. लेवल 4 अलर्ट का मतलब है कि कोई संभावित खतरा आने वाला है. इस स्तर पर प्रशासनिक तंत्र सतर्क हो जाता है, निगरानी बढ़ाई जाती है और स्थानीय आपातकालीन टीमों को स्टैंडबाय पर रखा जाता है. अब सवाल अब ये है कि आशंका क्या है, खतरा कितना बड़ा है, नेपाल में आगे और अब क्या होने वाला है?
भोटेकोशी नदी में फिर सैलाब आने का खतरा
दरअसल, शुओकेन-पोइक त्सांगपो नदियां तिब्बत से निकलती हैं. दोनों नदियां नेपाल में भोटेकोशी नदी की धारा का हिस्सा हैं. ऐसे में झील के टूटने से भोटेकोशी नदी में फिर सैलाब आने का खतरा है. इस वक्त जो तबाही मची है, वो भी भोटेकोशी नदी में सैलाब के बाद ही आई थी. बड़ी बात ये है कि नेपाल के रसुवा जिले में तबाही का फिर खतरा बना हुआ है. खतरे की वजह से नेपाल के रसुवा जिले में रेस्क्यू ऑपरेशन 90 मिनट के लिए रोक दिया गया था. नदी के रास्ते में आने वाले गांव खाली कराए जा रहे हैं, लोगों और सुरक्षाकर्मियों को तुरंत सुरक्षित जगहों पर जाने को कहा गया है.
तिब्बत की झील का किनारा टूटने की सूचना
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल के रसुवा जिला प्रशासन ने तिब्बत की झील के किनारे टूटने की सूचना दी है. हालांकि अधिकारियों को अभी पक्के तौर पर ये जानकारी नहीं है कि झील कितनी बड़ी है, लेकिन हालात की गंभीरता को देखते हुए चीन की इंजीनियरिंग टीम ने एरियल सर्वे कर 3D मॉडलिंग की है, जिसके आधार पर आई जानकारी डराने वाली है. अनुमान है कि ये झील करीब 150 मीटर लंबी है और इसकी गहराई 40 से 50 मीटर तक है, लेकिन सबसे बड़ी चिंता है झील में लगातार बढ़ता पानी. गुरुवार तक इसमें करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी था, लेकिन शुक्रवार को पानी बढ़कर करीब 25 लाख क्यूबिक मीटर हो गया है.
कहा जा रहा है कि अगले तीन दिनों में इसका पानी 50 लाख क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकता है. ये इतना पानी है जितना 1,200 ओलंपिक साइज स्विमिंग पूल में होता है. ऐसी आशंका है कि 1 सितंबर तक पानी का दबाव सबसे ज्यादा होगा। और इतने दबाव में ये झील कभी भी टूट सकती है. अब इतना पानी हजारों मीटर की ऊंचाई से मलबे और पत्थरों के साथ बहेगा तो तबाही बहुत बड़ी हो सकती है. उससे भी बड़ी जो 26 अगस्त को हुई, जब पहाड़ों से आए सैलाब ने कुछ ही मिनटों में नेपाल के हालात खराब कर दिए. कई रिहायशी इलाके मिट्टी में मिल गए. सैलाब से पहले जहां ऊंची-ऊंची इमारतें थीं, वहां अब सिर्फ मलबा ही मलबा है.
नेपाल बाढ़ में 550 से ज्यादा लोगों की मौत
तबाही के बाद नेपाल में लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है. लापता लोगों की तलाश की जा रही है. अब तक की जानकारी के मुताबिक 550 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. कई शव बरामद किए जा चुके हैं. अकेले चितवान इलाके से 190 लोगों के शव मिले हैं. वहीं, करीब 1500 लोगों का अस्पताल में इलाज चल रहा है और 1000 लोगों की तलाश जारी है. कई जगहों पर हालात ये हैं कि अस्पतालों में शव रखने की जगह नहीं बची है. रसुवा जिले के प्रशासन के मुताबिक कुछ शवों की पहचान हो पाना मुश्किल है, जिसके लिए DNA टेस्ट कराए जाएंगे.
बढ़ती गर्मी हिमालय के ग्लेशियरों को कर रही कमजोर
इस दर्दनाक तबाही के बीच एक सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों. नेपाल में अचानक इतना बड़ा सैलाब क्यों आया? इसका कारण अस्थाई झील का फटना माना जा रहा है. एक्सपर्ट्स इस तरह की घटनाओं को क्लाइमेट चेंज से जोड़कर देख रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी हिमालय के ग्लेशियरों और पहाड़ों को कमजोर कर रही है.
संयुक्त राष्ट्र की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हिमालय ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. पिछले 30 सालों में नेपाल के करीब एक-तिहाई ग्लेशियर पिघल चुके हैं. चिंता की बात ये है कि पिछले एक दशक में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार और बढ़ी है. अब ये पहले के मुकाबले करीब 65 प्रतिशत ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं.
इस बढ़ती गर्मी का असर सिर्फ ग्लेशियरों तक नहीं है, बल्कि पहाड़ों की ढलानों पर जमी बर्फ भी पिघल रही है. जब ढलानों पर जमी बर्फ पिघलती है, तो चट्टानों और मिट्टी को बांधे रखने वाली पकड़ कमजोर हो जाती है. यही वजह है कि पहाड़ों के टूटने और लैंडस्लाइड का खतरा बढ़ रहा है. इसलिए ऐसे खतरों को वक्त रहने पहचानने की जरूरत है, वरना प्रकृति का ये प्रकोप आगे भी झेलना पड़ सकता है.
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आकाश वत्स बाबुल
साल 2014 से टीवी और डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में हूं. माता सीता की जन्मस्थली बिहार के सीतामढ़ी से निकलकर दिल्ली पहुंचा. करियर की शुरुआत नेपाल में बतौर आरजे हुई. नेपाल में करीब दो साल तक एक निजी एफएम चैनल से जुड़े रहे. फिर दिल्ली में समाचार प्लस, न्यूज 24, टाइम्स नेटवर्क, जी मीडिया जैसे संस्थानों के लिए विभिन्न क्षेत्र में काम कर चुका हूं. डेस्क से लेकर फील्ड तक काम करने का अनुभव. पढ़ना और लिखना शौक भी है और पेशा भी. कोई पत्र-पत्रिकाओं के लिए अलग-अलग मुद्दों पर लिखते रहते हैं. वर्तमान में TV9 भारतवर्ष से बतौर Senior Special Correspondent जुड़ा हुआ हूं. TV9 भारतवर्ष के अवॉर्ड विनिंग शो 'दृश्यम' के जरिए अनकहे भारत की कहानी भी लोगों तक पहुंचा रहा हूं. यूपी, एमपी, बिहार, राजस्थान समेत देश के कई राज्यों में बतौर रिपोर्टर सियासी खबरों को करीब से देखा और दर्शकों को दिखाया-बताया. नेपाल में साल 2025 में हुए Zen-G आंदोलन को भी करीब से देखा, समझा. राजनीति के साथ ही क्रिकेट, सिनेमा की खबरों में भी दिलचस्पी है. मानवीय संवेदनाओं से जुड़े हर घटनाक्रम को सिस्टम और समाज तक पहुंचाने का क्रम जारी है.
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