साजिश के संकेत नहीं; जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड की रिपोर्ट लोकसभा में पेश
Aug 12, 2026 05:44 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान, नई दिल्ली।
Justice Yashwant Varma: यह रिपोर्ट न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत तैयार की गई है। इसमें जांच की पूरी कार्यवाही के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को शामिल किया गया है।

जस्टिस यशवंत वर्मा।
Justice Yashwant Varma: इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से भारी मात्रा में नकदी मिलने के आरोपों की जांच कर रही तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा के पटल पर रख दी गई। संसद के मॉनसून सत्र 2026 के समापन से ठीक एक दिन पहले पेश की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मामले में किसी प्रकार की साजिश के संकेत नहीं मिले हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का घर के भीतर मौजूद होना ऐसा मामला नहीं है जिसे अनदेखा किया जा सके।
यह रिपोर्ट न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत तैयार की गई है। इसमें जांच की पूरी कार्यवाही के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को शामिल किया गया है। सीएनएन न्यूज-18 ने अपनी एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा है कि रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि जस्टिस वर्मा जांच की कार्यवाही के दौरान सवालों के स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आए। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपनी विस्तृत जांच पूरी कर इस वर्ष मई में ही अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी।
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस उच्चस्तरीय जांच समिति के अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अरविंद कुमार थे। समिति में बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रशेखर और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल थे।
क्या था विवाद?
यह पूरा विवाद 14 मार्च 2025 की रात को शुरू हुआ था, जब नई दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास में अचानक आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों और अधिकारियों को परिसर के एक स्टोर रूम से भारी मात्रा में अधजली और बिना जली नकदी बरामद हुई थी। उस समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाईकोर्ट में जज के रूप में कार्यरत थे। हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद उन्हें उनके मूल कैडर यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
इससे पहले तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना द्वारा गठित एक आंतरिक न्यायिक समिति ने भी पाया था कि जिस स्टोर रूम से नकदी बरामद हुई थी उस पर जस्टिस वर्मा का सक्रिय या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
जुलाई 2025 में संसद के 200 से अधिक सांसदों ने हस्ताक्षर कर जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए महाभियोग चलाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसके बाद यह वैधानिक समिति गठित की गई थी। यद्यपि जस्टिस वर्मा ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों का खंडन करते हुए इसे साजिश बताया था।
