नवभारत विशेष: सरकार क्यों चाहती है परिसीमन पर बहस? हंगामा होने के पूरे आसार
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Written By:
अंकिता पटेल
Updated On: Aug 08, 2026 | 10:25 AM IST
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सार
Lok Sabha Delimitation: परिसीमन विधेयक को लेकर फिर सियासी हलचल तेज है। लोकसभा सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव के बीच सरकार दोबारा बहस क्यों चाहती है, जानिए इसकी वजह।

परिसीमन पर बहस (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
विस्तार
Delimitation Bill Political Debate: गत 16 अप्रैल को मोदी सरकार ने लोकसभा में परिसीमन विधेयक 2026 पेश किया था और इसके साथ ही दो अन्य विधेयक भी लाये गए थे। एक था संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 और दूसरा था संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 इन तीनों ही विधेयकों का उद्देश्य आपस में जुड़ा हुआ था।
सबसे बड़ा प्रस्ताव लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 करने का था। इसके पीछे तर्क यह था कि 1971 के बाद देश की आबादी बहुत बढ़ चुकी है, जबकि लोकसभा की निर्वाचित सीटें अभी भी 543 ही बनी हुई हैं। लेकिन यह विधेयक 17 अप्रैल को 230 मतों के मुकाबले 298 मतों से गिर गया।
इसके पक्ष में 230 मत पड़े थे, वहीं इसके विरोध में 298 मत पड़े, इस तरह 68 मत विरोध में ज्यादा होने से यह विधेयक सदन में गिर गया था। मानसून सत्र में अभी तक सरकार सदन में एक दिन भी अपना कामकाज नहीं कर सकी, बावजूद इसके मोदी सरकार आखिर परिसीमन विधेयक पर फिर से बहस क्यों कराना चाहती है? परिसीमन का अर्थ केवल संसदीय सीटों की सीमाएं बदलना भर नहीं है, इसका सीधा संबंध इस बात से भी है कि देश के किस हिस्से को संसद में कितनी तव्वजो मिलेगी।
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परिसीमन पर उत्तर-दक्षिण के बीच बढ़ी बहस
संविधान का मूल सिद्धांत है प्रत्येक सांसद लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे, लेकिन पिछले कई दशकों से लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण स्थगित रहा है ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को कम जनसंख्या के कारण संसद में अपनी कम आवाज होने का खामियाजा न भुगतना पड़े।
परिसीमन को लेकर जो तरह-तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों में कि उनकी संसदीय शक्ति घट सकती है। दूसरी ओर उत्तर भारत के राज्यों का तर्क है कि वर्तमान जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
सरकार का मानना है कि यदि परिसीमन जैसे विषय पर संसद में चर्चा नहीं होगी, तो राजनीतिक बहस पूरी तरह सार्वजनिक सभाओं, सोशल मीडिया और क्षेत्रीय राजनीति के हवाले हो जायेगी और तब हर कोई अपने-अपने हिसाब से इस स्थिति का निष्कर्ष निकालेगा।
परिसीमन पर संसद में बहस चाहती है सरकार
देश परिसीमन के मामले में बिल्कुल स्पष्ट राय रखे, इसलिए सरकार चाहती है कि संसद में संस्थागत रूप से चर्चा हो और विभिन्न राजनीतिक दल आधिकारिक रूप से अपनी बात संसद में रखें। संसद में परिसीमन को लेकर सरकार विमर्श चाहती है, क्योंकि भारत में नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन अवश्यंभावी है।
इसलिए सरकार चाहती है कि संसद का मानसून सत्र समाप्त होने के पहले एक बार संसदीय परिदृश्य में परिसीमन का मुद्दा भी आ जाए, जिससे कि सत्र खत्म होने के बाद जब सांसद अपने-अपने क्षेत्र में जाएं, तो बातचीत और बहस में आने वाला यह मुद्दा भी शामिल रहे।
सरकार का मानना है कि व्यापक बहस से देश के बहुसंख्यक लोग इस पक्ष में मजबूती के साथ खड़े हो सकेंगे कि हर सांसद को एक निश्चित संख्या में ही लोगों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, तभी वह ठीक से अपने कामकाज को अंजाम दे सकेगा। परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। भारत एक संघीय गणराज्य है, जहां राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि प्रतिनिधित्व का संतुलन जरूरी है।
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हंगामा होने के पूरे आसार
विपक्ष पहले सरकार से स्पष्ट नीति और आश्वासन चाहता है। यही कारण है कि संसद में इस मुद्दे को लेकर संभावित बहस केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रहने वाली। इसमें जनसंख्या नीति, संघीय ढांचा, राज्यों के अधिकार, क्षेत्रीय असंतुलन और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व जैसे अनेक सवाल भी शामिल होंगे।
लोकतंत्र में किसी भी विवादास्पद विषय का सबसे अच्छा समाधान संवाद भी होता है। यदि संसद में गंभीर, तथ्य आधारित और मर्यादित बहस होती है, तो उसका लाभ केवल सरकार को ही नहीं होगा और न ही सिर्फ विपक्ष को बल्कि उसका लाभ समूचे लोकतंत्र को मिलेगा।
लेख- डॉ. अनिता राठौर के द्वारा
