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दतिया में नरोत्तम मिश्रा जीते, राजेंद्र भारती हार गए, घनश्याम की पेंशन पक्की और आशुतोष बैक टू...

August 3, 2026

भोपाल, 3 अगस्त 2026: भारत निर्वाचन आयोग के डॉक्यूमेंट देखेंगे तो दतिया के उपचुनाव में कांग्रेस पार्टी की ओर से घनश्याम सिंह और भारतीय जनता पार्टी की ओर से कर श्री आशुतोष तिवारी के बीच में चुनाव था लेकिन मुकाबला नरोत्तम मिश्रा और राजेंद्र भारती के बीच में था। उपचुनाव का नतीजा आज 3 अगस्त को घोषित हुआ है लेकिन मुकाबले का आधा नतीजा 2 अगस्त को आ गया था (जब राजेंद्र भारती को कांग्रेस से निष्कासित किया गया) और आधा आज आ गया। अब आप विश्वास पूर्वक कह सकते हैं कि दतिया के राजनीतिक मुकाबले में, नरोत्तम मिश्रा जीत गए और राजेंद्र भारती हार गए। घनश्याम सिंह की पेंशन पक्की हो गई और आशुतोष तिवारी बैक टू...। 

दतिया की राजनीति में मुख्य मुकाबला, राजेंद्र भारती और नरोत्तम मिश्रा के बीच में था। 2023 के विधानसभा चुनाव में श्री अवधेश नायक के कांग्रेस पार्टी में चले जाने के कारण नरोत्तम मिश्रा को नुकसान हुआ और वह चुनाव हार गए। इसमें भी कोई डिबेट नहीं है कि नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ, दतिया में बड़ी लहर थी। यदि वह खाली कुर्सी से चुनाव लड़ते तो खाली कुर्सी जीत जाती लेकिन भारत के चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया में, निर्वाचन दो प्रत्याशियों के बीच में होता है। इसलिए मुकाबला राजेंद्र भारती और नरोत्तम मिश्रा के बीच में था। इसमें भी कोई डिबेट नहीं की राजेंद्र भारती, नरोत्तम मिश्रा के सामने एक मजबूत कैंडिडेट थे। 

दतिया के उपचुनाव में जो कुछ भी चला वह सब आपने देखा लेकिन इसी चुनावी दंगल में एक और मुकाबला चल रहा था। सब जानते हैं कि राजेंद्र भारती के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को नरोत्तम मिश्रा ने फैसले तक पहुंचाया। राजेंद्र भारती कोर्ट में कैसे को पेंडिंग बनाए रखना चाहते थे लेकिन नरोत्तम मिश्रा ने तारीख पर तारीख लगवाई जिससे फैसला आ गया। इसको भी राजनीति ही कहते हैं और इस खेल में नरोत्तम मिश्रा जीत गए। राजेंद्र भारती चुनाव के अयोग्य घोषित हो गए और नरोत्तम मिश्रा को पता था कि आप घनश्याम सिंह उनके सामने पानी कम... हैं, लेकिन फिर भारतीय जनता पार्टी में एक और खेल चला। नरोत्तम मिश्रा को उनके ओवर कॉन्फिडेंस ने लापरवाह बना दिया और नतीजा टिकट उनके हाथ से चला गया। नरोत्तम मिश्रा को शॉक लगा, लेकिन 48 घंटे के भीतर उन्होंने फिर से पॉलिटिक्स खेलना शुरू कर दिया। 

नरोत्तम मिश्रा ने सुनिश्चित किया कि राजेंद्र भारती के परिवार को भी टिकट नहीं मिलना चाहिए। नरोत्तम मिश्रा को पता था कि राजेंद्र भारती और आशुतोष तिवारी के बीच अच्छे संबंध है। नरोत्तम मिश्रा को यह भी पता है कि आशुतोष तिवारी को उनके परिवार, उनके रिश्तेदार, पार्टी के कार्यकर्ता और भारतीय जनता पार्टी का कट्टर वोट बैंक, कितना समर्थन करेगा। ग्वालियर चंबल संभाग में, आशुतोष तिवारी जैसे प्रयोग पहले भी फेल हो चुके हैं। नरोत्तम मिश्रा को पता है कि, उनके सामने घनश्याम सिंह अभी भी पानी कम... हैं। 

ऐसी स्थिति में, नरोत्तम मिश्रा ने वह किया जो पार्टी लाइन पर चलते हुए उनको करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने वह नहीं किया जो वह कर सकते थे। उन्होंने वह होने दिया जो आशुतोष तिवारी कर रहे थे, क्योंकि उनको पता था कि आशुतोष तिवारी जो कर रहे हैं, उसके कारण फायदा उनको ही होगा और आज जब नतीजे आए तो बिल्कुल वैसा ही हुआ है। 

आशुतोष तिवारी ने राजेंद्र भारती पर विश्वास किया। राजेंद्र भारती ने पार्टी प्रत्याशी के लिए उतना कम नहीं किया। आशुतोष तिवारी को उम्मीद थी कि यदि राजेंद्र भारती के समर्थक, मतदान से अनुपस्थित हो जाएंगे, तो उनको फायदा होगा लेकिन एक्चुअल में उल्टा हुआ। भारतीय जनता पार्टी का कट्टर समर्थक वोट बैंक मतदान से अनुपस्थित हो गया। उन्होंने कांग्रेस को वोट नहीं दिया लेकिन भाजपा को भी नहीं दिया। इधर राजा घनश्याम सिंह के लिए जिंदगी और मौत का सवाल था। यदि यह वाला चुनाव हार जाते तो फिर पार्टी में प्लास्टिक की लाल वाली कुर्सी भी नहीं मिलती। और फिर राजेंद्र भारतीय एवं अवधेश नायक का भी डर लग रहा था। 

लोकतंत्र में चुनाव वही जीतता है जो, चुनाव लड़ते समय डर रहा होता है। जो डरता है वही तैयारी करता है और जो डर कर तैयारी करता है, वही जीत जाता है। 

अब बात सिर्फ इतनी ऐसी है कि 2028 के चुनाव में और नरोत्तम मिश्रा के सामने ना तो राजेंद्र भारती हैं और ना ही भारतीय जनता पार्टी से टिकट की दावेदारी करने वाले आशुतोष तिवारी। पार्टी को भी समझ में आ गया है, नरोत्तम के बिना दतिया की पार नहीं पड़ेगी। मतलब मुकाबले में पक्का पहलवान भी बाहर हो गया और टंगड़ी अड़ा कर गिराने वाला भी सेवाड़ा चला जाएगा। 2028 के चुनाव में उनके सामने होंगे राजा घनश्याम सिंह। अब तो बताने की जरूरत भी नहीं है कि नरोत्तम मिश्रा के सामने राजा घनश्याम सिंह अभी भी पानी कम... हैं।