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'आलोचना से परहेज नहीं, लेकिन स्कूली किताबों से न फैलाएं अनगढ़ और भ्रामक बातें', NCERT विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी - supreme court on ncert textbook fair criticism not misinformation

September 9, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है, लेकिन स्कूली किताबों में बिना तथ्य के ...और पढ़ें

एनसीईआरटी केस में सुप्रीम कोर्ट की नसीहत

एनसीईआरटी केस में सुप्रीम कोर्ट की नसीहत

HighLights

  1. न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं, पर सही मंच पर हो।

  2. एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की किताब में विवादित अध्याय।

  3. सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद की।

पीटीआई, नई दिल्ली। न्यायतंत्र एक जीवंत लोकतंत्र की धड़कन है, जो तार्किक और रचनात्मक आलोचना से कभी मुंह नहीं मोड़ता। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार के लिए स्वस्थ और निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक है।

हालांकि, यह सीमा रेखा बहुत स्पष्ट है - फर्क चुप्पी और आलोचना का नहीं, बल्कि जिम्मेदार सार्वजनिक बहस और बिना सोचे-समझे थोपे गए अनगढ़ बयानों के बीच का है।

बच्चों के कोमल मन और भविष्य पर बिना किसी तथ्य की पुष्टि के इस तरह की बातें थोपना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही हो सकती है।

लेकिन, ऐसी आलोचना सही मंच के जरिये और निष्पक्ष व तर्कसंगत तरीके से की जानी चाहिए।

यह संवेदनशील मामला आठवीं कक्षा की एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक से जुड़ा है, जिसमें न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार को लेकर आपत्तिजनक बातें जोड़ी गई थीं। कोर्ट ने पहले ही इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए फरवरी में इसके प्रकाशन और डिजिटल प्रसार पर कड़ा प्रतिबंध लगाया था।

न्यायालय ने तब गहरी नाराजगी जताते हुए कहा था कि इससे न्याय संस्था आहत हुई है। इस पूरी प्रक्रिया में शामिल तीन शिक्षाविदों - प्रोफेसर मिशेल दानीनो, अपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार - पर शुरुआत में गाज गिरी थी।

न्यायालय ने तीनों शिक्षाविदों के स्पष्टीकरण को गंभीरता से सुना, जिसमें उन्होंने बताया कि पाठ्यक्रम तैयार करना एक सामूहिक प्रक्रिया थी, न कि किसी एक व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय।

अदालत ने माना कि उनकी टिप्पणियां केवल पाठ्य सामग्री के संदर्भ में थीं, न कि किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने शुरुआती सख्त रुख में नरमी बरती। अदालत ने शिक्षाविदों के खिलाफ दिए गए आदेश को वापस लेते हुए संस्थानों को इस पर स्वतंत्र निर्णय लेने की छूट दी।

चूंकि केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर अब उस विवादित अध्याय को हटाकर नए और परिष्कृत पाठ्यक्रम को शामिल कर लिया गया है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने इस स्वतः संज्ञान कार्यवाही को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया है।

यह फैसला इस बात की बानगी है कि न्यायपालिका और शिक्षा व्यवस्था दोनों ही सुधार के मार्ग पर एक साथ आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।