world-news

Nana Patekar Caste: कौन-सा मलाल जिंदगी भर नाना को अंदर ही अंदर खा गया? अधूरी रही एक इच्छा! किस जाति से थे?

October 8, 2026

Time Published: Thursday, October 8, 2026, 17:37 [IST]

Nana Patekar Caste: बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन के बाद उनकी जिंदगी से जुड़े कई पहलू फिर चर्चा में हैं। करीब पांच दशक तक हिंदी और मराठी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले नाना का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ गजानन पाटेकर था।

फिल्मों में आने से पहले उन्होंने आर्थिक तंगी देखी, फिल्मी पोस्टर पेंट किए और थिएटर में अपनी पहचान बनाई। उनके पिता टेक्सटाइल पेंटिंग और छोटे कारोबार से जुड़े थे। अब उनके निधन के बाद एक सवाल फिर चर्चा में है- नाना पाटेकर किस जाति से थे? उनके पिता क्या करते थे और उनका बचपन कैसा गुजरा? कौन-सा मलाल नाना को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था? आइए जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े ये पहलू...

nana-patekar-caste

Nana Patekar Caste: नाना पाटेकर किस जाति से थे?

नाना पाटेकर ने एक पुराने इंटरव्यू में अपनी पत्नी नीलकांति पाटेकर की जाति का जिक्र करते हुए खुद को मराठा बताया था। उन्होंने कहा था कि उनकी पत्नी ब्राह्मण हैं, जबकि वह खुद मराठा हैं। यह बयान उनके पुराने इंटरव्यू में प्रकाशित हुआ था। हालांकि, नाना बाद के सालों में जाति की पहचान को लेकर अलग नजरिया भी जाहिर करते रहे। उन्होंने कहा था कि उनकी मां ने उन्हें सिखाया था कि उनकी जाति 'इंसान' और धर्म 'मानवता' है। इसलिए नाना की जाति को लेकर सबसे सटीक बात यह है कि उन्होंने एक पुराने इंटरव्यू में खुद को मराठा बताया था, लेकिन बाद में उन्होंने जातिगत पहचान को महत्व नहीं देने की बात भी कही।

Nana Patekar Wife Caste: पत्नी नीलकांति ब्राह्मण थीं, फिर कैसे हुई शादी?

नाना पाटेकर की पत्नी का नाम नीलकांति पाटेकर है। नाना के मुताबिक, नीलकांति ब्राह्मण परिवार से थीं और बैंक में अधिकारी के पद पर काम करती थीं। दोनों की मुलाकात थिएटर से जुड़ाव के दौरान हुई थी। नीलकांति नौकरी के साथ थिएटर में भी दिलचस्पी रखती थीं। उस समय नाना की कमाई बेहद कम थी। उन्हें थिएटर के एक शो के लिए करीब 50 रुपये मिलते थे, जबकि नीलकांति की मासिक तनख्वाह करीब 2,500 रुपये थी। नाना ने बताया था कि नीलकांति ने उन्हें पैसे की चिंता किए बिना अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। दोनों ने 1978 में शादी की। नाना ने अपने करियर के शुरुआती संघर्ष में पत्नी के सहयोग को महत्वपूर्ण बताया था।

Nana Patekar Father: नाना पाटेकर के पिता क्या करते थे?

नाना के पिता टेक्सटाइल पेंटिंग और कपड़े के कारोबार से जुड़े थे। नाना के एक पुराने इंटरव्यू के मुताबिक, उनके पिता मुंबई में रहते थे, जबकि नाना अपनी मां और भाइयों के साथ मुरुड में पले-बढ़े। नाना के पिता को थिएटर और तमाशा पसंद था। नाना जब गांव में नाटक करते थे, तो उनके पिता मुंबई से उन्हें देखने गांव तक पहुंचे थे। नाना ने बताया था कि बचपन में उन्हें लगता था कि उनके पिता उनके बड़े भाई को ज्यादा प्यार करते हैं। लेकिन जब उनके पिता उनका 'वाल्मीकि' नाटक देखने मुंबई से गांव पहुंचे, तो उनकी यह गलतफहमी दूर हुई।

पिता का कारोबार कैसे डूबा?

नाना की जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब उनके पिता के कारोबारी साझेदार ने उनका साथ छोड़ दिया। करीब 1964 में कारोबार बंद हो गया और परिवार गंभीर आर्थिक संकट में आ गया। उस समय नाना नौवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। परिवार की मदद के लिए उन्होंने कम उम्र में काम शुरू कर दिया। नाना ने बताया था कि वह स्कूल के बाद फिल्मी पोस्टर पेंट करते थे। इसके लिए उन्हें करीब 35 रुपये महीने मिलते थे। काम के बदले उन्हें दिन में एक वक्त खाना भी मिलता था। स्कूल से निकलने के बाद वह काम पर जाते थे और रोज कई किलोमीटर पैदल चलते थे।

35 रुपये की कमाई से शुरू हुआ सफर

नाना ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया था कि गरीबी के दौर में वह फिल्मी पोस्टर पेंट करते थे। दिन में स्कूल और शाम को काम- यही उनकी जिंदगी थी। कई बार आर्थिक स्थिति इतनी खराब होती थी कि खाने तक के लिए पैसे नहीं होते थे। यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बना। बाद में उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ाई की और एक विज्ञापन एजेंसी में नौकरी भी की। लेकिन उनका असली जुनून थिएटर था।

थिएटर ने बदली जिंदगी

नाना बचपन से ही गांव के नाटकों में हिस्सा लेते थे। आगे चलकर उन्होंने रंगमंच को गंभीरता से अपना करियर बनाया। कॉलेज के बाद विज्ञापन एजेंसी में नौकरी करने के बावजूद उनका मन थिएटर में लगा रहा। इसी दौरान उनकी मुलाकात अभिनेत्री स्मिता पाटिल से हुई। 1979 में निर्देशक विजया मेहता के नाटक 'हमीदाबाई ची कोठी' से नाना के थिएटर करियर को बड़ी पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने 'महा सागर' और 'पुरुष' जैसे चर्चित नाटकों में भी काम किया।

फिल्मों में नहीं आना चाहते थे नाना

नाना के मुताबिक, शुरुआत में फिल्मों में काम करने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। वह ऐसी भूमिकाएं करना चाहते थे, जिनमें अभिनय की गुंजाइश हो। अभिनेत्री स्मिता पाटिल के कहने पर उन्होंने 'आज की आवाज' में काम किया। इसके बाद 'अंकुश', 'सलाम बॉम्बे', 'त्रिशाग्नि' और 'सागर संगम' जैसी फिल्मों में नजर आए। लेकिन उन्हें बड़ी व्यावसायिक पहचान 'परिंदा' से मिली।

'परिंदा' ने बनाया अलग पहचान वाला अभिनेता

1989 में रिलीज हुई 'परिंदा' में नाना ने अन्ना का किरदार निभाया। यह भूमिका उनके करियर के लिए निर्णायक साबित हुई। फिल्म के क्लाइमैक्स में उनके किरदार को आग में जलते हुए दिखाया गया था। नाना ने बाद में बताया था कि शूटिंग के दौरान आग नियंत्रण से बाहर फैल गई थी और उनके हाथ झुलस गए थे। इसके बाद उन्होंने 'क्रांतिवीर', 'तिरंगा', 'अब तक छप्पन', 'अपहरण' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए।

पिता की मौत का रहा गहरा असर

नाना ने बताया था कि कारोबार खत्म होने के बाद उनके पिता आर्थिक संकट से परेशान रहने लगे थे। बाद में उन्हें हार्ट अटैक आया। नाना के मुताबिक, जब वह करीब 28 साल के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना का उन पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने एक इंटरव्यू में यह भी बताया था कि उन्हें जीवन भर इस बात का अफसोस रहा कि वह अपनी कमाई से पिता के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सके।

Who Was Nana Patekar Mother: नाना पाटेकर की मां कौन थीं?

नाना की मां का नाम निर्मला पाटेकर बताया जाता है। वह गृहिणी थीं। नाना ने अपनी मां को सख्त लेकिन स्नेही बताया था। आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उन्होंने परिवार को संभाला। नाना ने यह भी बताया था कि उन्होंने खाना बनाना अपनी मां से सीखा था। उनकी मां का निधन जनवरी 2019 में करीब 99 साल की उम्र में हुआ था।

पिता के लिए कुछ नहीं कर पाने का रहा मलाल

नाना पाटेकर की जिंदगी में पिता का स्थान बेहद खास था। संघर्ष के दिनों को याद करते हुए वह कई बार अपने पिता का जिक्र करते थे। उन्हें सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का रहा कि वह अपनी मेहनत की कमाई से कभी पिता के हाथ पर एक रुपया भी नहीं रख सके। नाना के मुताबिक, उनके पिता के आखिरी दिन बेहद मुश्किलों में गुजरे। उनका इलाज मुंबई के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन अस्पताल में हुआ था। उस समय नाना खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। हालात इतने खराब थे कि पिता की दवाइयों तक के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे।

इस मुश्किल दौर में नाना के दोस्तों ने उनका साथ दिया और दवाइयों के खर्च में मदद की। पिता को खोने और उनके लिए कुछ न कर पाने का यह दर्द नाना के मन में लंबे समय तक रहा। यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और अभिनय का अहम हिस्सा बना।