मध्य प्रदेश में 26 साल पुराने और 2022 की वैज्ञानिक बाघ गणना के आंकड़ों की तुलना के बाद नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों गणनाओं की पद्धति अलग होने से सीधी तुलना उचित नहीं है।
26 साल में बाघों की संख्या में मामूली बढ़ोतरी
- Published: 01 Aug 2026, 09:54 AM IST
- Last Updated: 01 Aug 2026, 09:54 AM IST
मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या को लेकर नए आंकड़ों ने एक नई बहस छेड़ दी है। करीब 26 साल पहले संसद में पेश किए गए आंकड़ों और हालिया वैज्ञानिक बाघ गणना के बीच अंतर बेहद कम दिखाई दे रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पहले की गणना वास्तविकता से अधिक थी या फिर वर्षों से चल रहे संरक्षण प्रयासों के बावजूद बाघों की संख्या अपेक्षित गति से नहीं बढ़ सकी।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना
साल 2010 में संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, वर्ष 2001-02 में देश में 3,642 और मध्य प्रदेश में 710 बाघ होने का अनुमान लगाया गया था। वहीं 2022 की ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन रिपोर्ट में देश में 3,682 और मध्य प्रदेश में 785 बाघ दर्ज किए गए। यानी करीब 26 वर्षों में देशभर में सिर्फ 40 और मध्य प्रदेश में 75 बाघों का अंतर नजर आता है।
हालांकि वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि इन दोनों आंकड़ों की सीधी तुलना करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि दोनों की गणना अलग-अलग पद्धतियों से की गई है। वर्ष 2001-02 तक बाघों की गणना पगमार्क (पंजों के निशान) के आधार पर होती थी। इस पद्धति में एक ही बाघ के निशान कई बार गिने जाने या अलग-अलग बाघों के निशानों में भ्रम की संभावना रहती थी।
ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन
वहीं 2006 से भारत में ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन शुरू किया गया, जिसमें कैमरा ट्रैप, डीएनए विश्लेषण, साइन सर्वे और अन्य वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। कैमरा ट्रैप से खींची गई तस्वीरों में बाघों की धारियों के आधार पर उनकी सटीक पहचान की जाती है, इसलिए इसे अधिक विश्वसनीय तरीका माना जाता है।
सरकार का अनुमान है कि बाघों की संख्या में हर साल औसतन 6 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए। दूसरी ओर, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के आंकड़ों के अनुसार 2012 से 2026 के बीच देश में 1,700 से अधिक बाघों की मौत दर्ज की गई है। वहीं बाघ संरक्षण परियोजनाओं पर हर वर्ष औसतन करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। ऐसे में संरक्षण के परिणामों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
आंकड़े पूरी तरह विश्वसनीय
वन्यजीव कार्यकर्ता का कहना है कि पूरे मामले का जवाब विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण से ही मिल सकता है। उनके अनुसार पुराने और नए आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर स्पष्ट मापदंड तय होने चाहिए और सरकार को इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
वहीं, भारत सरकार के वन मंत्रालय में एडीजी (वन्यजीव) ने कहा कि वर्तमान वैज्ञानिक पद्धति से तैयार किए गए आंकड़े पूरी तरह विश्वसनीय हैं। उन्होंने बताया कि मंत्रालय 2010 से आधुनिक तकनीकों के आधार पर बाघों की गणना कर रहा है, जबकि 2001-02 के आंकड़ों पर वे टिप्पणी नहीं कर सकते।