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MP का वो गांव, जहां हर घर में फौजी: 11 जवानों ने दी शहादत, इनमें 9 मुस्लिम; विश्व युद्ध-कारगिल और ऑपरेशन सिंदूर में दुश्मनों से लड़े - Morena News

August 15, 2026

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यह लाइन मुरैना जिले के काजी बसई गांव पर फिट बैठती है। जब देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, तो ऐसे गांव भी हैं जहां देशभक्ति सिर्फ नारों और समारोहों तक ही सीमित नहीं है। यहां पीढ़ियां देश की सीमाओं पर खड़ी होकर आजादी की हिफाजत करती रही हैं।

काजी बसई गांव भी ऐसा ही गांव है। गांव की गलियों में चलते हुए शायद ही कोई ऐसा घर मिले, जिसका रिश्ता सेना, CRPF, BSF या किसी अन्य सुरक्षा बल से न रहा हो। किसी घर की दीवार पर शहीद की तस्वीर है तो कहीं आज भी बेटा, पोता या भतीजा सीमा पर तैनात है।

गांव ने प्रथम विश्व युद्ध से लेकर दूसरे विश्व युद्ध, 1962 का चीन युद्ध, 1965 और 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग, श्रीलंका में एलटीटीई के खिलाफ अभियान, पंजाब के उग्रवाद, नक्सल विरोधी अभियानों, कारगिल युद्ध और हाल के ऑपरेशन सिंदूर तक अलग-अलग दौर में देश की सुरक्षा में जवान दिए हैं।

देश के लिए अब तक काजी बसई गांव के 11 जवानों ने शहादत दी है। इनमें 9 मुस्लिम और 2 हिंदू हैं, लेकिन काजी बसई की कहानी सिर्फ युद्धों की सूची नहीं है। यह उस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती परंपरा की कहानी है, जिसमें फौज में जाना नौकरी नहीं, बल्कि परिवार और गांव की जिम्मेदारी माना जाता है। इस रिपोर्ट में पढ़िए देश भक्त गांव की कहानी…

काजी बसई गांव में 11 शहीदों के नाम लिखे गए हैं।

काजी बसई गांव में 11 शहीदों के नाम लिखे गए हैं।

आजादी मिली, लेकिन पहरा कभी खत्म नहीं हुआ

15 अगस्त आते ही देश में आजादी की कहानियां दोहराई जाती हैं। काजी बसई में आजादी की कहानी कुछ अलग तरह से सुनाई देती है। यहां बुजुर्ग अपने बच्चों को बताते हैं कि देश आजाद होने से पहले उनके पूर्वज विदेशी हुकूमत के दौर के युद्धों में गए। आजादी के बाद की पीढ़ियों ने उसी धरती की रक्षा के लिए हथियार उठाए, जिसे देश ने अपने दम पर संभाला।

पूर्व सैनिक हाजी मोहम्मद रफी बताते हैं कि काजी बसई का सैन्य इतिहास काफी पुराना है। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गांव के अब्दुल वासिद सिंधिया स्टेट की सेना में भर्ती हुए थे। युद्ध के दौरान जर्मनी में उनकी शहादत हुई। बताया जाता है कि उनकी शहादत की स्मृति आज भी जर्मनी में मौजूद है।

दूसरे विश्व युद्ध में भी गांव के करीब 16 लोग अंग्रेजों की तरफ से युद्ध में शामिल हुए। इनमें हाजी अलीमुद्दीन, इस्लामुद्दीन, अब्दुल अली, नूर मोहम्मद, मोहम्मद वली, हकीमदीन खान, क्वार्टर मास्टर हकीमुल्ला, हाजी अर्जुद्दीन, मोहम्मद इब्राहिम और अब्दुल गनी सहित कई जवान शामिल थे। युद्ध खत्म होने के बाद ये जवान गांव लौट आए।

काजी बसई गांव, जहां पर अधिकांश घरों से लोग फौज में हैं।

काजी बसई गांव, जहां पर अधिकांश घरों से लोग फौज में हैं।

1965 और 1971 की जंग खुद लड़ी, आज भी यादें ताजा

हाजी मोहम्मद रफी बताते हैं- वे खुद 1965 और 1971 के युद्ध में शामिल रहे। उम्र के इस पड़ाव पर भी युद्ध की यादें उनके चेहरे पर साफ दिखाई देती हैं। पाकिस्तान के साथ 1965 और 1971 की जंग मैंने खुद लड़ी है। 1962 के चीन युद्ध और कारगिल की लड़ाई में भी गांव के जवान शामिल रहे।

उनके मुताबिक काजी बसई के जवान सिर्फ सीमा पर होने वाली जंगों तक सीमित नहीं रहे। श्रीलंका में एलटीटीई के खिलाफ अभियान, पंजाब में उग्रवाद और नक्सल प्रभावित इलाकों में भी गांव के जवानों ने ड्यूटी की।

यानी आजादी के बाद देश के सामने सुरक्षा की जो भी नई चुनौती आई, काजी बसई के घर से किसी न किसी ने मोर्चे की तरफ कदम बढ़ाया।

फौज के किस्से सुनाते हुए पूर्व सैनिक।

फौज के किस्से सुनाते हुए पूर्व सैनिक।

एक ट्रांसफर ने बचाई जिंदगी, लेकिन साथी नहीं बच सके

रिटायर्ड सीआरपीएफ जवान मोहम्मद जफर की कहानी काजी बसई के सैनिक परिवारों के दर्द को सामने लाती है। जफर बताते हैं कि उनके परिवार की चार पीढ़ियां सुरक्षा बलों में रही हैं। दादा सेना में थे, पिता भी सेना में गए, इसके बाद वे सीआरपीएफ में भर्ती हुए और अब उनका बेटा भी सेना में है।

पंजाब में आतंकवाद के दौर में उनकी तैनाती पटियाला, तरनतारन और अमृतसर में रही। वे बताते हैं कि उस समय हर दिन अनिश्चितता के बीच गुजरता था। एक घटना बताते हुए जफर भावुक हो जाते हैं। वे 75वीं बटालियन सीआरपीएफ में तैनात थे।

उनका ट्रांसफर दूसरी बटालियन में हो गया और वे चंडीगढ़ चले गए। उनके जाने के तीन दिन बाद उनकी पुरानी बटालियन के जवानों पर बस में हमला हुआ और उनके कई साथी मारे गए।

वे कहते हैं, "मैं सिर्फ ट्रांसफर होने के कारण बच गया।"

मोहम्मद जफर बताते हैं- उनकी जिंदगी में शहादत की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उनके भाई का बेटा भी करीब दो साल पहले कश्मीर में ड्यूटी के दौरान शहीद हो गया। अगर डर होता तो परिवार वाले हमें रोक लेते। गांव में सेना सिर्फ नौकरी नहीं, परंपरा बन गई है।

चार पीढ़ियों से वर्दी, अब बेटे भी उसी रास्ते पर

काजी बसई के रिटायर्ड सीआरपीएफ एसआई मोहम्मद शफीक भी चार पीढ़ियों की देशसेवा की कहानी बताते हैं। उनके दादा और पिता सुरक्षा बल में रहे। वे 1984 में सीआरपीएफ में भर्ती हुए और 1987 में श्रीलंका में भारत की ओर से चलाए गए शांति अभियान के दौरान तैनात रहे।

दो साल श्रीलंका में ड्यूटी करने के बाद वे भारत लौटे। बाद में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी सेवा दी। अब जिस छत्तीसगढ़ में वे कभी नक्सल विरोधी अभियान में ड्यूटी कर चुके हैं, उसी क्षेत्र में उनका बेटा देश की सेवा कर रहा है। शफीक के लिए यह सिर्फ परिवार की उपलब्धि नहीं, बल्कि गांव की परंपरा का हिस्सा है।

1971 की जंग में कलकत्ता तक पहुंची थी बटालियन

रिटायर्ड एसएएफ जवान मोहम्मद नाजिम 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद सुनाते हैं। वे बताते हैं कि उनकी बटालियन को इंदौर से कलकत्ता तक ले जाया गया था। सुबह उन्हें विमान से आगे भेजे जाने की तैयारी थी, लेकिन उसी दौरान पाकिस्तान ने हथियार डाल दिए और युद्ध खत्म हो गया।

इसके बाद उनकी बटालियन को असम में तैनात कर दिया गया। नाजिम बताते हैं कि उनके परिवार की कई पीढ़ियां आज भी सुरक्षा बलों में हैं। युद्ध भले खत्म हो गया, लेकिन काजी बसई के परिवारों का देश की सीमाओं पर पहरा खत्म नहीं हुआ।

'फौज में जाति-धर्म नहीं, सिर्फ तिरंगा होता है'

बीएसएफ में एसआई पद से रिटायर्ड अब्दुल महफूज अब्बासी हाल ही में गांव लौटे हैं। वे ऑपरेशन सिंदूर का हिस्सा रहे हैं। आजादी और देशसेवा को लेकर वे कहते हैं कि सेना में जाति और धर्म की पहचान पीछे छूट जाती है।

वे बताते हैं कि- फौज में कोई जाति-धर्म नहीं होता। वहां सिर्फ देशसेवा सबसे बड़ा धर्म है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दिमाग में सिर्फ तिरंगा और भारत माता थी। अब्बासी की चिंता शहीद परिवारों को लेकर भी है।

उनका कहना है कि सरकार को उन परिवारों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जिन्होंने देश की रक्षा में अपने बेटे खोए हैं। उनकी बात में गांव की सामूहिक भावना दिखाई देती है- यहां फौज में जाने के लिए किसी को मनाना नहीं पड़ता, क्योंकि कई परिवारों में सेना की वर्दी विरासत की तरह आगे बढ़ती है।

गांव से पांच किलोमीटर दूर था स्कूल, रोज दौड़कर जाते थे बच्चे

काजी बसई की सैन्य परंपरा के पीछे सिर्फ जज्बा नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में तैयार हुई शारीरिक क्षमता भी है। रिटायर्ड प्राचार्य मोहम्मद हबीब बताते हैं कि एक समय गांव से स्कूल करीब पांच किलोमीटर दूर था। उस दौर में न साधन थे और न हर घर में साइकिल। बच्चे रोज पांच किलोमीटर पैदल या दौड़ते हुए स्कूल जाते और लौटते थे।

वे कहते हैं- हमारे लोगों का फिजिकल यूं ही हो जाता था। कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई सेना का फिजिकल देने गया हो और अंदर से लौट आया हो। आज भी गांव की करीब 90 प्रतिशत आबादी सुरक्षा बलों में जाने वाली पीढ़ी से जुड़ी हुई है और युवा भर्ती की तैयारी करते हैं।

11 शहादतें, लेकिन वर्दी से मोह कम नहीं हुआ

काजी बसई की सबसे बड़ी कहानी इसके 11 शहीद जवान हैं। हर शहादत एक परिवार के लिए ऐसा खालीपन छोड़ गई, जिसे कोई सम्मान या मुआवजा पूरी तरह नहीं भर सकता।

यहां एक परिवार का बेटा शहीद होता है तो अगली पीढ़ी में कोई दूसरा बच्चा सेना की तैयारी शुरू कर देता है। किसी के पिता वर्दी पहनते हैं तो बेटा उसी वर्दी को अपना भविष्य मानता है।

यही वजह है कि काजी बसई में फौज एक पेशा नहीं लगती- यह गांव की सामाजिक स्मृति और सामूहिक पहचान बन चुकी है।