Sep 12, 2026 06:54 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान

गरीबी और तानों को मात देकर श्वेता अग्रवाल ने लगातार तीन बार यूपीएससी परीक्षा पास की और आईएएस अफसर बनकर देश भर के युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल बनीं।

आईएएस श्वेता अग्रवाल
कभी-कभी किस्मत से ज्यादा आपके हौसले इस बात का फैसला करते हैं कि आप जिंदगी में कहां तक जाएंगे। जरा सोचिए एक बच्ची जिसके पैदा होने पर घर के ही बुजुर्गों ने खुश होने के बजाय माता-पिता से कहा हो कि 'या तो लड़का पैदा करो या फिर किसी लड़के को गोद ले लो, क्योंकि खानदान का नाम तो लड़के ही आगे बढ़ाते हैं'। उसी लड़की ने जब कामयाबी की उड़ान भरी, तो पूरे देश में उसका नाम गूंज उठा। हम बात कर रहे हैं श्वेता अग्रवाल की, जिन्होंने समाज के तीखे तानों और गरीबी की मोटी जंजीरों को तोड़कर देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी (UPSC) को एक नहीं, बल्कि लगातार तीन बार पास किया। एक बेहद शानदार और रोंगटे खड़े कर देने वाली श्वेता की यह कहानी हर उस युवा के लिए एक जीती-जागती मिसाल है, जो अपने हालातों से हार मान लेता है। आइए तफसील से जानते हैं भद्रेश्वर के छोटे से कस्बे से निकलकर आईएएस अफसर बनने तक के उनके इस हैरतअंगेज सफर को।
बचपन की बंदिशें के बाद खूब किया संघर्ष
श्वेता की कहानी पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक बेहद छोटे और शांत कस्बे भद्रेश्वर से शुरू होती है। उनका जन्म एक रूढ़िवादी मारवाड़ी परिवार में हुआ था। परिवार में 25-30 लोग थे, लेकिन लड़कियों की पढ़ाई को लेकर किसी की सोच बहुत आगे नहीं थी। अमूमन लड़कियों की शादी 18-19 साल की उम्र में कर दी जाती थी। लेकिन श्वेता के माता-पिता ने ठान लिया था कि वे अपनी बेटी को बेहतरीन अंग्रेजी शिक्षा देंगे।
इसके लिए उनके पिता ने कई छोटे-मोटे काम किए। कभी परचून की दुकान तो कभी कुछ और लेकिन जब कोई काम नहीं चला तो उन्होंने दिहाड़ी मजदूर तक का काम किया। एक वक्त ऐसा भी था जब उनके पिता दिन भर में सिर्फ 10 रुपये कमाते थे, ताकि उसमें से 5-6 रुपये बचाकर श्वेता की 165 रुपये महीने की स्कूल फीस भरी जा सके। श्वेता भी बचपन से ही बेहद समझदार थीं। रिश्तेदारों से मिलने वाले शगुन के पैसों की वह कभी चॉकलेट नहीं खाती थीं, बल्कि वो पैसे अपनी मां को लाकर दे देती थीं ताकि स्कूल की फीस जमा हो सके। सात-आठ साल की उम्र में ही उन्हें यह समझ आ गया था कि सिर्फ मन लगाकर पढ़ाई करना ही वह इकलौता जरिया है, जिससे वह अपने माता-पिता के संघर्ष को सार्थक बना सकती हैं।
डेलॉयट की शानदार नौकरी तक
स्कूली पढ़ाई के बाद जब कॉलेज जाने का वक्त आया तो श्वेता को मशहूर सेंट जेवियर्स कॉलेज में दाखिला मिल गया। उनके खानदान में किसी ने भी ग्रेजुएशन नहीं किया था। ऐसे में ताने मिलने लाजमी थे। एक रिश्तेदार ने यहां तक कह दिया, "पढ़-लिखकर आखिर क्या करना है? अंत में तो चौका-बर्तन ही करना है।" लेकिन श्वेता ने इन बातों को दिल पर लेने के बजाय अपनी मेहनत को हथियार बनाया। उन्होंने 2008 में इकोनॉमिक्स में फर्स्ट क्लास से ग्रेजुएशन किया और परिवार की पहली ग्रेजुएट बनीं। इसके बाद उन्होंने एमबीए पूरा किया और दुनिया की जानी-मानी मल्टीनेशनल कंपनी डेलॉयट में शानदार नौकरी हासिल कर ली। लेकिन उनकी मंजिल ये कॉर्पोरेट दफ्तर कतई नहीं था।
डीएम बनने की जिद
बचपन में घर के पास एक पुलिस स्टेशन था जहां खाकी वर्दी देखकर श्वेता काफी आकर्षित होती थीं। वहीं 17 साल की उम्र में एक सरकारी दफ्तर में जब उन्हें अपने एक छोटे से काम के लिए घंटों दर-दर भटकना पड़ा तो गुस्से में उन्होंने वहां के कर्मचारियों से बांग्ला में कहा था, "ऐक दिन आमी डीएम होया एशबो। (एक दिन मैं डीएम बनकर आऊंगी)।"
डेलॉयट में काम करते हुए उन्हें अपना यही सपना बार-बार पुकार रहा था। आखिरकार, उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया और अपनी अच्छी-खासी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। जब उनके मैनेजर ने उन्हें समझाया कि यूपीएससी में हर साल 5 लाख लोग बैठते हैं और सिर्फ 90 आईएएस बनते हैं, तो श्वेता का आत्मविश्वास देखने लायक था। उन्होंने तपाक से कहा, "अगर 90 लोग बनते हैं, तो मैं उन 90 में से एक होऊंगी।" नौकरी छोड़ने के बाद श्वेता ने जमकर तैयारी शुरू की। कोलकाता में एक छोटा सा किराए का कमरा लिया और वहीं डट गईं। खुद खाना बनाना, घर के काम करना और पढ़ाई में जुटे रहना, यही उनकी जिंदगी बन गई। इस दौरान समाज फिर उंगली उठाने लगा कि लड़की 24-25 साल की हो गई है, इसकी शादी क्यों नहीं कर देते। श्वेता कई बार मानसिक रूप से टूट भी जाती थीं लेकिन उनके माता-पिता ने उन पर हमेशा अटूट भरोसा जताया।
लगातार तीन क्रैक की यूपीएससी
2013 में जब यूपीएससी का सिलेबस बदला तब भी श्वेता घबराई नहीं। उन्होंने अपनी पहली परीक्षा दी और 497वीं रैंक के साथ इंडियन रेवेन्यू सर्विस (आईआरएस) में जगह बनाई। लेकिन उनकी भूख अभी शांत नहीं हुई थी। नौकरी के साथ फिर से तैयारी करना आसान नहीं होता, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 2015 में उन्होंने दोबारा परीक्षा दी और इस बार 141वीं रैंक के साथ आईपीएस का पद हासिल किया। खाकी वर्दी का उनका बचपन का सपना पूरा हो चुका था। पर दिल के किसी कोने में वो 17 साल वाली लड़की अभी भी डीएम बनने की जिद पाले बैठी थी। अपने इस भीतरी आवाज को शांत करने के लिए उन्होंने 2016 में अपना आखिरी दांव खेला। इस बार जो हुआ वो इतिहास था। श्वेता ने पूरे देश में 19वीं रैंक हासिल की और पश्चिम बंगाल की टॉपर बनीं।
लेखक के बारे में
Himanshu Tiwari
शॉर्ट बायो: हिमांशु तिवारी पिछले 10 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और मौजूदा वक्त में लाइव हिन्दुस्तान के करियर टीम से जुड़े हुए हैं।
परिचय एवं अनुभव
हिमांशु तिवारी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। बीते 10 सालों से वह लगातार पत्रकारिता में सक्रिय हैं और इस वक्त लाइव हिन्दुस्तान में चीफ सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और बीते 3 साल से वह इस संस्थान से जुड़े हैं। शिक्षा, करियर, नौकरियों, नीट, जेईई, बैंकिंग, एसएससी और यूपीएससी, यूपीपीएससी, बीपीएससी और आरपीएससी जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर उनकी खास पकड़ मानी जाती है। हिमांशु ने साल 2016 में पत्रकारिता की शुरुआत एबीपी न्यूज के डिजिटल प्लेटफॉर्म से किया। इसके बाद वह इंडिया टीवी और जी न्यूज (डीएनए) जैसे बड़े न्यूज चैनलों के डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी हिस्सा रह चुके हैं। हिमांशु तिवारी सिर्फ पत्रकार नहीं, बल्कि एक सजग पाठक और आजीवन विद्यार्थी हैं, उनकी यही खूबी उनके कार्य में परिलक्षित होती है। उनका मानना है कि इन परीक्षाओं से जुड़ी सही और समय पर जानकारी लाखों युवाओं के भविष्य को दिशा दे सकती है, इसलिए वह इस बीट को सिर्फ खबर नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखते हैं।
लेखन की सोच और मकसद
हिमांशु के लिए पत्रकारिता का मतलब सिर्फ सूचना देना नहीं है, बल्कि पाठक को सोचने की जगह देना भी है। खासकर करियर और शिक्षा के क्षेत्र में वह यह मानते हैं कि एक गलत या अधूरी खबर किसी छात्र की पूरी तैयारी को भटका सकती है। इसलिए उनके लेखन में सरल भाषा, ठोस तथ्य और व्यावहारिक नजरिया हमेशा प्राथमिकता में रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि पाठक को सिर्फ खबर की जानकारी ही न हो, बल्कि यह भी समझ आए कि उस खबर का उसके जीवन और भविष्य से क्या रिश्ता है।
शिक्षा और अकादमिक पृष्ठभूमि
हिमांशु मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता के गुर सीखे। जामिया में मिली ट्रेनिंग ने उन्हें यह समझ दी कि पत्रकारिता सिर्फ तेज खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच, संदर्भ की समझ और संतुलित नजरिए से बात रखने की कला है।
रुचियां और निजी झुकाव
काम से इतर हिमांशु की गहरी रुचि समकालीन इतिहास, समानांतर सिनेमा और दर्शन में रही है। राजनीति और विदेश नीति पर पढ़ना-लिखना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। इसी रुचि के चलते उन्होंने दो लोकसभा चुनावों और दर्जनों विधानसभा चुनावों की कवरेज की, जहां राजनीति को उन्होंने बेहद नजदीक से देखा और समझा। चुनावी आंकड़ों की बारीकियां, नेताओं के भाषण, जमीनी मुद्दे और जनता की प्रतिक्रियाएं, इन सभी पहलुओं को समेटते हुए उन्होंने सैकड़ों खबरें और विश्लेषण तैयार किए, जो राजनीतिक प्रक्रिया की गहरी समझ को दर्शाते हैं।
विशेषज्ञताएं
- शिक्षा, करियर और नौकरियों से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि और निरंतर लेखन
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- UPSC, UPPSC, MPPSC, BPSC, RPSC और JPSC जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी, पैटर्न और नीतिगत पहलुओं पर पैनी नजर
- अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और विदेश नीति से जुड़े विषयों का विश्लेषणात्मक लेखन
- राजनीति, चुनावी आंकड़ों और जमीनी मुद्दों पर सरल और तथ्यपरक एक्सप्लेनर तैयार करने का अनुभव