UP Rajya Sabha Election 2026: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव सियासी हलचल की वजह बन गया है. 16 अक्टूबर को होने वाले इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपनी तरफ से पत्ते खोलते हुए दो उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर दिए हैं, जबकि भाजपा खेमे में अभी तक खामोशी बनी हुई है.
सपा ने किसे मैदान में उतारा है?
समाजवादी पार्टी ने वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को अपना उम्मीदवार बनाया है और दोनों का नामांकन भी करा दिया गया है. पार्टी का यह कदम साफ दिखाता है कि वह इस चुनाव को लेकर पहले से पूरी तरह तैयार बैठी है.
Rajya Sabha Election 2026: Ram Gopal Yadav और Dhanraj Nathwani ने भरा नामांकन, तीसरे नाम पर Suspense pic.twitter.com/bW4sZ1AGIw
— News State UP & UK (@NewsStateUPUK) September 30, 2026
भाजपा अभी तक चुप क्यों है?
भाजपा की तरफ से अब तक अपने उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. सूत्रों के मुताबिक पार्टी के भीतर इस पर गहन मंथन चल रहा है और करीब 20 नामों पर विचार किया जा रहा है जिनमें से आखिरकार सिर्फ आठ चेहरों को ही मौका मिलना है.
एक सीट जीतने के लिए कितने वोट चाहिए?
यूपी विधानसभा की मौजूदा प्रभावी सदस्य संख्या 397 है. इस हिसाब से राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 37 प्रथम वरीयता वोट चाहिए. अगर सीधा गणित लगाया जाए तो 9 सीटों के लिए 333 वोटों की जरूरत पड़ती है और बचे हुए वोट ही 10वीं सीट के लिए पूरा खेल दिलचस्प बना देते हैं.
भाजपा-NDA का वोट गणित क्या कहता है?
भाजपा के पास फिलहाल विधानसभा में 256 विधायक हैं. इसके अलावा सहयोगी दलों में अपना दल (एस) के 13, रालोद के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक शामिल हैं. इस तरह NDA के मुख्य घटक दलों का कुल आंकड़ा 289 तक पहुंच जाता है. 37 वोट प्रति सीट के हिसाब से 7 सीटों के लिए 259 वोट चाहिए, यानी मौजूदा संख्या बल के आधार पर भाजपा-NDA के लिए सात सीटें लगभग तय मानी जा रही हैं. आठवीं सीट के लिए पार्टी को अतिरिक्त वोटों का जुगाड़ करना होगा.
सपा के दो उम्मीदवारों के पीछे कितनी ताकत है?
समाजवादी पार्टी के पास विधानसभा में 101 विधायक हैं और कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन मिलने पर यह आंकड़ा 103 तक पहुंच सकता है. दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए 74 वोट चाहिए जो सपा के पास आराम से मौजूद हैं. यही वजह है कि पार्टी ने बिना किसी हिचक के अपने दो नाम पहले ही सामने रख दिए.
क्या सपा तीसरा उम्मीदवार भी उतार सकती है?
फिलहाल इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है लेकिन कुछ रिपोर्टों में तीसरे उम्मीदवार की संभावना जताई जा रही है. इसके लिए पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी जैसे नामों की चर्चा राजनीतिक गलियारों में चल रही है. अगर सपा वाकई तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो पूरे चुनाव का नंबर गेम पूरी तरह बदल सकता है.
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तो आखिर 10वीं सीट पर इतनी नजरें क्यों टिकी हैं?
मौजूदा संख्या बल के हिसाब से सात सीटें भाजपा-NDA और दो सीटें सपा के खाते में जाती दिख रही हैं. इसके बाद बची हुई एक सीट के लिए अतिरिक्त वोटों का समीकरण बनता है और यही वह मोड़ है जहां असली सियासी हलचल देखने को मिल सकती है. यहां प्रथम वरीयता वोटों का बंटवारा, सहयोगी दलों का रुख और किसी संभावित क्रॉस-वोटिंग का असर, सब कुछ मायने रखेगा.
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भाजपा नाम तय करने में इतना वक्त क्यों ले रही है?
पार्टी की तरफ से इसकी कोई आधिकारिक वजह अब तक नहीं बताई गई है. लेकिन सूत्रों के मुताबिक उम्मीदवारों के चयन में जातीय, क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन को लेकर गहन विचार-विमर्श चल रहा है. चूंकि अगले साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए यह चयन सिर्फ संसद भेजने भर का मामला नहीं रह गया बल्कि आने वाले चुनाव के लिए सामाजिक समीकरण साधने की बड़ी कवायद भी बन गया है.
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