दुनिया भर में मौसम के पैटर्न एक बार फिर बड़े खतरे का संकेत दे रहे हैं। प्रशांत महासागर में एक बेहद खतरनाक 'अल नीनो' बन रहा है, जिसके 2026 के आखिर तक रिकॉर्ड-तोड़ स्तर पर पहुंचने की 90% से ज़्यादा संभावना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह सिर्फ़ लू (heatwave) या सूखा नहीं है; यह पिछले 70 सालों में जलवायु से जुड़ी सबसे विनाशकारी आपातकालीन स्थिति साबित हो सकती है। अमेरिकी मौसम एजेंसियों ने भी इस "सुपर अल नीनो" के बारे में गंभीर चेतावनी जारी की है।
अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) की एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि पिछले महीने पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान तेज़ी से बढ़ा है। भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र के कुछ हिस्सों में, समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2°C से ज़्यादा दर्ज किया गया है। इसके अलावा, समुद्र की गहराई में गर्म पानी की परतें बन गई हैं, जो भविष्य के लिए इस पैटर्न को और मज़बूत करती हैं।
**दुनिया भर में असर पहले से ही दिख रहा है**
प्रशांत महासागर के आसपास मौसम के पैटर्न में इस बदलाव के संकेत पहले से ही दिखाई दे रहे हैं:
मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्रों में बारिश की गतिविधियों में काफ़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इंडोनेशिया और आसपास के इलाकों में सामान्य से बहुत कम बारिश हो रही है और वहां सूखे जैसे हालात बन रहे हैं।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (tropics) में हवा के पैटर्न में बदलाव साफ़ तौर पर अल नीनो के मज़बूत होने का संकेत देते हैं।
**1950 के बाद के रिकॉर्ड टूटने की संभावना**
जलवायु मॉडल का अनुमान है कि यह स्थिति 2026 के आखिर और 2027 की शुरुआत तक बनी रहेगी। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अल नीनो के और तेज़ होने की 69% संभावना है। अगर ऐसा होता है, तो यह 1950 में आधुनिक ट्रैकिंग शुरू होने के बाद से दर्ज की गई सबसे गंभीर अल नीनो घटनाओं में से एक हो सकती है।
**भारत के लिए यह राहत और चिंता, दोनों क्यों है?**
अल नीनो की घटनाओं से आमतौर पर कम बारिश, सूखा और रिकॉर्ड-तोड़ गर्मी होती है। हालाँकि, भारत के लिए इसका असर अलग तरह से और कुछ समय के अंतराल के बाद दिख सकता है। IMD का कहना है कि अभी दक्षिण-पश्चिम मॉनसून पर अल नीनो का कोई सीधा असर नहीं है। प्रशांत महासागर में शुरू होने वाली इस मौसमी घटना का असर भारत और हिंद महासागर तक पहुँचने में लगभग 40 से 45 दिन लग सकते हैं। जब तक अल नीनो का सबसे ज़्यादा असर भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँचेगा, तब तक मॉनसून का मौसम 30 सितंबर की अपनी तय वापसी की तारीख के करीब आ चुका होगा।
इस साल बारिश कैसी रही है?
हालांकि अल नीनो का सीधा असर देर से दिख सकता है, लेकिन इस साल भारत में मॉनसून की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। 1 जून से 13 अगस्त के बीच, देश में सामान्य से 12% कम बारिश हुई। जहाँ जून में बारिश में 35.4% की भारी कमी देखी गई, वहीं जुलाई में बारिश का स्तर सामान्य के करीब रहा, जिससे कुछ राहत मिली। IMD ने अगस्त और मॉनसून के बाकी समय के लिए सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया है।
अल नीनो क्या है?
अल नीनो एक प्राकृतिक घटना है जो तब होती है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह दुनिया भर के मौसम के पैटर्न पर सीधा असर डालता है, जिससे मॉनसून, सूखा, भीषण गर्मी और तूफ़ान प्रभावित होते हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि एक मज़बूत अल नीनो का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता; इसके प्रभाव खास देशों और इलाकों की स्थानीय स्थितियों पर निर्भर करते हैं। मौसम वैज्ञानिक लगातार स्थिति पर नज़र रखे हुए हैं और सितंबर में अपडेटेड डेटा जारी होने की उम्मीद है।