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- Edited by: नितिन अरोड़ा
- Updated Jul 13, 2026, 02:48 PM IST
Mohan Bhagwat DNA Statement: बाबा रामदेव के 'हिंदू राष्ट्र' वाले बयान पर सियासी घमासान। मोहन भागवत, योगी आदित्यनाथ से लेकर ओवैसी तक... जानिए 'साझा DNA' और हिंदू राष्ट्र की बहस के मायने और संवैधानिक पहलू।
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बाबा रामदेव के बयान से फिर 'हिंदू राष्ट्र' बनाम 'साझा DNA' पर बहस हुई शुरू; भागवत, योगी और ओवैसी के बयानों का पूरा गणित समझें
Baba Ramdev Hindu Rashtra Statement: देश में 'हिंदू राष्ट्र' और 'साझा DNA' को लेकर एक बार फिर सियासी और वैचारिक घमासान छिड़ गया है। इस ताजा विवाद के केंद्र में हैं योग गुरु बाबा रामदेव, जिन्होंने हरिद्वार में देवबंद के संदर्भ में एक ऐसा बयान दिया, जिस पर विपक्षी दलों और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
बाबा रामदेव ने कहा है कि 'हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हिंदुस्तान में मुसलमानों या ईसाइयों के लिए कोई खतरा नहीं है।' इस बयान के बाद कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और शिया धर्मगुरु सैफ अब्बास ने पलटवार करते हुए देश को केवल संविधान के दायरे में चलाने की बात कही है।
लेकिन यह बहस नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जैसे दिग्गज इस 'DNA' और 'हिंदू राष्ट्र' के विमर्श पर अपनी-अपनी दलीलें पेश कर चुके हैं।
आइए इस विस्तृत एक्सप्लेनर में समझते हैं कि यह पूरी बहस क्या है, बड़े नेताओं का इस पर क्या रुख रहा है और हमारा संविधान इस विषय पर क्या कहता है।
बाबा रामदेव: 'दाढ़ी रखें या कटवाएं, पूर्वज तो सनातनी थे'
हरिद्वार में अपने संबोधन के दौरान बाबा रामदेव ने साल 2009 के एक वाकये का जिक्र करते हुए कहा, 'धर्म भले ही अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारे पूर्वज एक ही हैं। हम सभी के पूर्वज सनातनी हिंदू, आर्य और वैदिक थे। कुछ लोग पूछते हैं कि अगर हिंदू राष्ट्र बन गया, तो मुस्लिम कहां जाएंगे? उन्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, बस अपने पूर्वजों की परंपराओं को अपना लीजिए। आप दाढ़ी रखें या कटवा लें, अपनी पसंद की कोई भी पोशाक पहनें, लेकिन अपना चरित्र अपने पूर्वजों जैसा रखें।'
विपक्ष और धर्मगुरुओं ने क्या कहा?
वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा, 'मैं भारत के संविधान में विश्वास रखता हूं। अगर हर कोई सनातनी था, तो फिर यहां इस तरह की दरारें पैदा करने की कोशिशें क्यों की जा रही हैं? हमारी सोच वही है जो संविधान कहता है। संविधान हर नागरिक की सोच और उसके धर्म की रक्षा करता है।'
शिया धर्मगुरु सैफ अब्बास ने कहा, 'मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी से नहीं डरता। हमारे लिए यह देश बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के बनाए गए संविधान के तहत काम करता है। बहुसंख्यक आबादी होने के बावजूद यह दावा करना कि 'हिंदू खतरे में हैं', पूरी तरह से हास्यास्पद है और असली मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला है।'
कब-कब छिड़ा 'साझा DNA' और 'हिंदू राष्ट्र' पर घमासान?
भारत की सियासत में पिछले एक दशक के भीतर इस वैचारिक मुद्दे पर कई बड़े बयान सामने आए हैं:
-अक्टूबर 2014: सुब्रह्मण्यम स्वामी (भाजपा नेता): उन्होंने सबसे पहले बड़े मंच से यह तर्क दिया था कि भारत के हिंदुओं और मुसलमानों का DNA एक ही है, क्योंकि दोनों के पूर्वज इसी मिट्टी और देश से जुड़े हैं।
-4 जुलाई 2021: मोहन भागवत (RSS प्रमुख): दिल्ली में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम में उन्होंने कहा, 'सभी भारतीयों का DNA एक है। पूजा-पद्धति या धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारे पूर्वज समान हैं।'
-5 जुलाई 2021: असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM प्रमुख) का पलटवार: भागवत के बयान के ठीक अगले दिन ओवैसी ने तीखा हमला करते हुए कहा था, 'अगर सभी भारतीय एक हैं और सबका DNA समान है, तो फिर जमीन पर मॉब लिंचिंग, नफरत और धार्मिक हिंसा जैसी घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं होती? संघ के बयान और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है।'
-15 नवंबर 2022: मोहन भागवत: उन्होंने एक बार फिर दोहराया कि भारत में रहने वाले सभी लोगों के पूर्वज समान हैं और हजारों वर्षों से हमारा DNA एक ही है, इसलिए समाज में आपसी संवाद और सद्भाव बढ़ना चाहिए।
-अगस्त 2025: मोहन भागवत: 'अखंड भारत' की अवधारणा को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा था कि 'अखंड भारत के दायरे में आने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं।' इस बयान को आलोचकों ने धार्मिक राष्ट्रवाद से जोड़ा था।
9 जून 2026: योगी आदित्यनाथ (CM, उत्तर प्रदेश): यूपी के मुख्यमंत्री ने एक नया आयाम जोड़ते हुए कहा था, 'जिनका DNA वास्तव में भारतीय है, उन्हें भगवान राम से स्वाभाविक प्रेम है।' विपक्ष ने इस बयान की आलोचना इसे धार्मिक पहचान से जोड़ने के कारण की थी।

'DNA' शब्द का मतलब कोई वैज्ञानिक, जैविक (Biological) या मेडिकल टेस्ट से नहीं
वैचारिक विमर्श में 'DNA' शब्द का असली मायने क्या है?
जब संघ (RSS) या भाजपा के नेता 'DNA' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका मतलब कोई वैज्ञानिक, जैविक (Biological) या मेडिकल टेस्ट नहीं होता।
राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श में 'DNA' का उपयोग साझा पूर्वज, ऐतिहासिक मूल और एक समान सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) को दर्शाने के लिए एक प्रतीक के रूप में किया जाता है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना होता है कि भारत के अल्पसंख्यकों (मुस्लिम-ईसाई) का धर्म भले ही बदल गया हो, लेकिन उनकी राष्ट्रीय और ऐतिहासिक जड़ें हिंदुओं के समान ही हैं।
'हिंदू राष्ट्र' की अवधारणा पर दो अलग-अलग दृष्टिकोण
1. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का दृष्टिकोण
संघ लंबे समय से 'हिंदू' शब्द को किसी उपासना पद्धति (Religions) के रूप में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत और सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। संघ का तर्क है कि 'हिंदू राष्ट्र' का मतलब कोई धार्मिक राज्य नहीं है, बल्कि यह इस उपमहाद्वीप की उस जीवनशैली और उदार संस्कृति का नाम है जो सबको साथ लेकर चलती है।
2. विपक्ष और आलोचकों का पक्ष
कांग्रेस, वामपंथी दल और क्षेत्रीय दलों (जैसे AIMIM, सपा) का मानना है कि 'हिंदू राष्ट्र' जैसे शब्दों का बार-बार इस्तेमाल भारत के बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के विमर्श से देश के अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है और यह बहुसंख्यकवाद को बढ़ावा देता है।
इस पूरी बहस पर हमारा संविधान क्या कहता है?
संवैधानिक और कानूनी नजरिए से भारत की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है:
धर्मनिरपेक्ष गणराज्य: भारत के संविधान की प्रस्तावना (Preamble) देश को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष (Secular) और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है।
समानता का अधिकार: संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष सभी को समानता देता है और अनुच्छेद 15 धर्म, जाति या लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
धार्मिक स्वतंत्रता: अनुच्छेद 25 से 28 के तहत देश के हर नागरिक को अपने विवेक के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।
बता दें कि 'साझा DNA' और 'हिंदू राष्ट्र' की यह बहस विचारधाराओं की टकराहट का हिस्सा है। एक तरफ जहां संघ इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और साझा विरासत के सूत्र में पिरोने का प्रयास मानते हैं; वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और धर्मगुरु इसे संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक विविधता के चश्मे से देखते हैं। यही कारण है कि जब भी बाबा रामदेव या मोहन भागवत जैसे चेहरे इस मुद्दे पर कुछ कहते हैं, तो देश में सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का तापमान तुरंत बढ़ जाता है।
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नितिन अरोड़ा author
नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदे... और देखें
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