Dev Anand 103rd Birth Anniversary: बॉलीवुड का इतिहास बहुत विस्तृत रहा है और कई बदलावों से होकर गुजरा है. लेकिन इस इतिहास से जुड़ी कई सुनहरी यादें हैं जो अपने आप में सुहाना सफर लिए हुए हैं. कोई सफर फिल्म का भी हो सकता है, कोई किसी गाने का तो कोई किसी के करियर का सफर. आज बात कर रहे बॉलीवुड के इस सुहाने सफर को और भी हसीन बनाने वाले सदाबहार अभिनेता और डायरेक्टर देव आनंद की. बहुत कम कलाकार ऐसे मुकाम तक पहुंच पाए जिन्हें बॉलीवुड के इतिहास में उनके दौर से याद रखा जाता है. जैसे दिलीप कुमार का एक दौर था तो देव आनंद का भी एक दौर था. वो दौर अपने में समेटे हुए है कई दशक. 5 दशक तक देव आनंद अलग-अलग अंदाज में पर्दे के पीछे भी सक्रिय रहे और आगे भी.
लेकिन देव आनंद उन कलाकारों में भी गिने जाते हैं जिन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई स्टीरियोटाइप तोड़े. उन्होंने सिनेमा में अपनी भूमिकाएं दीवानगी की हद तक निभाईं तो उन्हें इसके बदले में दीवानगी की हद तक प्यार और सम्मान भी मिला. ये दिल इतना बेचारा ना होता अगर देव आनंद ना होते. वो ज्वेल थीफ भी था और प्रेम पुजारी भी. वो बनारसी बाबू भी था और मनमौजी भी. वो गाइड भी था और गैम्बलर भी. एक ऐसा टैक्सी ड्राइवर जिसने रोमांस भी किया, ग्रे शेड के रोल्स भी और एक्शन भी. लेकिन देव आनंद को जो बात सबसे ज्यादा जुदा करती है वो ये है कि पर्दे पर उन्होंने एक चॉकलेटी हीरो की छवि बनाई वहीं पर्दे के पीछे से उनके विचारों की बेबाकी कुछ ज्यादा निखरकर आई. फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा को भला कौन भूल सकता है. पर्दे पर उनकी स्टाइल दिखती है और पर्दे के पीछे उनका जुनून. संपूर्ण रूप से वे एक एवरग्रीन कलाकार के तौर पर उभरकर सामने आते हैं. आइए जरा इतिहास में टहलकर आते हैं और 26 सितंबर 2026 को देव साहब की 103वीं बर्थ एनिवर्सरी पर उनके इस सुहाने सफर की यात्रा पर चलते हैं.
कैसे शुरू हुआ फिल्मी सफर?
देव आनंद को एक्टर बनने का शौक था. अपने इसी शौक को पूरा करने के लिए वे 30 रुपये लेकर मुंबई आए थे. वहां शुरुआती समय में गुजर-बसर के लिए उन्होंने मिलेट्री सेंसर ऑफिस में काम किया. बाद में इप्टा थियेटर से जुड़ गए. एक दफा उनकी मुलाकात प्रभात फिल्म्स के बाबूराव से हुई. उन्होंने देव साहब को डायरेक्टर पी एल संतोषी से मिलने के लिए कहा. देव आनंद ने फिल्म के लिए ऑडिशन दिया और उनका ऑडिशन काफी पसंद किया गया. इसके बाद उन्हें उनके करियर की पहली फिल्म हम एक हैं मिली.

जुदा स्टाइल से जवां दिलों पर किया राज
देव आनंद की पर्सनालिटी में एक चुंबकीय आकर्षण था. चाहें पुरुष हो या स्त्री, सभी उनके आकर्षित कर देने वाले व्यक्तित्व की ओर खिंचे चले आते थे. देव आनंद ने इस दौरान जिद्दी, जीत, दिलरुबा, बाजी, हमसफर, दो सितारे, टैक्सी ड्राइवर, सीआईडी, फनटूश, काला पानी, नौ दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, जब प्यार किसी से होता है, असली-नकली, तेरे घर के सामने और तीन देवियां जैसी फिल्मों में काम किया. इन फिल्मों में उनकी चॉकलेटी और रोमांटिक छवि ने सभी को इंप्रेस किया. उनका अंदाज खूब कॉपी किया जाता. लोग उनकी तरह बाल झाड़ते, उनकी तरह पहनावा इख्तियार करते और उनकी डायलॉग डिलीवरी कॉपी करने की कोशिश करते थे.
जुनून और पर्दे के पीछे का करामात
अपने दूसरे फेज में देव आनंद ने वक्त के साथ खुद को बदला. उनका अंदाज जरा और अलग नजर आया. जहां भंवरदार बाल थे वहां टोपी आ गई. चाल जरा सी और इठला गई और फिल्मों में रोल्स भी जरा पहले से ज्यादा मिस्चीवियस हो गए. इसमें गाइड फिल्म में उनका रोल जो आध्यात्मिक दृष्टिकोण लिए हुए है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. उस रोल को छोड़ दिया जाए तो एक्टर ने स्क्रीन पर अपनी वर्सेटाइल एक्टिंग दिखानी शुरू की. अब पर्दे पर सिर्फ रोमांस नहीं था. हसीनाओं के इर्द-गिर्द घूमते रहना नहीं था.

अब मामला ग्रे शेड का था. ज्वेल थीफ, प्रेम पुजारी, जॉनी मेरा नाम, गैम्बलर, हरे रामा हरे कृष्णा, बनारसी बाबू, छुपा रुस्तम, हीरा पन्ना, जोशीला, शरीफ बदमाश, अमीर गरीब, वॉरेंट, काला बाजार, लूटमार, डारलिंग डारलिंग, देस परदेस समेत कई फिल्में ऐसी थीं जिसमें उनके दो रूप निकलकर आते थे. वे भले भी रहते थे और बुरे भी. अंत में थे तो आखिर फिल्म के नायक ही. लेकिन उसमें कुछ खलनायकी भी घुली हुई रहती थी.
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उन्होंने इस फेज में बदलते दौर के साथ खुद को बदला. ये वो समय था जब उन्होंने निर्देशन में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया था और जमाने को देव साहब, वो दिखाते थे जो उनकी नजर में सिनेमा था. इस दौरान उनका जुनून चरम पर था. वे अपने तौर-तरीके की फिल्में बनाते थे. उसमें वे कोई कोताही नहीं करते थे. उसमें बोल्डनेस भी होती थी, एंटरटेनमेंट भी होता था और मैसेज भी होता था. वे फिल्म चलेगी या नहीं ये सोचकर मूवी नहीं बनाते थे. बल्कि वे फिल्म अपने शौक के लिए और दर्शकों के मनोरंजन के लिए बनाते थे. बॉक्स ऑफिस पर कभी तुक्का लग भी जाता था कभी नहीं भी लगता था. लेकिन वे बेफिक्र होकर फिल्में डायरेक्ट करते गए.
एवरग्रीन अंदाज रहा बरकरार
80s और 90s यहां तक कि उसके बाद भी उनकी सक्रियता बनी रही. ये वो दौर था जब उनके दौर के अभिनेता लगभग दिखना बंद हो गए थे. दिलीप कुमार भी बेहद कम फिल्में करते थे. राज कपूर कुछ एक्सपेरिमेंट डायरेक्शन में कर रहे थे लेकिन लीड रोल वाले अंदाज के बीच उम्र आड़े आ रही थी. ऐसा ही हाल शम्मी कपूर और राजेंद्र कुमार का भी था. लेकिन उस दौर में देव आनंद की सक्रियता ही उन्हें औरों से अलग और एवरग्रीन बनाती है. वे फिल्में डायरेक्ट भी कर रहे थे लीड रोल भी कर रहे थे. वे अपने अंदाज में सिनेमा को जी रहे थे. इस दौरान उन्होंने देस परदेस, लूटमार, स्वामि दादा, आनंद और आनंद, लश्कर, सौ करोड़, अव्वल नंबर, प्यार का तराना, गैंग्सटर, रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ, मैं सोलह बरस की, सेंसर, लव एट टाइम्स स्क्वायर, मिस्टर प्राइम मिनिस्टर और चार्जशीट जैसी फिल्में बनाईं.

सबसे बड़ी बात तो ये है जिस समय उनका इंतकाल हुआ उस समय वे लगभग 87 साल के थे और लगातार फिल्में बना रहे थे. उनकी कभी ना हार मानने वाली अदा भी उनके व्यक्तित्व का एक वर्णन था. उनकी सफर यही साबित करता है कि स्टाइल से उन्हें पॉपुलैरिटी मिली. जुनून से उन्हें एक शानदार करियर मिला और उनके एवरग्रीन अप्रोच ने उन्हें देश के टॉप आर्टिस्ट की लीग में लाकर खड़ा कर दिया. ऐसा फनकार भी सदी में एक बार आता है. जिसे देखकर ही खुद के अंदर का एक्टर जिंदा हो जाए. जिसे देखकर ही स्टाइल मारने का मन करे. जिसे देखकर ही एक जुनून एक जोशीला अंदाज मन में घर करने लगे. जिसे देखकर ही कुछ रोमांस और रूमानी लगने लगे. जिसे देखकर ही लगे कि ये है आवाम का एक्टर, जो जिंदगी का साथ निभाता चला गया और जिंदगी उसका साथ निभाती चली गई.

पुनीत उपाध्याय
पत्रकारिता जगत में 7 साल पूरे कर चुके पुनीत उपाध्याय रायबरेली से ताल्लुक रखते हैं. वे टीवी 9 के डिजिटल विंग में साल 2022 से सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं. कला, संगीत, सिनेमा, साहित्य पर लिखने का शौक रखते हैं. साथ ही इससे जुड़ी हर छोटी, बड़ी और रोचक खबरें पाठकों तक पहुंचाते हैं. इसके अलावा वे अन्य बीट्स में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पुनीत मानते हैं कि कला सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि उससे इतर अंतरमन से जुड़ने और समाज से रूबरू होने का एक सार्थक जरिया भी है. CSJM कानपुर युनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद पुनीत ने ITMI (इंडिया टुडे मीडिया इंस्टिट्यूट) से मास कॉम्युनिकेशन में पीजी डिप्लोमा का कोर्स किया है. पुनीत की पहली जॉब आज तक में थी जहां उन्होंने 4 साल सब एडिटर की पोस्ट पर काम किया और मनोरंजन बीट के लिए अपनी सेवाएं दीं. पुनीत की रुचि लिखने में है और वे कलम की धार से समाज में बदलाव लाने में विश्वास रखते हैं. इसके अलावा उनकी रुचि आध्यात्म, साहित्य, गायन, दर्शन, क्रिकेट और मनोविज्ञान में है.
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