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Bankipur Byepoll: प्रशांत किशोर की डायरेक्ट एंट्री से फंसा पेंच, BJP की साख, जातीय समीकरण और जीत का गणित

July 30, 2026

Time Updated: Thursday, July 30, 2026, 10:27 [IST]

Bankipur Assembly By Election: बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की एक-एक विधानसभा सीट पर उपचानव के लिए मतदान हो रहा है। पटना का बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र इस वक्त सबसे अधिक चर्चा में है। 2025 के बिहार चुनाव में यहाँ से जीते नितिन नबीन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होकर राज्यसभा पहुंच चुके हैं। बांकीपुर में उपचुनाव हो रहा है। महज एक सीट के बायपोल को हाइ-वोल्टेज पॉलिटिकल ड्रामा बना दिया है इस उपचुनाव के उम्मीदवारों ने।

Bankipur Assembly Byelection - Sympbilic Image

राजधानी पटना का हिस्सा बांकीपुर सीट कायस्थ (16-17%), यादव (14%) और करीब 13% अन्य सवर्ण मतदाताओं के वर्चस्व वाला शहरी क्षेत्र है। बीजेपी ने अभिषेक कुमार बंटी का नाम वापस होने के बाद युवा चेहरे नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा है, जिनका मुकाबला जन सुराज के प्रशांत किशोर और आरजेडी की रेखा गुप्ता से है। ओपिनियन पोल में भले ही एनडीए का पलड़ा भारी दिख रहा हो, लेकिन ग्राउंड पर कोर वोटर्स का गुस्सा और विपक्षी खेमे की हलचल नतीजों को चौंकाने वाला बना सकती है। क्या प्रशांत किशोर बीजेपी के इस अभेद्य दुर्ग में सेंध लगा पाएंगे, या जातीय समीकरण बांकीपुर का इतिहास दोहराएंगे? आइए समझते हैं इस त्रिकोणीय मुकाबले की पूरी इनसाइड स्टोरी..

पटना की इस प्रतिष्ठित सीट पर पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी का कब्ज़ा रहा है। 2008 में परिसीमन से पहले यह पटना पश्चिम कहलाता था जिस पर 1995 के बाद से लगातार भारतीय जनता पार्टी के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा चुनाव जीतते रहे। 2005 में उनकी मृत्यु के बाद 2006 में हुए उपचुनाव में उनके पुत्र और बीजेपी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने जीत दर्ज की थी और 2010 से 2025 तक वे लगातार इस सीट से विधायक चुने जाते रहे। बहरहाल, नितिन नबीन के राज्यसभा जाने के बाद यहाँ उपचुनाव हो रहा है।

इस उपचुनाव का सबसे मनोरंजक पहलू है चुनावी मैदान में प्रशांत किशोर की डायरेक्ट एंट्री। पीके बतौर जनसुराज प्रत्याशी मैदान में हैं। पीके के सामने हैं बीजेपी के नीरज कुमार सिन्हा और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की रेखा गुप्ता। दरअसल, बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी का चयन भी बड़ा नाटकीय रहा। पहले इस सीट से अभिषेक कुमार बंटी को उतारा गया। पर्चा भी दाखिल हो गया और फिर एक दिन बाद भाजपा प्रत्याशी ने पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए उम्मीदवारी वापस ले ली। फिर आनन-फानन में एक अदद उम्मीदवार ढूंढा गया और मिले भी तो नीरज कुमार सिन्हा, जिनकी बातें सुनकर भाजपा समर्थक भी पूछते हैं कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी में कोई और नहीं था जिसे पटना के बांकीपुर से उतारा जा सके?

खैर, कौन सी पार्टी किसे कब और कहाँ से मैदान में उतारेगी यह पार्टी का विशेषाधिकार है। लेकिन बांकीपुर का उपचुनाव पार्टी अध्यक्ष नीतिन नबीन की प्रतिष्ठा का विषय बन गया है। पहले उम्मीदवार के चयन और नाम-वापसी और फिर एक ऐसे उम्मीदवार जो पब्लिकली ठीक से बोल भी नहीं पा रहे हों का चयन, नितिन नबीन के निर्णायक क्षमता की कसौटी सिद्ध हो सकती है।

यदि उम्मीदवार के प्रोफाइल को देखा जाए तो नीरज सिन्हा प्रशांत किशोर के पासंग भी नहीं नज़र आते हैं वहीं अगर पार्टी के प्रोफाइल को देखा जाए तो भाजपा कोई भी चुनाव उसी शिद्दत से लडती है। उनके पास जो मैकेनिज्म है उसका वे पूरा इस्तेमाल करते हैं। बहरहाल बांकीपुर का उपचुनाव रोचक हो चुका है जहाँ त्रिकोणीय मुकाबले में मेन टक्कर जनसुराज के प्रशांत किशोर और भाजपा के नीरज सिन्हा के बीच ही समझा जा रहा है। आइए समझते हैं बाकीपुर के जीत का गणित क्या है।

बांकीपुर में कायस्थ मतदाताओं की संख्या निर्णायक बताई जाती है - करीब 16-17 फीसदी लेकिन भूलना नहीं चाहिए कि करीब 14 फीसदी यादव मतदाता भी हैं। इसके अतिरिक्त कुर्मियों, बनिया और अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रतिशत भी दोहरे अंकों में हैं। स्वर्ण जातियों में कायस्थों के अलावा ब्रह्मण, राजपूत और भूमिहार मतदाताओं की आबादी करीब 13 फीसदी है। चंद्रवंशी समुदाय का भी करीब 12% वोट है बांकीपुर में।

यदि भाजपा का सिक्का चलता है और जिसकी उम्मीद भी है क्योंकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का कुनबा जिस तरह एकीकृत होकर मैदान में है उससे लगता है कि भाजपा की जीत तय है। अगर भाजपा के पक्ष में जातीय समीकरण और गठबंधन वोटर लामबंद हुए तो बांकीपुर में इतिहास दोहराया जाएगा। राजधर्मा ओपिनियन पोल में बीजेपी के नीरज सिन्हा को 46 प्रतिशत, राजद की रेखा गुप्ता को 29 प्रतिशत और प्रशांत किशोर को केवल 23 प्रतिशत मत प्राप्त होने की बात कही गई है।

अगर गठबंधन के गणित पर जोर डालें तो 56 फीसदी मतों के साथ बांकीपुर का झुकाव एनडीए के पक्ष में दिख रहा है लेकिन चुनाव में रातों रात हालात बदलते भी हैं। अपने पार्टी उम्मीदवार वीणा मानवी का पर्चा रद्द होने से नाराज तेजप्रताप जहाँ पहले पीके को जिताने मैदान में उतर गए थे वहीं जेल से आने के बाद राजद उम्मीदवार को जिताने की बात कर रहे हैं। राजद उम्मीदवार रेखा गुप्ता 8 महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में करीब 46 हज़ार मतों के साथ दूसरे स्थान पर रही थीं लेकिन इस उपचुनाव में गठबंधन सहयोगियों की उदासीनता और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव की मैदान से दूर नार्वे में हॉलिडे मनाने के कारण राजद के मतदाताओं में भी आत्मविश्वास की कमी होगी।

प्रशांत किशोर के लिए यह एक अलाहिदा मौका हो सकता है। हालांकि ओपिनियन पोल में उन्हें तीसरे नंबर पर दिखाया गया है लेकिन भाजपा के कोर-वोटर्स में जिस तरह का आक्रोश देखा जा रहा है उससे प्रशांत किशोर की बांछे खिल गई होंगी। एक दिन पहले भी डोर टू डोर कैंपेनिंग में बांकीपुर के कायस्थ मतदाताओं ने स्थानीय सांसद रविशंकर प्रसाद को यह कहकर वापस कर दिया कि भाजपा का विकास बहुत देख लिया... इतना न विकास कर दिया कि अब कोई जरूरत ही नहीं रही। बांकीपुर में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ भी नाराजगी देखी गई।

दूसरी तरफ पीके भी अपनी राजनीतिक गोटी काफी संभाल कर चल रहे हैं। वे भाजपा को तो निशाने पर ले रहे हैं लेकिन भाजपा समर्थकों को नहीं क्योंकि उन्हे उम्मीद है कि भाजपा समर्थक भी उन्हें वोट कर सकते हैं। पीके अपने कैंपेनिंग में बार-बार ये बात कहते रहे कि एक सीट से राज्य की सरकार पर कोई असर नहीं होने वाला। बांकीपुर राज्य की राजधानी पटना का हिस्सा है और यहाँ मतदाताओं की शिक्षा का स्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों से बेहतर है। पीके की राजनीतिक सूझबूझ और प्रत्याशी के तौर पर कद्दावर छवि के कारण नतीजे उलटने की भी संभावना बताई जा रही है।

बिहार में Bankipur Assembly By-Election (बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव) महज एक सीट का मुकाबला नहीं, बल्कि बिहार की भावी राजनीति का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट बन चुका है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस पारंपरिक सीट पर जहां बीजेपी अपने 30 साल पुराने किले को बचाने में जुटी है, वहीं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) के सीधे चुनावी मैदान में उतरने से मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। पहले प्रत्याशी के चयन को लेकर हुआ नाटकीय घटनाक्रम और फिर स्थानीय समर्थकों में देखी जा रही नाराजगी ने बीजेपी के लिए इस चुनाव को साख की लड़ाई बना दिया है।