एजुकेशन
- Authored by: वर्षा कुशवाहा
- Updated Aug 9, 2026, 11:07 AM IST
August Kranti: भारतीय स्वतंत्रता में अगस्त क्रांति का सबसे बड़ा योगदान रहा है। यह भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, लेकिन अगस्त क्रांति क्या है। कैसे भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई थी? आइए जानते हैं।
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August Kranti क्या है? (Photo- AI)
August Kranti: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त 1942 का दिन सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। यह वही दिन है, जब देश में एक ऐसे व्यापक जन-आंदोलन की ज्वाला धधकी थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव पूरी तरह हिलाकर रख दी थी। भारतीय इतिहास में इस संग्राम को 'अगस्त क्रांति' (August Kranti) या 'भारत छोड़ो आंदोलन' (Quit India Movement) के नाम से जाना जाता है।
महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के ऐतिहासिक संदेश ने देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया और बच्चे-बूढ़े, युवा, किसान तथा मजदूर सभी एक साथ पूर्ण स्वराज की प्राप्ति के लिए सड़कों पर उतर आए। तो आइए जानते हैं विस्तार में कि आखिर अगस्त क्रांति क्या है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और इसने भारत को आजादी दिलाने में क्या निर्णायक भूमिका कैसे निभाई।
अगस्त क्रांति क्या है?
'अगस्त क्रांति' भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का वह अंतिम और सबसे बड़ा जन-आंदोलन था, जिसने अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश दिया था कि अब वे भारत पर अधिक समय तक शासन नहीं कर सकते। चूंकि यह आंदोलन अगस्त के महीने में शुरू हुआ था, इसलिए इसे 'अगस्त क्रांति' कहा जाता है। इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि यह किसी एक वर्ग या पार्टी तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे देश की जनता ने इसमें अपनी भागीदारी निभाई थी। महात्मा गांधी के एक आह्वान पर पूरा राष्ट्र गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए एकजुट हो गया था।
क्यों पड़ी भारत छोड़ो आंदोलन की जरूरत?
1942 में इस आंदोलन की शुरुआत अचानक नहीं हुई थी, बल्कि इसके पीछे कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार थे। एक-एक करके उसके बारे में बात करें तो, सबसे पहले इसमें आता है - द्वितीय विश्व युद्ध और क्रिप्स मिशन की विफलता। जी हां, द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना भारत को युद्ध में शामिल किया गया था। भारतीय जनता में इसको लेकर गहरा असंतोष था। ब्रिटेन ने भारतीयों का समर्थन हासिल करने के लिए मार्च 1942 में स्टेफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में 'क्रिप्स मिशन' को भारत भेजा। लेकिन क्रिप्स मिशन भारतीयों को पूर्ण स्वतंत्रता देने का कोई ठोस आश्वासन नहीं दे सका, जिससे यह वार्ता पूरी तरह विफल हो गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के कारण बढ़ी महंगाई भी एक बड़ा कारण थी। युद्ध के कारण भारत में दैनिक उपयोग की वस्तुओं, विशेषकर खाद्यान्न यानी अनाज और कपड़े की भारी किल्लत हो गई थी। बढ़ती महंगाई ने आम जनता का जीवन बेहाल कर दिया था, जिससे अंग्रेजों के खिलाफ जन-आक्रोश अपने चरम पर पहुंच गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेनाएं दक्षिण-पूर्व एशिया में तेजी से आगे बढ़ रही थी। गांधी जी का मानना था कि यदि अंग्रेज भारत छोड़ दें, तो जापान के पास भारत पर आक्रमण करने का कोई कारण नहीं रहेगा। यही कारण है कि भारतीय जनता ने एकजुट होकर अंग्रेजों को भारत से निकालने के लिए इस आंदोलन की शुरुआत की गई।
कैसे हुई भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत?
अगस्त क्रांति या भारत छोड़ो आंदोलन की रूपरेखा और शुरुआत की कहानी बेहद संघर्षपूर्ण रही है। जिसके बारे में जानना सभी के लिए जरूरी है। यह स्वतंत्रता की केवल एक गाथा नहीं है, बल्कि आज के समय में यूपीएससी और अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण टॉपिक्स में भी एक है, तो आइए अब इस आंदोलन की रूपरेखा के बारे में विस्तार से जानें
वर्धा प्रस्ताव
14 जुलाई 1942 को महाराष्ट्र के वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। इस बैठक में ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो प्रस्ताव' पास किया गया। प्रस्ताव में मांग की गई कि अंग्रेज तुरंत भारत छोड़कर चले जाएं और सत्ता भारतीयों को सौंपें।
बॉम्बे में ऐतिहासिक फैसला
7 और 8 अगस्त 1942 को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक बॉम्बे के 'गोवालिया टैंक मैदान' में आयोजित की गई। 8 अगस्त की शाम को भारी जनसमूह के बीच 'भारत छोड़ो प्रस्ताव' को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। इसी ऐतिहासिक मैदान से महात्मा गांधी ने देशवासियों को 'करो या मरो' का अमर नारा दिया।
'ऑपरेशन जीरो आवर' और नेताओं की गिरफ्तारी
8 अगस्त की रात को प्रस्ताव पास होते ही ब्रिटिश सरकार घबरा गई। अंग्रेजों ने आंदोलन को शुरू होने से पहले ही कुचलने के लिए 'ऑपरेशन जीरो आवर' (Operation Zero Hour) चलाया। यह एक गुप्त अभियान था। 9 अगस्त की तड़के ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद समेत कांग्रेस के तमाम बड़े शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर अलग-अलग जेलों में बंद कर दिया गया। इस दौरान गांधी जी को पुणे के आगा खां पैलेस में रखा गया।
जब देश की जनता बनी अपनी नेता
शीर्ष नेताओं की अचानक हुई गिरफ्तारी से अंग्रेज सरकार को लगा कि आंदोलन थम जाएगा, लेकिन यहां अंग्रेजों की सोच से बिल्कुल विपरीत कुछ हुआ। नेताओं की अनुपस्थिति में देश की आम जनता ने खुद आंदोलन की कमान संभाल ली।
अरुणा आसफ अली का ऐतिहासिक योगदान - 9 अगस्त 1942 को बहादुर स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली ने बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में पुलिस की भारी तैनाती के बावजूद तिरंगा फहराया और आंदोलन का बिगुल बजा दिया।
अंडरग्राउंड लीडरशिप - डॉ. राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन और उषा मेहता जैसे युवा नेताओं ने अंडरग्राउंड रहकर आंदोलन का संचालन किया। उषा मेहता ने तो गुप्त 'कांग्रेस रेडियो' चलाकर देश भर में आंदोलन की खबरें प्रसारित की।
जन-आक्रोश - देश भर में हड़तालें, जुलूस और प्रदर्शन होने लगे। कई जगहों पर रेलवे लाइनों को उखाड़ दिया गया, सरकारी भवनों और डाकघरों पर तिरंगा फहराया गया। बलिया (यूपी), सतारा (महाराष्ट्र) और तामलुक (बंगाल) जैसी जगहों पर जनता ने अंग्रेजों की समानांतर सरकार तक बना ली।
अंग्रेजों का दमन चक्र
ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। हजारों लोगों पर गोलीबारी की गई, लाठीचार्ज किया गया और लगभग 1 लाख से अधिक लोगों को जेल में डाल दिया गया। भले ही अंग्रेजों ने अपनी सैन्य ताकत से आंदोलन को कुछ समय के लिए दबा दिया, लेकिन इस आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के ताबूत में अंतिम कील ठोकने का काम किया। अंग्रेजों को यह भली-भांति समझ आ गया था कि भारतीय जनता को अब और अधिक समय तक गुलाम बनाकर रखना संभव नहीं है।
अगस्त क्रांति के बाद अंग्रेजों ने भारत छोड़ा
'अगस्त क्रांति' केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह भारत की अदम्य इच्छाशक्ति और स्वाभिमान का प्रतीक था। इस क्रांति ने यह साबित कर दिया कि जब किसी देश की पूरी जनता अपनी आजादी के लिए 'करो या मरो' का संकल्प ले लेती है, तो दुनिया की कोई भी ताकत उसे गुलाम नहीं बना सकती। अगस्त क्रांति के मात्र 5 वर्ष बाद ही 15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्ति मिली।
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वर्षा कुशवाहाauthor
वर्षा कुशवाहा टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की एजुकेशन डेस्क पर बतौर कॉपी एडिटर कार्यरत हैं और पिछले 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं। जर्नलिज़्म में पोस्ट ग्रेजुएशन डिप्लोमा पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूज रूम में तेजी, सटीकता और गहराई के साथ काम करते हुए अपनी मजबूत संपादकीय पहचान बनाई है। वर्षा की विशेषज्ञता हाइपर-लोकल खबरों, इवेंट कवरेज और स्टेट पॉलिटिक्स से जुड़ी रिपोर्टिंग में भी है। अब तक वर्षा कुशवाहा 8,000 से अधिक खबरें लिख चुकी हैं, जिनमें कई अहम लोकल रिपोर्ट्स, एजुकेशन और करियर की खबरें तथा फीचर-आधारित स्टोरीज शामिल हैं।
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