Published: Sunday, September 20, 2026, 18:11 [IST]
President's ADC Eligibility: राष्ट्रपति के किसी कार्यक्रम की तस्वीर या वीडियो में एक बात अक्सर लोगों का ध्यान खींचती है। उनके साथ हमेशा एक या एक से अधिक वर्दीधारी अधिकारी बेहद अनुशासन के साथ चलते दिखाई देते हैं। ये अधिकारी राष्ट्रपति के करीब रहकर कई जरूरी जिम्मेदारियां संभालते हैं और इन्हें ADC यानी Aide-de-Camp कहा जाता है।
इन्हें देखकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या इस पद के लिए मेजर रैंक होना जरूरी है? या सेना के किसी दूसरे रैंक के अधिकारी भी एडीसी बन सकते हैं? मेजर ऋषभ सिंह संब्याल और नव्या शेखावत जैसे उदाहरण बताते हैं कि एडीसी की जिम्मेदारी सिर्फ एक खास रैंक तक सीमित नहीं है। इस पद के लिए अधिकारी का रिकॉर्ड, काम करने का तरीका, अनुशासन और जिम्मेदारी निभाने की क्षमता भी काफी अहम मानी जाती है।
क्या सिर्फ मेजर ही बन सकते हैं ADC?
ADC बनने के लिए सिर्फ मेजर रैंक होना जरूरी नहीं है। आम तौर पर सेना में कैप्टन, मेजर या लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के अधिकारी इस जिम्मेदारी के लिए चुने जा सकते हैं। नौसेना और वायुसेना में उनके बराबर रैंक वाले अधिकारी भी एडीसी की भूमिका निभा सकते हैं।
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इस पद के लिए केवल रैंक को ही आधार नहीं माना जाता। अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड, अनुशासन, काम करने का तरीका, शारीरिक क्षमता, मानसिक मजबूती और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बेहतर तालमेल जैसी बातें भी अहम होती हैं।
राष्ट्रपति या राज्यपाल के एडीसी के लिए रैंक से जुड़े नियम अलग हो सकते हैं। कुछ मामलों में कैप्टन और लेफ्टिनेंट स्तर के युवा अधिकारियों को भी यह जिम्मेदारी मिल सकती है।
मेजर ऋषभ सिंह का उदाहरण क्यों खास है?
मेजर ऋषभ सिंह संब्याल का नाम राष्ट्रपति के एडीसी के तौर पर काफी चर्चा में रहा है। उनकी सैन्य कार्यकुशलता और अनुभव के कारण लोगों के बीच यह धारणा बन गई कि एडीसी का पद सिर्फ मेजर रैंक के अधिकारियों के लिए होता है। लेकिन इस पद की तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। एडीसी की भूमिका में अलग-अलग रैंक के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं, बशर्ते वे इस खास काम के लिए जरूरी मानकों पर खरे उतरते हों।
नव्या शेखावत बनी पहली आर्मी महिला ADC
सेना में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने के साथ एडीसी जैसी जिम्मेदारियों में भी महिला अधिकारियों की मौजूदगी नजर आ रही है। नव्या शेखावत इसका एक उदाहरण हैं।
विभिन्न सैन्य कार्यक्रमों और वीवीआईपी दौरों में महिला सैन्य अधिकारियों ने एडीसी के तौर पर जिम्मेदारी निभाई है। इनमें कैप्टन या दूसरी युवा रैंक की अधिकारी भी शामिल रही हैं। इससे साफ है कि इस भूमिका को केवल मेजर रैंक या पुरुष अधिकारियों तक सीमित समझना सही नहीं है।
एडीसी का चयन कैसे होता है?
एडीसी बनना केवल किसी अधिकारी की रैंक के आधार पर तय नहीं होता। इसके लिए सेना के भीतर से ऐसे अधिकारियों को चुना जाता है जिनका रिकॉर्ड अच्छा हो और जो इस जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त माने जाएं।
चयन के दौरान अधिकारी के पिछले रिकॉर्ड, ड्रिल, कमांडिंग ऑफिसर की सिफारिश और इंटरव्यू जैसी चीजों को देखा जाता है। अधिकारी की अनुशासन क्षमता, व्यक्तित्व और जिम्मेदारी संभालने के तरीके पर भी ध्यान दिया जाता है।
एडीसी की जिम्मेदारी क्या होती है?
एडीसी का काम केवल राष्ट्रपति या किसी दूसरे वरिष्ठ अधिकारी के साथ खड़े रहना नहीं होता। उन्हें आधिकारिक दौरों, कार्यक्रमों, बैठकों और कई दूसरे जरूरी मौकों पर अधिकारी की मदद करनी होती है।
वे प्रोटोकॉल से जुड़ी व्यवस्थाओं पर नजर रखते हैं और यह सुनिश्चित करने में मदद करते हैं कि तय नियमों के अनुसार कार्यक्रम पूरा हो। कई मौकों पर वे अपने वरिष्ठ अधिकारी के साथ लगातार मौजूद रहते हैं, इसलिए इस पद पर बेहद अनुशासन और सतर्कता की जरूरत होती है।
एडीसी की परंपरा कितनी पुरानी है?
एडीसी का पद सैन्य व्यवस्था की पुरानी परंपराओं से जुड़ा माना जाता है। ब्रिटिश दौर से चली आ रही यह व्यवस्था आज भी भारतीय सशस्त्र बलों का हिस्सा है। एडीसी आम तौर पर अपनी मूल यूनिट से कुछ समय के लिए डेपुटेशन पर इस जिम्मेदारी में आते हैं। इस दौरान उन्हें देश के शीर्ष संवैधानिक या सैन्य पदों पर काम करने का करीब से अनुभव मिलता है।
इसी वजह से एडीसी का पद किसी खास रैंक का केवल दर्जा नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी, अनुशासन और भरोसे से जुड़ी भूमिका माना जाता है।
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