world-news

75 साल बूंद-बूंद को तरसे 1200 लोग-लड़के रहे कुंवारे, IAS दिव्या मित्तल ने बदली किस्मत-झेली सियासत की मार!

August 31, 2026

Time Published: Monday, August 31, 2026, 15:52 [IST]

IAS Divya Mittal Lahuriyadah Water Story: मिर्जापुर की पहाड़ियों में बसा लहुरियादह गांव कभी पानी के लिए ऐसी जद्दोजहद की कहानी था, जिसे सुनकर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। घरों तक नल की पाइपलाइन नहीं थी। गर्मियों में गांव का प्राकृतिक झरना सूख जाता था और लोगों को पानी के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। हालात ऐसे थे कि गांव के लोगों का बड़ा हिस्सा पानी के टैंकरों पर निर्भर था।

पानी की इस किल्लत का असर सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं पड़ा, बल्कि गांव के सामाजिक जीवन पर भी पड़ा। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पानी की समस्या की वजह से यहां के लड़कों की शादी तक मुश्किल हो गई थी। कई परिवार अपनी बेटियों की शादी ऐसे गांव में नहीं करना चाहते थे, जहां पीने का पानी ही आसानी से उपलब्ध न हो। लेकिन करीब 75 साल पुरानी इस समस्या की तस्वीर 2023 में बदली, जब IAS दिव्या मित्तल मिर्जापुर की डीएम बनकर पहुंची। मित्तल के कार्यकाल में लहुरियादह तक पाइपलाइन पहुंची और गांव के घरों में पहली बार नल से पानी पहुंचा।

ias-divya-mittal-lahuriyadah-water-story

वह गांव जहां पानी के लिए झरने तक जाना पड़ता था

लहुरियादह मिर्जापुर जिले के हलिया क्षेत्र में पहाड़ी इलाके में स्थित है। गांव मध्य प्रदेश की सीमा के करीब है और जिला मुख्यालय से करीब 49 किलोमीटर की दूरी पर बताया गया है। करीब 1,200 लोगों की आबादी वाले इस गांव के लिए पानी हमेशा सबसे बड़ी चुनौती रहा। गांव में मौजूद प्राकृतिक झरना ही लंबे समय तक लोगों के लिए पानी का मुख्य स्रोत था।

बारिश के मौसम में स्थिति कुछ बेहतर रहती थी, लेकिन गर्मियों में झरने का पानी कम हो जाता था या वह सूख जाता था। ऐसे में ग्रामीणों को पानी जुटाने के लिए पहाड़ी रास्तों से झरने तक जाना पड़ता था। कई बार पानी सिर पर ढोकर घर तक लाना पड़ता था। यानी जिस पानी को शहरों में लोग घर के नल से कुछ सेकंड में हासिल कर लेते हैं, उसके लिए लहुरियादह के लोगों को घंटों मेहनत करनी पड़ती थी।

पानी की समस्या इतनी गंभीर कि गांव का बजट टैंकरों पर खर्च

गांव में पाइपलाइन से पानी नहीं पहुंच पाने के कारण प्रशासन और ग्राम पंचायत को टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाना पड़ता था। गांव का बड़ा हिस्सा बजट पानी की व्यवस्था पर खर्च हो जाता था। टैंकर से पानी पहुंचना अपने आप में समस्या का स्थायी समाधान नहीं था। पानी सीमित मात्रा में आता था और उसके वितरण को लेकर ग्रामीणों के बीच विवाद भी हो जाते थे। यानी टैंकर गांव तक पहुंच भी जाए तो हर परिवार तक पर्याप्त पानी पहुंचाना चुनौती बना रहता था।

पुरानी परियोजना पर करोड़ों खर्च हुए, फिर भी नहीं पहुंचा पानी

लहुरियादह तक पानी पहुंचाने की कोशिश नई नहीं थी। इससे पहले भी पाइपलाइन परियोजना पर काम शुरू किया गया था। बताया गया कि करीब 4.87 करोड़ रुपये से अधिक की पुरानी परियोजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। पहाड़ी और कठोर चट्टानी इलाके में पाइपलाइन बिछाने की तकनीकी मुश्किलों के चलते काम बीच में रुक गया। नतीजा यह हुआ कि गांव के लोगों की पानी की समस्या जस की तस बनी रही।

दिव्या मित्तल ने संभाली कमान, एक्सपर्ट्स की मदद से निकाला रास्ता

सितंबर 2022 में दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर के जिलाधिकारी का पद संभाला। उनके सामने लहुरियादह की पानी की समस्या भी पहुंची। उन्हें बताया गया कि पहले कई प्रयास हो चुके हैं, लेकिन पहाड़ी की चोटी पर बसे गांव तक पाइपलाइन पहुंचाना बेहद मुश्किल साबित हुआ है। मित्तल ने इस समस्या को सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि तकनीकी चुनौती के रूप में लिया। इसके लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के भूभौतिकविदों और अन्य तकनीकी एक्सपर्ट्स की मदद ली गई। जल जीवन मिशन, यूपी जल निगम, नमामि गंगे और जिला प्रशासन के अधिकारियों की संयुक्त टीम बनाई गई। टीम ने पहाड़ी और कठोर चट्टानी सतह पर पाइपलाइन पहुंचाने के लिए तकनीकी विकल्प तलाशे।

10 करोड़ से ज्यादा की नई परियोजना को मिली मंजूरी

पुराने प्रयासों और उपलब्ध बुनियादी ढांचे को ध्यान में रखते हुए गांव के लिए नए सिरे से प्रस्ताव तैयार किया गया। इसके बाद 10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली नई परियोजना को मंजूरी मिली। इस परियोजना में पहाड़ी गांव तक पानी पहुंचाने के लिए पाइपलाइन और लिफ्ट पंपों का इस्तेमाल किया गया। पहले से बने कुछ बुनियादी ढांचे का भी उपयोग किया गया। काम अप्रैल 2023 में शुरू हुआ और कुछ ही महीनों में पूरा कर लिया गया।

2023 में पहली बार नल से निकला पानी

लहुरियादह के लोगों के लिए वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं था। करीब 75 साल से पानी की समस्या झेल रहे गांव में पहली बार पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचा। उस वक्त डीएम रहीं दिव्या मित्तल ने खुद नल चालू किया। गांव के लोगों ने पहली बार अपने घरों के करीब पाइपलाइन और नल के जरिए पानी आते देखा। बुजुर्ग ग्रामीणों ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि पहले गांव के लोग झरने से पानी लाते थे। कुछ परिवार पशुओं के साथ रहते थे और उनकी पानी की जरूरत भी इसी प्राकृतिक स्रोत से पूरी होती थी। बाद में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती गई।

सिर्फ नल नहीं, गांव के पानी का पूरा सिस्टम तैयार किया गया

परियोजना का मकसद सिर्फ पाइपलाइन बिछाकर पानी पहुंचाना नहीं था। गांव में पानी के दूसरे स्रोतों को भी संरक्षित करने की कोशिश की गई। गांव के एकमात्र कुएं का इस्तेमाल वर्षा जल संचयन के लिए किए जाने की योजना बनाई गई। पशुओं के लिए पानी जमा करने के लिए कृत्रिम बांध-सह-तालाब भी तैयार किया गया। पहाड़ी की चोटी पर पानी पहुंचाने वाले लिफ्ट पंपों के संचालन और प्रबंधन की जिम्मेदारी जल जीवन मिशन के तहत तय की गई। यानी गांव को सिर्फ तत्काल राहत नहीं, बल्कि पानी की दीर्घकालिक व्यवस्था देने की कोशिश की गई।

पानी आया तो बदली गांव की जिंदगी

लहुरियादह के लिए पाइपलाइन सिर्फ पानी की सुविधा नहीं थी। इसका असर गांव की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ा। पहले जिन महिलाओं और ग्रामीणों को पानी के लिए दूर जाना पड़ता था, उनका समय और मेहनत बचने लगी। टैंकरों पर निर्भरता कम हुई और पानी के लिए होने वाले विवादों से भी राहत की उम्मीद बनी। सबसे अहम बात यह थी कि पानी की वजह से गांव को लेकर बनी नकारात्मक धारणा भी बदलने लगी। स्थानीय लोगों का कहना था कि लंबे समय से पानी की समस्या के कारण यहां शादी-ब्याह भी प्रभावित होते थे। लोगों को डर रहता था कि बेटी को ऐसे गांव में भेजना जहां पीने का पानी जुटाना ही मुश्किल हो, उसके लिए परेशानी का कारण बनेगा।

IAS दिव्या मित्तल ने बदली किस्मत, झेली सियासत की मार!

लहुरियादह में पानी पहुंचने की उपलब्धि के साथ ही दिव्या मित्तल का मिर्जापुर कार्यकाल भी चर्चा में रहा। उनका मिर्जापुर में कार्यकाल 17 सितंबर 2022 से 1 सितंबर 2023 तक रहा। गांव में पानी पहुंचाने की योजना के उद्घाटन को लेकर उस समय राजनीतिक विवाद भी खड़ा हुआ। दावा किया गया कि परियोजना के उद्घाटन को लेकर केंद्रीय मंत्री और मिर्जापुर से 3 बार की सांसद अनुप्रिया पटेल नाराज थीं। जल पूजन कार्यक्रम के कुछ समय बाद ही दिव्या मित्तल का तबादला हो गया।

विदाई के वक्त सड़कों पर उमड़ा जनसमर्थन

दिव्या मित्तल के तबादले के समय मिर्जापुर में उनकी विदाई भी काफी चर्चा में रही। स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने सड़कों पर उनका स्वागत और विदाई की। कई जगह लोगों ने फूल बरसाए। लोग उन्हें 'डीएम बेटी' कहकर पुकारते थे। लहुरियादह में पानी पहुंचाने का काम उनकी मिर्जापुर पोस्टिंग की प्रमुख उपलब्धियों में गिना गया।

अब फिर चर्चा में हैं दिव्या मित्तल

मिर्जापुर की यही कहानी एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि 43 वर्षीय IAS अधिकारी दिव्या मित्तल ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। दिव्या मित्तल, फिलहाल लखनऊ में राजस्व विभाग में विशेष सचिव के पद पर थीं। उन्होंने मुख्य सचिव एसपी गोयल को अपना इस्तीफा भेजा और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी सार्वजनिक की। उनका इस्तीफा ऐसे समय में चर्चा का विषय बना है जब मिर्जापुर के लहुरियादह जैसे गांव में उनके कार्यकाल के दौरान हुए काम को लोग आज भी याद करते हैं।

75 साल की प्यास की कहानी में क्या बदला?

लहुरियादह की कहानी बताती है कि किसी दूरदराज पहाड़ी गांव में पानी पहुंचाना सिर्फ पाइप बिछाने का काम नहीं होता। यहां भौगोलिक स्थिति, कठोर चट्टान, ऊंचाई, तकनीकी डिजाइन और पानी को ऊपर तक पहुंचाने की व्यवस्था, सब बड़ी चुनौतियां थीं। पुरानी परियोजना के असफल होने के बाद नई तकनीकी टीम बनाई गई, विशेषज्ञों की मदद ली गई और फिर नई परियोजना के जरिए गांव तक पानी पहुंचाया गया।

कभी जहां पानी के लिए 4 किलोमीटर तक जाना पड़ता था, टैंकरों पर गांव का बजट खर्च होता था और पानी की कमी शादी-ब्याह तक को प्रभावित करती थी, वहीं कुछ महीनों के काम के बाद उसी गांव में नल से पानी पहुंचने लगा। यही वजह है कि लहुरियादह में पानी पहुंचाने की कहानी दिव्या मित्तल के मिर्जापुर कार्यकाल की सबसे ज्यादा याद की जाने वाली उपलब्धियों में शामिल हो गई।