45 साल की उम्र में नौकरी छोड़कर रिटायर होना सुनने में बेहद आकर्षक लगता है, लेकिन असली चुनौती रिटायरमेंट के बाद शुरू होती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि आपके पास कितनी रकम जमा है, बल्कि यह भी है कि वह पैसा अगले 40-45 साल तक कैसे चलेगा? भारत में महंगाई, टैक्स, बढ़ते मेडिकल खर्च और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव को देखते हुए जल्दी रिटायर होने वालों के लिए लोकप्रिय 4% विड्रॉल रूल हमेशा सही साबित हो, यह जरूरी नहीं है। 4% नियम का आधार अमेरिकी बाजार के आंकड़ों पर है। इसे 1994 में विलियम बेंगन के शोध से लोकप्रियता मिली थी और इसमें करीब 30 साल की रिटायरमेंट अवधि के लिए पोर्टफोलियो से शुरुआती साल में 4% रकम निकालने का विचार दिया गया था। लेकिन, अगर कोई व्यक्ति 45 साल की उम्र में रिटायर होता है, तो उसे संभवतः 40-45 साल तक अपने खर्च चलाने पड़ सकते हैं। ऐसे में एक ही नियम हर व्यक्ति पर लागू करना जोखिम भरा हो सकता है।
एक्सपर्ट के मुताबिक, जल्दी रिटायर होने वाला व्यक्ति शुरुआती विड्रॉल रेट (Withdrawal Rate) को करीब 3-3.5% रखने पर विचार कर सकता है। हालांकि, इसे भी कोई पक्का फॉर्मूला नहीं समझना चाहिए। सही दर इस बात पर निर्भर करेगी कि आपके सालाना खर्च कितने हैं, पोर्टफोलियो में इक्विटी और डेट का अनुपात क्या है, भविष्य में महंगाई कितनी रहती है, मेडिकल जरूरतें कितनी हो सकती हैं और आप अपने पीछे कितनी संपत्ति छोड़ना चाहते हैं। खासकर ज्यादा आय वाले परिवारों में जीवनशैली से जुड़े खर्च सामान्य महंगाई से भी तेज बढ़ सकते हैं। इसलिए रिटायरमेंट कॉर्पस बनाते समय सिर्फ आज के खर्च को नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखना चाहिए।
जल्दी रिटायरमेंट में सबसे बड़ा खतरा सिक्वेंस ऑफ रिटर्न रिस्क (Sequence of Returns Risk) है। मान लीजिए कोई व्यक्ति 45 साल की उम्र में रिटायर हुआ और उसके रिटायरमेंट के शुरुआती सालों में शेयर बाजार 25-30% तक गिर गया। अगर उसके पास खर्च चलाने का दूसरा स्रोत नहीं है और वह उसी समय इक्विटी म्यूचुअल फंड बेचता है, तो उसे कम कीमत पर ज्यादा यूनिट बेचनी पड़ सकती हैं। इससे बाजार में तेजी लौटने पर उसके पास कम निवेश बचा रहेगा और लंबे समय में पूरा कॉर्पस प्रभावित हो सकता है। इस समस्या से बचने के लिए एक्सपर्ट बकट स्ट्रेटजी (Bucket Strategy) अपनाने की सलाह देते हैं।
इस स्ट्रेटजी में रिटायरमेंट के पैसे को अलग-अलग हिस्सों में रखा जाता है। कम से कम 2-3 साल के खर्च को लिक्विड या शॉर्ट-टर्म डेट जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित साधनों में रखा जा सकता है। कुछ एक्सपर्ट 45 साल में रिटायर होने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी खर्चों का 5-7 साल का फिक्स्ड-इनकम रनवे रखने की सलाह देते हैं। इससे बाजार गिरने पर इक्विटी निवेश बेचने की मजबूरी कम होती है। जरूरी खर्च जैसे राशन, बिजली-पानी, बीमा और बेसिक हेल्थकेयर को सुरक्षित हिस्से से पूरा किया जा सकता है, जबकि यात्रा, मनोरंजन और अन्य लाइफस्टाइल खर्चों के लिए इक्विटी या हाइब्रिड निवेश से पैसा निकाला जा सकता है।
लेकिन सिर्फ सुरक्षित फंड बनाना पर्याप्त नहीं है। बाजार अच्छा चलने पर उससे मिले कुछ मुनाफे से डेट या फिक्स्ड-इनकम वाले हिस्से को दोबारा भरना चाहिए। वहीं, बाजार गिरने पर इक्विटी को छेड़ने के बजाय सुरक्षित बकेट से खर्च चलाया जा सकता है। रिटायरमेंट करीब आने पर पोर्टफोलियो में डेट का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़ाना भी जोखिम कम करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस और अलग इमरजेंसी फंड रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि अचानक आने वाला बड़ा मेडिकल खर्च लंबे समय के निवेश को नुकसान पहुंचा सकता है।
कुल मिलाकर 45 साल में रिटायरमेंट के लिए सिर्फ बड़ा म्यूचुअल फंड कॉर्पस बनाना काफी नहीं है। आपको 40-45 साल की लंबी अवधि, महंगाई, मेडिकल खर्च और बाजार की गिरावट को ध्यान में रखते हुए ऐसी Withdrawal Strategy बनानी होगी, जिससे जरूरत के समय निवेश बेचने की मजबूरी न आए और आपका पैसा लंबे समय तक चलता रहे।