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3 साल में 71 हजार हेक्टेयर वनों का सफाया... किस राज्य में कितने पेड़ काटे गए?

July 28, 2026

3 साल में 71 हजार हेक्टेयर वनों का सफाया... किस राज्य में कितने पेड़ काटे गए?

परियोजनाओं के लिए वन भूमि (Getty Image)

भारत में विकास परियोजनाओं के लिए लगातार जंगलों की जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है. सड़क, रेलवे, खनन, बिजली और सिंचाई जैसी परियोजनाओं के लिए पिछले तीन साल में 71 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल की जमीन को गैर-वन कामों के लिए मंजूरी दी गई है. यह जानकारी केंद्र सरकार ने लोकसभा में दी. सरकार के मुताबिक, 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच देशभर में कुल 71,023.30 हेक्टेयर जंगल की जमीन को दूसरे कामों के लिए मंजूरी मिली.

सरकार का कहना है कि जितनी जंगल की जमीन का इस्तेमाल विकास कामों में हुआ है, उसकी भरपाई के लिए बदले में पौधारोपण भी किया जा रहा है. पिछले पांच साल में 1,78,261.52 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधारोपण कराया गया है. सरकार ने यह भी बताया कि इन पौधों के जीवित रहने की दर अलग-अलग राज्यों में 40% से 100% के बीच है. लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने यह जानकारी दी.

जंगलों की गुणवत्ता भी देखी जाती है

सरकार ने कहा कि देश में जंगलों का आकलन हर दो साल में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) करता है. इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों और जमीनी जांच दोनों का इस्तेमाल किया जाता है. रिपोर्ट में केवल जंगलों का क्षेत्रफल ही नहीं देखा जाता, बल्कि उनकी गुणवत्ता भी मापी जाती है. जंगलों को पेड़ों की घनता के आधार पर तीन हिस्सों में बांटा जाता है- बहुत घना जंगल, मध्यम घना जंगल और खुला जंगल. सरकार का कहना है कि समय-समय पर नई तकनीक और बेहतर सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल करके रिपोर्ट की सटीकता बढ़ाई जा रही है.

  • 3 साल में 71,023.30 हेक्टेयर जंगल की जमीन गैर-वन कामों के लिए मंजूर हुई.
  • पिछले 5 साल में 1,78,261.52 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रतिपूरक वनीकरण किया गया.
  • पौधों के जीवित रहने की दर 40% से 100% के बीच बताई गई.

Forest Survey Of India Report

किस राज्य में दी गई ज्यादा जमीन (Getty Image)

किन राज्यों में सबसे ज्यादा जंगल की जमीन दी गई?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सबसे ज्यादा जंगल की जमीन मध्य प्रदेश में गैर-वन कामों के लिए मंजूर की गई. यहां 19,432.14 हेक्टेयर भूमि का डायवर्जन हुआ. इसके बाद ओडिशा में 8,965.71 हेक्टेयर, अरुणाचल प्रदेश में 7,334.87 हेक्टेयर, झारखंड में 5,409.56 हेक्टेयर और छत्तीसगढ़ में 4,218.95 हेक्टेयर जंगल की जमीन का उपयोग अन्य परियोजनाओं के लिए किया गया. उत्तर प्रदेश में भी 3,390.87 हेक्टेयर जंगल की जमीन को मंजूरी मिली.

सबसे ज्यादा जंगलों का इस्तेमाल हुआ

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा जंगल की जमीन खनन (Mining) के लिए दी गई. इस क्षेत्र में 16,463.28 हेक्टेयर जंगल की जमीन का इस्तेमाल करने की मंजूरी मिली. इसके बाद हाइडल और सिंचाई परियोजनाओं के लिए 14,294.41 हेक्टेयर और सड़क निर्माण के लिए 12,714.93 हेक्टेयर जंगल की जमीन दी गई. इसके अलावा बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 7,711.55 हेक्टेयर, रक्षा परियोजनाओं के लिए 6,276.01 हेक्टेयर और रेलवे परियोजनाओं के लिए 3,887.71 हेक्टेयर जंगल की जमीन मंजूर की गई.

इन राज्यों में सबसे कम दी गई जंगल की जमीन

सबसे कम जंगल की जमीन गैर-वन कामों के लिए चंडीगढ़ में मंजूर की गई, जहां केवल 0.24 हेक्टेयर भूमि का डायवर्जन हुआ. इसके बाद लद्दाख में 0.94 हेक्टेयर, नागालैंड में 3.93 हेक्टेयर और अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में 4.79 हेक्टेयर वन भूमि गैर-वन कामों के लिए मंजूरी दी गई. वहीं बिहार में 27.99 हेक्टेयर, गोवा में 50.48 हेक्टेयर, तमिलनाडु में 60.32 हेक्टेयर, केरल में 62.42 हेक्टेयर, मेघालय में 62.44 हेक्टेयर और दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव में 70.34 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ. इन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पिछले तीन सालों के दौरान गैर-वन कामों के लिए सबसे कम वन भूमि मंजूर की गई.

इन परियोजनाओं के लिए सबसे कम जमीन दी गई

पिछले तीन सालों में कुछ परियोजनाओं के लिए बहुत कम वन भूमि की जरूरत पड़ी. सबसे कम एयरपोर्ट के लिए केवल 0.09 हेक्टेयर वन भूमि मंजूर की गई, जबकि बीआरओ के मौजूदा पुलों के चौड़ीकरण और मजबूती के लिए 0.20 हेक्टेयर भूमि दी गई. इसी तरह गैर-पारंपरिक ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 7.17 हेक्टेयर, खनिज तेल की खोज के लिए 11.25 हेक्टेयर, अस्पताल और डिस्पेंसरी के लिए 17.91 हेक्टेयर और कम्युनिकेशन पोस्ट के लिए 20.08 हेक्टेयर वन भूमि मंजूर हुई.

Non Forest Use Of Forest Land

गैर-वन कामों के लिए जंगल की जमीन (Getty Image)

वहीं थर्मल पावर (41.66 हेक्टेयर), पवन एवं सौर ऊर्जा/पावर सब-स्टेशन (75.72 हेक्टेयर), नहर परियोजनाओं (115.02 हेक्टेयर), स्कूल एवं शैक्षणिक संस्थानों (213.93 हेक्टेयर) और ऑप्टिकल फाइबर व टेलीकॉम लाइनों (232 हेक्टेयर) के लिए भी अपेक्षाकृत कम वन भूमि का डायवर्जन किया गया. वहीं एक्सप्लोरेशन एंड सर्वे के लिए इस अवधि में किसी भी वन भूमि को मंजूरी नहीं दी गई.

जमीन देने से पहले कानूनी प्रक्रिया

सरकार का कहना है कि किसी भी जंगल की जमीन को गैर-वन कामों के लिए मंजूरी देने से पहले कानून के तहत प्रक्रिया पूरी की जाती है. इसके बाद संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में प्रतिपूरक वनीकरण कराया जाता है. यानी जितनी जंगल की जमीन का इस्तेमाल विकास कामों में होता है, उसकी भरपाई के लिए दूसरी जगह पौधे लगाए जाते हैं. सरकार के अनुसार पिछले पांच सालों में 1.78 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में ऐसा पौधारोपण किया गया है.

जंगलों की गुणवत्ता कैसे मापी जाती है?

सरकार ने बताया कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया पूरे देश में सैटेलाइट डेटा और जमीनी जांच के आधार पर जंगलों का सर्वे करता है. रिपोर्ट में जंगलों को पेड़ों की घनता के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा जाता है. जिन क्षेत्रों में पेड़ों की घनता 70% या उससे अधिक होती है उन्हें बहुत घना जंगल, 40% से 70% के बीच वाले क्षेत्रों को मध्यम घना जंगल और 10% से 40% तक घनता वाले क्षेत्रों को खुला जंगल माना जाता है.

अंकिता

अंकिता

शिव की नगरी काशी से अपने करियर की शुरुआत करने वाली अंकिता पाण्डेय ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता में अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी की है.  पत्रकारिता में आने के लिए उन्होंने बनारस के लोकल न्यूज पेपर "काशीवार्ता" से अपनी शुरुआत की, बाद में दिल्ली जैसे महानगरी का रुख करते हुए उन्होंने TV9 भारतवर्ष में अक्टूबर साल 2023 से जुड़ी. आज वह इस ऑर्गनाइजेशन में बतौर सब-एडिटर काम कर रही हैं. क्राइम, एंटरटेनमेंट और अन्य सभी को न्यूज के साथ विजुअल तरीके से पेश करने में रुचि है. पत्रकारिता के अलावा कविताएं लिखना, फोटोग्राफी करना और म्यूजिक का भी शौक रखती हैं.

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