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अखिलेश के लिए अचानक अहम क्यों बना लोहिया ट्रस्ट: चुनाव से पहले कमान अपने हाथ में ली; 2016 से हाशिए पर था - Uttar Pradesh News

September 19, 2026

पिछले दिनों अखिलेश यादव ‘लोहिया ट्रस्ट’ के अध्यक्ष चुने गए। पार्टी मुख्यालय से लेकर जिला ऑफिस और कई अन्य संपत्तियों का मालिकाना हक ट्रस्ट के पास है। साथ ही करीब 800 से एक हजार करोड़ रुपए का फंड भी है। समाजवादी पार्टी के गठन में भी इसकी अहम भूमिका थी।

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2016-17 की अदावत में तब के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल ‘टीम अखिलेश’ को बाहर का रास्ता दिखा रहे थे। इसके जवाब में अखिलेश ने ‘जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट’ बना लिया। झगड़ा बढ़ा तो मुलायम सिंह ने अखिलेश का साथ दे रहे चचेरे भाई रामगोपाल यादव को ‘लोहिया ट्रस्ट’ से हटाकर सगे भाई शिवपाल को सचिव बना दिया।

मुलायम अपनी आखिरी सांस तक इसके अध्यक्ष रहे। निधन के बाद शिवपाल मुखिया बने और अब कमान अखिलेश के हाथ में है। चर्चा है कि उनकी बड़ी बेटी अदिति यादव भी ट्रस्ट का हिस्सा बन सकती हैं।

आज यूपी एक्सप्लेनर में पढ़िए, 2016 के पारिवारिक घमासान से लेकर आज तक ट्रस्ट की तिजोरी, संपत्ति और सियासत में क्या बदला? अब अखिलेश को इसकी कमान सौंपने के पीछे क्या संदेश है?

तस्वीर लोहिया ट्रस्ट के गठन के समय की है। तब के सीएम मुलायम सिंह भाषण दे रहे। सबसे दाईं ओर जनेश्वर मिश्र खड़े हैं। मंच पर चंद्रशेखर, मधु लिमये, बाबू कपिलदेव सिंह, रवि राय, बद्री विशाल पित्ती जैसे समाजवादी नेता मौजूद हैं।

तस्वीर लोहिया ट्रस्ट के गठन के समय की है। तब के सीएम मुलायम सिंह भाषण दे रहे। सबसे दाईं ओर जनेश्वर मिश्र खड़े हैं। मंच पर चंद्रशेखर, मधु लिमये, बाबू कपिलदेव सिंह, रवि राय, बद्री विशाल पित्ती जैसे समाजवादी नेता मौजूद हैं।

सवाल-1: लोहिया ट्रस्ट का इतिहास क्या है? अखिलेश के लिए यह अहम क्यों है?

जवाब: लोहिया ट्रस्ट के बनने से अब-तक की पूरी कहानी 3 पार्ट में समझते हैं…

(A) गठन से पहले के हालात

  • बात अक्टूबर, 1988 से शुरू होती है। वीपी सिंह, तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले का आरोप लगाकर कांग्रेस से अलग हो चुके थे। ‘जनता दल’ नाम से अलग पार्टी बना ली थी।
  • चौधरी चरण सिंह की पार्टी ‘लोकदल’ के दोनों गुट यानी अजीत सिंह और मुलायम सिंह भी जनता दल में विलय कर चुके थे। 1989 में लोकसभा और यूपी विधानसभा चुनाव एक साथ हुए।
  • ‘जनता दल’ केंद्र और राज्य दोनों जगह सबसे बड़ी पार्टी बनी। भाजपा के सहयोग से वीपी सिंह पीएम बने। वे अजीत सिंह को यूपी का सीएम बनाना चाहते थे, लेकिन विधायकों का समर्थन मुलायम के साथ था, तो वे मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे।
  • केंद्र और यूपी में सरकार बनाने के बावजूद ‘जनता दल’ आंतरिक कलह से जूझ रहा था। मुलायम सिंह को अहसास था कि देर-सबेर पार्टी में टूट हो सकती है। ऐसे में उन्हें यूपी के समाजवादी नेताओं को एकजुट करने की जरूरत महसूस हुई।

(B) सपा के गठन का जरिया बना ‘लोहिया ट्रस्ट’

  • 23-24 मार्च, 1990 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में ‘डॉ. राम मनोहर लोहिया जन्मदिवस समारोह’ में ‘लोहिया ट्रस्ट’ बनाने की घोषणा हुई। इस दौरान चंद्रशेखर, मधु लिमये, जनेश्वर मिश्र जैसे नेता मौजूद थे।
  • मुलायम सिंह ट्रस्ट के अध्यक्ष बने। अक्टूबर, 1990 में लखनऊ का 1, विक्रमादित्य मार्ग ट्रस्ट का ठिकाना बना। अगले ही महीने मुलायम सिंह का अंदेशा सच हो गया, जनता दल टूट गया।
तस्वीर विक्रमादित्य मार्ग पर ट्रस्ट ऑफिस के उद्घाटन के समय की है। वरिष्ठ समाजवादी नेता मधु लिमये, तब के राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी और मुलायम सिंह (बाएं से दाएं) नजर आ रहे हैं।

तस्वीर विक्रमादित्य मार्ग पर ट्रस्ट ऑफिस के उद्घाटन के समय की है। वरिष्ठ समाजवादी नेता मधु लिमये, तब के राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी और मुलायम सिंह (बाएं से दाएं) नजर आ रहे हैं।

  • मुलायम सिंह ने चंद्रशेखर का साथ दिया। कांग्रेस के सहयोग से यूपी में उनकी सरकार बच गई, लेकिन ज्यादा दिनों तक ऐसा नहीं हुआ। 1991 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया।
  • विधानसभा चुनाव तक चंद्रशेखर 'समाजवादी जनता पार्टी' बना चुके थे। मुलायम सिंह यूपी अध्यक्ष थे। पार्टी बुरी तरह हारी, भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला। मुलायम सिंह समझ गए थे कि दिल्ली-केंद्रित कमजोर पार्टी के सहारे वे यूपी में भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकते।
  • राम मंदिर आंदोलन और मंडल आयोग ने पूरे देश की राजनीति बदल दी थी। मुलायम यूपी में मुस्लिम और यादव (M-Y) समुदाय का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे थे। इसी दौरान कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बसपा दलितों-पिछड़ों के बीच तेजी से मजबूत हो रही थी।
  • मुलायम सिंह को डर था कि अगर उन्होंने जल्द ही पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए अलग पार्टी नहीं बनाई, तो एक बड़ा वोटबैंक पूरी तरह से बसपा की तरफ खिसक जाएगा।
  • तब ‘लोहिया ट्रस्ट’ समाजवादी पार्टी (सपा) के गठन का जरिया बना। शुरुआती बैठकों, घोषणापत्र के प्रारूप और वैचारिक कैडर तैयार करने का काम ट्रस्ट के जरिए हुआ। 4 अक्टूबर, 1992 को पार्टी बनाने की घोषणा की। ठीक एक साल बाद 1993 में मुलायम सिंह सपा-बसपा गठबंधन से दूसरी बार सीएम बन गए।
  • 90 के दशक के पत्रकार बताते हैं कि शुरुआती दिनों में सपा का अपना बड़ा आधिकारिक ढांचा नहीं था। तब समाजवादी विचारधारा के प्रचार और कैडर को प्रशिक्षित करने में इसकी अहम भूमिका रही।
  • मुलायम सिंह के समय तक लोहिया ट्रस्ट फंड इकट्ठा करने का भी अहम जरिया था। 2016 में अखिलेश और शिवपाल सिंह के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हुई। इसके साथ ही ट्रस्ट के ढलान का सफर भी शुरू हो गया।

(C) मुलायम का ‘लोहिया ट्रस्ट’ V/S अखिलेश का ‘जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट’

  • 13 सितंबर, 2016 को मुलायम सिंह ने अखिलेश को हटाकर भाई शिवपाल को पार्टी प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। इसके बाद शिवपाल ने अखिलेश के 7 करीबियों को पार्टी से निकाल दिया। इसमें 3 MLC भी थे।
  • ‘टीम अखिलेश’ का सपा कार्यालय में बैठना तक बंद हो गया। तब 9 अक्टूबर, 2016 को अखिलेश यादव ने ‘जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट’ बना लिया। सपा मुख्यालय के ठीक पीछे 7, बंदरिया बाग इसका ठिकाना बना। अखिलेश के लिए वही काम करता है, जो कभी ‘लोहिया ट्रस्ट’ मुलायम सिंह के लिए करता था।
  • तमाम राजनीतिक उठापटक के बाद 1 जनवरी, 2017 को अखिलेश यादव सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। इसके बाद अखिलेश और रामगोपाल यादव ने ‘लोहिया ट्रस्ट’ की बैठकों में जाना बंद कर दिया। जबकि, रामगोपाल ट्रस्ट के सचिव थे।
  • अब सपा का पूरा फंड, चुनाव प्रबंधन और प्रशासनिक नियंत्रण सपा मुख्यालय के बाद जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट में केंद्रित हो गया। पार्टी 2017 विधानसभा चुनाव हार गई। शिवपाल लगातार सपा में साइडलाइन होते चले जा रहे थे।
  • वे अन्य राजनीतिक विकल्प तलाश रहे थे। तब मुलायम सिंह ने 21 सितंबर, 2017 को रामगोपाल की जगह शिवपाल को ‘लोहिया ट्रस्ट’ का सचिव बना दिया। हालांकि, जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के सामने यह बहुत मजूबत नहीं रह गया था।
  • सितंबर, 2018 में शिवपाल ने अलग पार्टी बना ली। फिर भी वे ट्रस्ट के सचिव बने रहे। 2022 में मुलायम सिंह के निधन के बाद शिवपाल इसके अध्यक्ष बन गए। इससे पहले 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ट्रस्ट को 1, विक्रमादित्य मार्ग का ऑफिस भी खाली करना पड़ा।
  • इधर सपा और अखिलेश यादव का फोकस ‘जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट’ पर था। अक्सर अखिलेश की फोटो आती हैं, जिसमें बैकग्राउंड में किताबों की अलमारियां दिखती हैं, वो जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट का ही ऑफिस है। इस वजह से अब ‘लोहिया ट्रस्ट’ एक वैचारिक संगठन भर रह गया है।
तस्वीर अगस्त, 2026 में जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के ऑफिस (7, बंदरिया बाग) में लोहिया ट्रस्ट की बैठक की है। इस दौरान अखिलेश यादव, शिवपाल यादव, आदित्य यादव समेत सभी सदस्य मौजूद थे।

तस्वीर अगस्त, 2026 में जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट के ऑफिस (7, बंदरिया बाग) में लोहिया ट्रस्ट की बैठक की है। इस दौरान अखिलेश यादव, शिवपाल यादव, आदित्य यादव समेत सभी सदस्य मौजूद थे।

सवाल-2: लोहिया ट्रस्ट के पास कितनी संपत्ति है?

जवाब: ट्रस्ट के बैंक खातों का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। एक गैर-सरकारी चैरिटेबल ट्रस्ट होने के नाते इसकी बैलेंस शीट सार्वजनिक नहीं की जाती। अखिलेश के सपा प्रमुख बनने के बाद ‘जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट’ की अहमियत बढ़ गई है। फंडिंग भी उसी तरफ शिफ्ट हो चुकी है।

  • वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शुक्ला बताते हैं- अब भी ‘लोहिया ट्रस्ट’ के पास करीब 800 से एक हजार करोड़ रुपए तक का फंड है। साथ ही सपा मुख्यालय समेत कई जिला ऑफिस ट्रस्ट के नाम हैं।
  • इटावा जिले की फ्रेंड्स कॉलोनी में भी ट्रस्ट का ऑफिस है। करीब 3 एकड़ में बने इस भवन में वातानुकूलित (AC) ऑडिटोरियम, लाइब्रेरी, प्रेस कॉन्फ्रेंस के साथ ही कार्यकर्ताओं के रुकने की भी व्यवस्थाएं हैं। हालांकि, लंबे समय से बंद होने के कारण इसकी हालत खस्ता हो चुकी है।

सवाल-3: चुनाव से पहले लोहिया ट्रस्ट का अध्यक्ष बदलने के पीछे की रणनीति क्या है?

जवाब: इसे पारिवारिक तालमेल और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह की विरासत को फिर से एक छत के नीचे लाने की कोशिश माना जा रहा है। पूरी रणनीति ऐसे समझ सकते हैं…

  • समाजवादी विरासत का केंद्रीयकरण: राजेंद्र शुक्ला बताते हैं- 2017 में हुए पारिवारिक विवाद के बाद से लोहिया ट्रस्ट और जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट दो अलग-अलग वैचारिक व राजनीतिक शक्ति केंद्र बने थे। अखिलेश का लोहिया ट्रस्ट का अध्यक्ष बनना यह संदेश देता है कि अब पार्टी, संगठन और संस्थापक मुलायम सिंह यादव की सभी वैचारिक व संस्थागत विरासतों पर अखिलेश यादव का एकछत्र और निर्विवाद नियंत्रण स्थापित हो चुका है।
  • परिवार और पार्टी एकजुट: अखिलेश को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव खुद शिवपाल यादव ने रखा और सभी 8 सदस्यों ने सहमति जताई। राजेंद्र कहते हैं- इससे भाजपा और विपक्षी दलों के उस नैरेटिव को खारिज करने में मदद मिलेगी कि ‘सपा में पारिवारिक खींचतान अब भी मौजूद है। चुनाव से पहले यादव परिवार और पार्टी कैडर के सामने 'ऑल इज वेल' की तस्वीर पेश करना इसका मुख्य उद्देश्य है।
  • PDA और लोहियावाद की री-ब्रांडिंग: वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार, सपा चुनाव में अपने 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) कार्ड को मुख्य हथियार बना रही है। डॉ. लोहिया के सामाजिक न्याय और "पिछड़े पावें सौ में साठ" का विचार इस रणनीति की आत्मा है। ट्रस्ट की कमान अखिलेश के हाथ आने से पार्टी अपने कैडर और युवाओं के बीच इस एजेंडे को नए सिरे से और ज्यादा आक्रामकता से प्रचारित कर पाएगी।
  • संसाधन और संपत्तियों का एकीकरण: प्रशासनिक और रणनीतिक नजर से, चुनाव के समय ट्रस्ट के पास मौजूद अचल संपत्तियों बौद्धिक संसाधनों और नेटवर्क का चुनाव प्रबंधन में बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा।

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