20 सितंबर 2026, जबलपुर: परंपरागत खेती छोड़ सब्जी की खेती अपनाई, जबलपुर के किसान सुरेश कुशवाहा कमा रहे ₹2 लाख महीना – जबलपुर जिले के बघराजी गांव के किसान सुरेश कुशवाहा ने परंपरागत अनाज की खेती छोड़कर सब्जी की खेती अपनाई, और अब वे 12 एकड़ जमीन से करीब 2 लाख रुपये महीने की कमाई कर रहे हैं।
शिमला मिर्च, बैंगन और टमाटर से बदली तस्वीर
सुरेश ने अपनी 12 एकड़ जमीन में से 6 एकड़ में शिमला मिर्च, 4 एकड़ में बैंगन और 2 एकड़ में टमाटर की खेती शुरू की। शुरुआत में उन्होंने खेती में करीब 15 लाख रुपये का निवेश किया, जिसमें सिंचाई व्यवस्था और खेत की तैयारी का खर्च शामिल था। परंपरागत अनाज की खेती में जहां साल में एक-दो बार ही आमदनी होती थी, वहीं सब्जी की खेती में उन्हें हर कुछ दिन में उपज बेचकर लगातार नकदी मिलने लगी।
अब उनके खेत से हर चार दिन में करीब 600 किलो टमाटर की तुड़ाई होती है, जबकि बैंगन और शिमला मिर्च मिलाकर करीब 25 क्विंटल उत्पादन मिल रहा है। इसी वजह से उनकी मासिक आमदनी करीब 2 लाख रुपये तक पहुंच गई है, जो परंपरागत अनाज की खेती से मिलने वाली आमदनी से कहीं ज्यादा है।
सुरेश कुशवाहा कहते हैं, “अगर फसल प्रबंधन सही तरीके से किया जाए, तो सब्जियां पारंपरिक फसलों की तुलना में बेहतरीन उत्पादन दे सकती हैं।” उनका कहना है कि समय पर सिंचाई, खाद और कीट प्रबंधन का ध्यान रखने से सब्जियों की खेती में जोखिम कम और मुनाफा ज्यादा रहता है। वे मानते हैं कि सब्जी की खेती में मेहनत और निगरानी ज्यादा चाहिए, लेकिन बदले में मिलने वाला मुनाफा भी उतना ही बेहतर होता है।
दूसरे किसानों के लिए मिसाल
सुरेश की सफलता से आसपास के गांवों के किसान भी सब्जी की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। स्थानीय मंडी में सब्जियों की लगातार मांग की वजह से उन्हें अपनी उपज बेचने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती, और बिचौलियों पर निर्भरता भी कम हुई है। कई किसान अब उनसे सीधे मिलकर शिमला मिर्च और बैंगन की खेती का तरीका सीख रहे हैं।
यह जानकारी एक क्षेत्रीय हिंदी अखबार की 17 सितंबर 2026 की रिपोर्ट पर आधारित है; आंकड़ों की अभी तक किसी दूसरे स्वतंत्र स्रोत से पुष्टि नहीं हो पाई है, इसलिए पाठक इसे एक ताज़ा, फिलहाल अकेले स्रोत से मिली जानकारी के तौर पर देखें।
सब्जी की खेती में मेहनत के साथ जोखिम प्रबंधन भी जरूरी
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सब्जी की खेती अनाज की तुलना में ज्यादा मुनाफा तो देती है, लेकिन इसमें समय पर सिंचाई, कीट-रोग नियंत्रण और तुड़ाई की जरूरत भी लगातार बनी रहती है। सुरेश कुशवाहा की तरह सफल होने के लिए किसानों को शुरुआत में मिट्टी जांच, उन्नत बीज और सिंचाई के साधनों में निवेश करना पड़ता है, जिसका असर एक-दो सीजन के बाद ही पूरी तरह दिखता है। जबलपुर के आसपास के कृषि विज्ञान केंद्र भी किसानों को सब्जी की खेती की तकनीकी जानकारी देने में मदद कर रहे हैं।
सुरेश की खेती में तीन अलग-अलग सब्जियां उगाने का एक और फायदा यह है कि अगर किसी एक फसल का बाजार भाव किसी वजह से गिर जाए, तो बाकी दो फसलों से आमदनी बनी रहती है। इस तरह की विविधता वाली खेती को कृषि विशेषज्ञ जोखिम कम करने का एक कारगर तरीका मानते हैं, खासकर उन किसानों के लिए जो अनाज से सब्जी की खेती की ओर पहली बार कदम बढ़ा रहे हैं।
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